Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

मेनस्ट्रीम मीडिया के मीडिया स्कूल एकमुश्त बेरोजगारों की फौज खड़ी करते हैं…

By   /  August 20, 2013  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

करीब करीब हर बड़े मीडिया संस्थान ने मीडिया स्कूल खोल रखे हैं जिसका दिखावटी मकसद तो होता है, नए ट्रेंड पत्रकार और मीडियाकर्मी तैयार करना मगर पर्दे के पीछे यह मीडिया संस्थान बंधुआ मज़दूर हासिल कर रहे होते हैं और साथ ही यह मीडिया स्कूल नामक दुकाने लाखों रुपये बतौर फीस लेकर अपने संस्थानों के लिए आमदनी का अतिरिक्त ज़रिया बनती हैं. हालात इतने बुरे हैं कि लाखों रुपये खर्च कर इन मीडिया संस्थानों से प्रशिक्षण पाकर निकले युवाओं को खुद इनके मीडिया संस्थानों में भी नौकरी मिलना आसान नहीं होता जिसके चलते यह युवा बेरोज़गारी की ज़मात में शामिल हो जाते हैं…

-विनीत कुमार||

मीडिया महंत जब ये कहते हैं कि हम तो अच्छे पत्रकार खोजते रहते हैं लेकिन मिलते ही नहीं तो लगता है अपने ही सिर के बाल नोच लूं..

उनका निशाना आइआइएमसी, जामिया, डीयू और ऐसे शैक्षणिक संस्थानों की तरफ होता है जहां वो खुद घुसने के लिए मार किए हुए हैं. अग्गा-पिच्छा करके डिग्रियां बटोरने में लगे हैं..भायजी, गोली मारिए इन संस्थानों को एक वक्त के लिए.

media institute

ये जो आपके मेनस्ट्रीम मीडिया ने अपनी-अपनी मीडिया स्कूल की जो दूकानें खोल रखी हैं, वो आपके काम के नहीं हैं क्या ? कहां गया टीवीटीएमआई, ट्रेनिंग दोगे दर्जनों को और रखोगे कुल चार..सरकारी संस्थान अगर मीडियाकर्मी तैयार करने के नाम पर कबाड़ पैदा कर रहा है तो आपके यहां लाखों रुपये फीस देने के बाद प्रतिभाएं कबाड़ क्यों हो जा रही है, उन्हें मौका दो न सरजी.

मेनस्ट्रीम मीडिया के अखबारों औऱ चैनलों ने मीडिया स्कूल की जो दूकान खोली है, आप कोशिश करके एक सूची बनाएं कि अब तक किस संस्थान ने कितने छात्रों को मीडियाकर्मी की ट्रेनिंग दी है और उनमे से कितने लोगों को नौकरी पर रखा.आपको प्रोफशनलिज्म और हन्ड्रेड परसेंट प्लेसमेंट के बड़े-बड़े दावों के बीच का सच निकलकर सामने आ जाएगा.

आपको लगता है कि ये अखबार और टीवी चैनल के धंधे में लगे संस्थान जब मीडिया स्कूल नाम से दूसरी दूकान खोलते हैं तो प्रोफेशनल पैदा करते हैं जिन्हें खबर, कैमरे, प्रोडक्शन आदि की बेहतरीन समझ होती है.. वो क्या ट्रेनिंग देते हैं, ये तो हमें स्क्रीन और अखबार के पन्ने पर दिखाई देता ही है लेकिन वो एकमुश्त बेरोजगारों की फौज खड़ी करते हैं. मसलन पिछले बैच में टीवी टुडे नेटवर्क ने कुल 35 लोगों को टीवीटीएमआई में दाखिला लिया और सिर्फ 4 लोगों को प्लेसमेंट दी. इस बार कुल 95 लोगों को लिया है, अभी उनके कोर्स शुरु होने के एक ही दिन हुए हैं कि वहां भी भारी छंटनी की संभावना जतानी शुरु हो गई है. ऐसे में इन 95 का क्या भविष्य है, आप समझ सकते हैं.

मेनस्ट्रीम मीडिया के मीडिया स्कूल अपने छात्रों को ट्रेनिंग और फर्स्ट हैंड एक्सपीरिएंस के नाम पर उन्हें बंधुआ मजदूर बनाकर छोड़ देते हैं. उनसे लाखों में फीस लेते हैं और आए दिन जो उनके कार्यक्रम होते हैं, अपने अखबार या चैनल की टीशर्ट पकड़ाकर जमकर काम लेते हैं. माफ कीजिएगा, इसमे सबसे ज्यादा बुरी हालत गर्ल्स स्टूडेंट की होती है. उनका काम आए अतिथियों, मंत्रियों को बुके देने, चाय-नाश्ते का इंतजाम करने और मोमबत्ती जलाने के लिए माचिस आगे बढ़ाने से ज्यादा का नहीं होता. उनसे ऐसे कोई भी काम नहीं कराए जाते जो कि पत्रकारिता के हिस्से में आते हों और जो आगे चलकर उन्हें इसकी बारीक समझ विकसित करे. उन्हें प्रशिक्षु पत्रकार की नहीं, निजी कंपनी में रिस्पेशसनिस्ट या एटेंडर की ट्रेनिंग दी जाती है. ये काम तो वो स्कूल के ही दिनों से करती आयीं होती है और फिर इस तरह की सेवाटहल का काम तो सदियों से उसके जिम्मे में थोप दिया गया है.

जितने पैसे देकर लोग मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थानों की मीडिया दूकान में पत्रकार बनने की ट्रेनिंग लेते हैं, उसे अगर बैंक में जमा कर दें और सालभर किसी सरकारी संस्थान से पढ़ाई करें तो कोर्स खत्म होते-होते सिर्फ ब्याज के पैसे से एक ठीक-ठाक पत्रिका निकालने की हैसियत में होंगे.

(विनीत कुमार की फेसबुक वाल से)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: