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बाज़ार पहले आपको खरीदता है, फिर नीलाम कर देता है…

By   /  August 20, 2013  /  No Comments

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-मयंक सक्सेना||

आईबीएन 7 और सीएनएन आईबीएन यानी कि नेटवर्क18 के न्यूज़ मीडिया वेंचर्स के लगभग 300 कर्मचारियों की छंटनी को जो लोग विदाई कह रहे हैं, उनको पहले अपनी भाषा पर काम करना होगा कि दरअसल ये विदाई है या नहीं, क्योंकि विदाई की एक रस्म होती है जो बाज़ार की इस रस्म से काफी अलग होती है। ख़ैर हिंदी टीवी मीडियाकर्मियों के भाषाई ज्ञान पर बात करना भी, भाषा का अपमान है इसलिए मुद्दे पर आना बेहतर है।mayank saxena

अब बात नेटवर्क 18 के कर्मचारियों की छंटनी की तो हुज़ूर ये तो होना ही था और इसकी चर्चा चैनल के आला कर्मियों के बीच लम्बे समय से थी। अब ये आला कर्मियों से पूछिये कि कई कर्मचारियों को इसके बारे में पहले से भनक भी क्यों नहीं लगने दी गई, जिस से कि वो अपने लिए कोई ठौर तलाश लेते…क्योंकि जिनको जानकारी मिल गई थी उन में से कई ने ठिकाने ढूंढ लिए हैं। बाज़ार ये ही करता है पहले अपने कई ठिकाने बनाता है फिर आपको उनमें से ही अलग अलग पर बार बार शरण लेने के लिए मजबूर कर देता है।

दरअसल ये बाज़ारवाद को पहले ओढ़ने, फिर पहन लेने और अब बिछा लेने का मुद्दा है, मसला जुड़ा है इस बात से किस तरह से जवानी में वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाले, जनवादी लेख लिखने वाले और बाज़ार के ख़तरों से अच्छी तरह वाकिफ़ रहने वाले सीनियर पत्रकार सम्पादकीय पदों पर आते ही बाज़ार के पुजारी हो गए। ये पत्रकारिता की वो पीढ़ी है, जो अपने अखबारी लेखों में जनता के तमाम मसलों पर ऐसे लिखती है जैसे उनसे ज़्यादा जनता की फिक्र किसी को न हो लेकिन अपने चैनलों में तमाम जनता से जुड़ी ख़बरें ये ही सम्पादक लो प्रोफाइल कह कर गिरवा देते हैं।

टीवी पत्रकारिता को पतितकारिता बना देने में इनका सबसे अहम किरदार है, इनमें से कोई चीख चीख कर जनता को अपनी ईमानदारी दिखाता है, तो कोई मुहावरों के इस्तेंमाल से, कोई उच्चारण बोध न होने के बावजूद टीवी पर एंकरिंग करना चाहता है बग़ैर ये सोचे कि लोगों को सही भाषा सिखाना भी आपकी ज़िम्मेदारियों में से एक है। कई सम्पादक तो ऐसे हैं जो शायद आखिरी बार किसी अखबार में नगर निगम की बीट देखा करते थे और अब किसी टीवी चैनल के समपादक हैं।

ऐसे में बाज़ार के आगे नतमस्तक हो जाना अहम हो जाता है क्योंकि सम्पादकों को अब अलग अलग रिहायशी सोसायटी में फ्लैट्स भी चाहिएं, 5 सितारा बार में पार्टी भी, महंगी शराब भी, बड़ी सी विदेशी गाड़ी भी और विदेशों में छुट्टियां भी। आखिर बिना बाज़ार से बिस्तर साझा किए ये होगा कैसे? दरअसल बार बार बाज़ार की दुहाई देने वाले सम्पादकों की मजबूरी भी ये ही है, और आखिरकार ये वहीं हुआ जिस सम्पादक ने बार बार बाज़ार को अहम बताया था। देख लीजिए सम्पादक जी बाज़ार ने क्या किया।

दरअसल पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का सीधा सा सिद्धांत है, ज़रूरत के लिए नहीं बल्कि मुनाफ़े के लिए उत्पादन और ऐसे में ज़ाहिर है कि मुनाफ़े के आगे न तो मोहब्बत होती है और न ही मुरव्वत। जब तक कर्मचारियों की ज़रूरत थी नेटवर्क 18 उनको श्रम से कम सैलरी पर काम पर लगाए रहा लेकिन जैसे ही कम्पनी मुकेश धीरूभाई अम्बानी के कब्ज़े में गई 300 कर्मचारियों का पत्ता साफ हो गया। इस घटना से ही इस बात की पोल भी खुल जाती है कि सम्पादक जी के इस दावे का कोई आधार नहीं है कि आईबीएन 7 की पॉलिसीज़ में रिलायंस वाले मुकेश का कोई हस्तक्षेप नहीं है। सम्पादक जी जो कर्मचारियों को रख और निकलवा सकता है वो सम्पादकीय नीति भी तय कर सकता है और करता ही है…आपके लिए भी ये एक इशारा है, समझ रहे हैं न..

मुनाफ़ाखोर अर्थव्यवस्था को न तो इस से मतलब होता है कि उसकी मुनाफ़ाखोरी गरीब को मार रही है…न ही इससे कि उससे मौलिक अधिकारों या संवैधानिक नीतियों का हनन हो रहा है। पूंजीवाद जिस भी देश में पनपा है, वहां के क़ानून से लेकर नागरिक अधिकारों तक का हमेशा उल्लंघन हुआ है। दरअसल रोज़गार समेत गरीबी मिटाने के लुभावने सपने दिखा कर ही पूंजीवाद हमेशा लाभ कमाता आया है। ऐसे ही मीडिया भी जब पूंजीपतियों के हाथ का खिलौना हुई तो उसके साथ भी ये ही होना था। जेट एयरवेज़ के कर्मचारियों की छंटनी के खिलाफ आग उगलने वाले सम्पादक जी अब शांत हैं, शायद वो ये समझने में लगे हैं कि बाज़ार को समझने में उन से क्या भूल हुई। सिर्फ एक भूल सम्पादक जी कि आप ये नहीं समझ पाए कि बाज़ार में हर चीज़ की एक कीमत होती है, उत्पाद की भी और उपभोक्ता की भी…ऐसे में बाज़ार जब ख़तरे में आता है तो वो आपकी भी कीमत लगाने से नहीं चूकता है।

दरअसल ये समय है खतरे समझने का और खतरे उठाने का, समझना होगा कि ये हमारा मुगालता हो सकता है कि हम बाज़ार को समझने लगे हैं लेकिन बाज़ार हमें ये मौका नहीं देता है। वो हमको अपने एक उत्पाद की तरह तैयार करता है, वो उत्पाद जो उसके बाकी उत्पादों को बेचे और ज़रूरत पड़ने पर खुद भी बिक जाए। हां, बाज़ार आपको ये भरोसा भी देता रहता है कि आपका बाल भी बांका नहीं होगा। आईबीएन 7 के परिप्रेक्ष्य में आशुतोष संभवतः ख़ुद भी सोच पा रहे हों आप को याद है आशु भाई, लगभग हर जगह, हर मंच से आप बार बार चीखते थे कि बाज़ार से इतना डर किसलिए…बाज़ार से डरो मत…उसे अपनाओ उसे साधो…तब हम हर बार कहते थे कि बाज़ार किसी का नहीं होता…आप और ज़ोर से चीखते थे…बाकी लोग चुप हो जाते थे… आज आप चुप हैं सम्पादक जी और बाकी सब चीख रहे हैं…कुछ रो भी रहे हैं…आपको पता है कि आपकी बच्चों जैसी ज़िद ने आपको आज कहां ला खड़ा किया है…

आज आपसे सवाल हो रहे हैं लेकिन आप चुप खड़े हैं, हो सकता है कि आप ने कुछ योग्य लोगों को बचा लिया हो, लेकिन जो उतने योग्य नहीं थे उनको निकाल देना भी तो जायज़ नहीं न…फिर अब क्या होगा उन परिवारों का जो आश्रित थे आप पर…उन साथियों का क्या जो आपके कह देने भर पर रात को दफ्तर में ही रुक कर स्पेशल तैयार करवाते थे…

उस टीम के लिए क्या आप कुछ नहीं कहेंगे, जिन्होंने नया ग्राफिक्स और ले आउट तैयार किया…ये सोच कर कि शायद उनकी मेहनत से संस्थान आगे बढ़े…उन साथियों के लिए कुछ कहें जो कई बार सुबह 7 बजे घर से रिपोर्टिंग पर निकलते थे और आपके शो के लिए एक बाइट लेने या गेस्ट अरेंज करने के लिए 12 घंटे से भी ज़्यादा फील्ड में डंटे रहते थे…आपको याद है वो असिस्टेंट प्रोड्यूसर जो असाइनमेंट हेड के हिस्से की गालियां भी सुनता था…और वो शर्मीला सा लड़का जिसको इंटरटेनमेंट की तेज़ तर्रार लड़कियों के बीच छोड़ दिया गया था…फिर भी वो काम उतनी ही शिद्दत से करता रहा…वो लड़की आप की आंखों के सामने घूमेगी क्या, जो एक छोटे से शहर से बड़े सपने लेकर बाहर निकली थी…और अपनी मेहनत के दम पर आपके यहां लगातार न केवल काम करती रही…बाज़ार के मुताबिक टीआरपीसी भी देती रही…

आशु भाई…मैं बहुत लिखता रहा हूं…आप सब के खिलाफ़…चाहता हूं बहुत तीखा लिखूं…इतना कि आप तिलमिला उठें…पर जानता हूं कि आप हमेशा ही अपनी नई बाज़ारू वैचारिकी के खिलाफ बोले-लिखे जाने पर तिलमिला ही उठते थे….अब शायद उसकी ज़रूरत नहीं है…

मैं तीखा नहीं लिखूंगा…मैं चाहता हूं कि आप सोचें…आप भावुक हों…आप रोएं…और पछताएं कि आप बाज़ार का आंख मूंद कर समर्थन क्यों करते रहे…शायद आपको लगा होगा कि वो कभी आपका साथ देगा…याद रखिए प्रबंध सम्पादक जी…बाज़ार भस्मासुर है…सबको जला कर राख कर देगा…याद रखिएगा कि सिसकियां हों किसी की भी, सोने आपको भी नहीं देंगी…नहीं देंगी…नहीं देंगी… हम आप से नाराज़ नहीं हैं…बशर्ते आप ख़ुद से नाराज़ रहें…हमेशा रहें…हम उम्मीद करते हैं कि आप अपने आप को कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे…कभी नहीं…

लेखक मयंक सक्सेना सरोकारी पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं. मयंक पिछले दो महीने से उत्तराखंड के आपदाग्रस्त इलाकों में राहतकार्य का नेतृत्व करके लौटे हैं. वे कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं.

(सौ: भड़ास)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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