/मेरे सम्पादक , मेरे संतापक: बीमार-ए-गम मसीह को हैरान कर गया…

मेरे सम्पादक , मेरे संतापक: बीमार-ए-गम मसीह को हैरान कर गया…

मेरे सम्पादक , मेरे संतापक -23                                                         पिछली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

 -राजीव नयन बहुगुणा||

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष अमित सेन गुप्ता और वहीं के एक अन्य छात्र हर्ष पति डोभाल उस क़यामत की रात टिहरी में ही थे. साहित्यकार विद्या सागर नौटियाल के घर सो रहे उन दोनों को अलसुबह झकझोर कर जगाया गया. दोनों पट्ठे टेलीफोन एक्सचेंज की और भागे. उनका भी रात का नशा काफूर हो गया.jnu

हमारे पंहुचने से पहले ही एम्स में जे एन यु के छात्रों का जमघट लग चुका था . मेरे छोटे भाई की सूचना पर बी बी सी लन्दन ने भी सुबह से ही सुंदर लाल बहुगुणा के अपहरण की खबर चिंघाड़ चिंघाड़ कर प्रसारित करना शुरू कर दी थी. अर्थात एम्स में करीब पांच सौ उद्वेलित लोगों का मजमा घंटों से खडा था. निसंदेह, इनमें खुफिया एजेंसियों के लोग भी शामिल थे. मेरे मित्र ने डाक्टर का कालर पकड़ कर उसे भीड़ के सामने ला खडा किया – थिस इज डाक्टर चमोली . द मेन कल्प्रित बीहाइंड दिस कोंसपेरेंसी. कैमरों की आँखें चमचमा उठीं.

जे एन यु की एक लड़की सैंडिल लेकर डाक्टर की और मारने लपकी,  मैंने डाक्टर को आगोश में भर कर बचा लिया, और उसे भीतर ले जा कर बोला – चमोली, तू चुल्लू भर पेशाब में डूब मर साले. गढ़वाली होकर भी तूने यह झूठी रिपोर्ट बनायीं. मैं मजबूर था , मेरी रोज़ी – रोटी का सवाल है , घिघिया कर डाक्टर चमोली बोले . स्वयातशाषी संस्थान एम्स के डाक्टर दवे और सरकारी नौकर डाक्टर चमोली, दोनों के बीच का भेद मेरी समझ में आ गया. पांच साल तक कठोर प्रयोगों से गुज़र कर विशेषज्ञता हासिल करने वाला एक डाक्टर दो कौड़ी के नौकरशाहों के सामने बे- बस था.

मेरे सम्पादक , मेरे संतापक -24

क़ातिल ने किस सफ़ाई से धोयी है आस्तीन
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कुछ ही देर बाद एम्स की इमरजेंसी में मेनका गांधी और सुषमा स्वराज पंहुच गयीं . मेनका के साथ उनका हट्टा – कट्टा शिशु भी था . ऐसे नहीं , पाँव छू कर आशीर्वाद लो इनका , मेनका ने अपने बेटे से कहा . मैं उस बच्चे को देख कर तभी समझ गया था की अगर यह कभी राजनीति में आया , तो जनता को उंगलियाँ काटने की धमकी अवश्य देगा .

( जारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.