/मेरे सम्पादक, मेरे सन्तापक: बार गाहे सोज़ो साज़…

मेरे सम्पादक, मेरे सन्तापक: बार गाहे सोज़ो साज़…

-राजीव नयन बहुगुणा||
जनता और मीडिया को अपने खून का प्यासा देख प्रशासनिक अमला वहां से चम्पत हो चुका था. कुछ देर बाद प्रधान मंत्री नरसिम्हा राव के विशेष कार्याधिकारी युगांधर वहां आये. आप यहाँ क्यों पड़े हैं, चलिए कहीं होटल में, युगांधर के इस सवाल का जवाब मैंने दिया -आप भी खूब हैं श्रीमान. क्या हमें यहाँ आने का कोई शौक़ था ? मेरे पिता मौन व्रत धारण कर चुके थे.madhu kishwar

यद्यपि एक पुलिस वाला हवाई अड्डे पर ही उनके लिए खादी भण्डार से एक जोड़ी कुर्ता – पायजामा ला चूका था, लेकिन वह कच्छे में ही रहे, दुनिया को देखने दो की तुमने मेरे साथ क्या किया है. एम्स के अधीक्षक डाक्टर दवे ने केन्द्रीय गृह मंत्री तथा स्वास्थ्य मंत्री को दस्ती ख़त भेजा – सुंदर लाल बहुगुणा को उत्तर प्रदेश के कुछ अधिकारी यहाँ लाकर पटक गए हैं. वह हमारे इमरजेंसी वार्ड में हैं. उनकी वजह से अन्य मरीजों को दिक्क़त हो रही है, और उन्हें कभी भी भयानक इन्फेक्शन हो सकता है. इसके बाद उन्होंने मेरे पिता के सम्मुख अवनत हो कर कहा – चलिए. अब हम एम्स के वी आई पी वार्ड में थे.

मानवाधिकार वादी मधु किश्वर मुझे अपने घर ले गयी. उनके काँधे पर सर रख कर मैं फूट पडा. बहादुर बाप के बेटे हो, क्या कर रहे हो यह ? मधु ने मुझे लताड़ा.

मेरे सम्पादक , मेरे संतापक — २६ 

तू तीर आज़मा , मैं जिगर आजमाऊँ

मधु से मैंने जेब खर्च के लिए सौ रुपये मांगे . मुझे सिगरेट पिए कयी घंटे हो चुके थे . मधु को लोग नारीवादी समझने की भूल कर बैठते हैं, जब कि वह शुद्ध मनुष्य वादी हैं. शायद मधु ने, या किसी और ने मुझे दो जोड़ी कपडे खरीद कर दिए. मुझे ठीक ठीक याद नहीं कि किसने दिए. कुछ ही देर में संज्ञा लाभ कर, मैं मधु के घर से एम्स लौट आया. वहां भीड़ बढ़ चुकी थी तथा कैम्पस में ही धरना स्टार्ट हो चुका था. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश माननीय वी एम् तर्कुंदे की पहल पर मेरे पिता को नरसिम्हा राव का फोन आया. मेरे पिता फोन पर इतनी जोर से चीखे कि मुझे लगा उन्हें अभी दिल का दौरा पडेगा. मैंने अंग्रेजों से लड़ाई लडी, और तुमसे भी भरपूर लडूंगा. तुम्हारी तरह बिकाऊ फ्रीडम फाइटर नहीं हूँ मैं. प्रधान मंत्री ने भी ऎसी लताड़ पहली और आखिरी बार सुनी होगी .
( जारी है )
( जारी रहेगा )

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.