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मेरे सम्पादक, मेरे संतापक: और होंगे तेरे मैख़ाने से उठने वाले…

By   /  August 23, 2013  /  No Comments

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मेरे सम्पादक, मेरे संतापक – 27                                                                पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा||

डोंट ट्राई टू बार्गेन विद मी अगेन, ” मेरे पिता प्रधान मंत्री पर मुसलसल बरस रहे थे. मेरी अंग्रेज़ी जितनी वीक है मेरे पिता सुन्दर लाल बहुगुणा की उतनी ही पुष्ट. आखिर जब उन्होंने मुझे अंग्रेज़ी सिखानी थी तब तो वह स्वतंत्र भारत की जेलों में थे. मैंने उनके हाथ से फोन छिना और प्रधान मंत्री से क्षमा याचना की – यह उद्विग्न हैं मान्यवर, मैं शर्मिन्दा हूँ.P-V-Narasimha-Rao

खलक खुदा का, मुलुक बादशाह का

सचमुच कुछ नही खा रहा क्या ये? और तुम्हारा क्या नाम है डॉक्टर? मैंने प्रधान मंत्री के इस प्रश्न का विनम्र जवाब दिया – सर मैं डॉक्टर नहीं, उनका आत्मज हूँ. ओह, महान पुरुष के सुपुत्र हैं आप, नरसिम्हा राव ने पैंतरा बदलते हुए कहा. इससे पहला प्रश्न उन्होंने मुझे एम्स का डाक्टर समझते हुए अंग्रेजी में किया था. अब बहुभाषाविद छली नरसिम्हा राव मेरी ही तरह संश्लिष्ठ हिन्दी में बात करने लगे.

कोयम अद्वेत्वादः

निबिड़ अलंकारों से खचित दुर्दम्य हिन्दी मुझे राजेन्द्र माथुर ने सिखाई थी, जो अन्यथा बोध गम्य भाषा प्रयोग करने का दम भरते थे. श्रीमान, इस महान राष्ट्र में कई विश्व विजेता आये और गए, लेकिन कुछ द्वीप अभी भी अविजित हैं. जो हजारों, बल्कि लाखों साल बाद आज भी क्रूर और दम्भी शासकों को चुनौती दे रहे हैं, मेरे इस वाक्यांश पर नरसिम्हा राव ने फोन काट दिया.

ख़ूब शुद, असबाबे- ख़ुद बीनी शिक़स्त

उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन के नेतृत्व में कई वक़ील भी मोर्चा संभाल चुके थे. आज़ादी बचाओ आन्दोलन के पुरोधा प्रोफ़ेसर बनवारी लाल शर्मा की आपातकालीन याचिका पर इलाहबाद हाई कोर्ट की विशेष बेंच ने यू पी गवर्नमेंट को आदेश दिया – सुंदर लाल बहुगुणा को, डाक्टर की देख रेख में, हिफाज़त के साथ सम्मान सहित इस न्यायालय में पेश किया जाये. उनके साथ की जाने वाली कोई भी बदसलूकी इस अदालत की अवमानना के फलस्वरूप दंडनीय होगी.

कैसे उसको झेलूं मैं, कैसे उसकी ले लूँ मैं

इस बीच एक अप्रिय प्रसंग घटित हुआ. एक जिज्ञासु मेरे पास आया. वह मुझसे इंट्रो लगाने के गुर सीखना चाह रहा था. दर असल मेरे संघी सम्पादक दीना नाथ मिश्र कई साल पहले मेरे बारे में अक्सर दारु पीकर यह प्रचारित करते आ रहे थे की हेडिंग और इंट्रो लगाना कोई उससे सीखे. वह खुद को पत्रकार बता रहा था. दीना नाथ से मेरे खट्टे – मीठे रिश्ते थे. मैं उनका आदर करता था. आज भी करता हूँ. दीना बाबू का नाम सुनते ही मैं उसे किनारे ले गया. उसने मेरे पेट में कोई आयुध भोंकने का उपक्रम किया ही था कि मैं संभल गया. वह दीना नाथ का आदमी न होकर कोई और था. यह दीना बाबू ने मुझे कई साल बाद एक अर्ध रात्रि को प्रेस क्लब में बताया.

(जारी)                                                  अगली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें…

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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