/मेरे सम्पादक, मेरे संतापक: तू यहाँ बाप की शादी में नही आया है…

मेरे सम्पादक, मेरे संतापक: तू यहाँ बाप की शादी में नही आया है…

मेरे सम्पादक, मेरे संतापक –  29                                                 पिछली कड़ी के लिए यहाँ क्लिक करें…

-राजीव नयन बहुगुणा||

दो न्यायाधीशों में एक पंडित मदन मोहन मालवीय के पौत्र थे, जिनकी श्लाघा एक उर्दू शायर दशकों पहले कर चुके थे – ओ बनारस के बिरहमन मालवी, ओ मदन मोहन महामन मालवी. जस्टिस का नाम नहीं बताऊंगा, तुम खुद ही समझ जाओ, मैं नाम नहीं लूँगा. न्यायमूर्ति ने खड़े होकर, दोनों हाथ जोड़ कर, अवनत होकर मेरे पिता की अभ्यर्थना की. क्या एक न्यायाधीश के लिए ऐसा करना समीचीन था? मैंने अपने वकील मित्र से बाद में पूछा. हाँ, ऐसा हो जाता है कभी कभी. आखिर गांधी को कड़ी सजा सुनाने वाले ज़ज़ ने भी ऐसा ही किया था, मेरे वकील मित्र ने मेरी शंका का समाधान किया, जो आजकल खुद भी एक ज़ज़ हैं.allahabad-high-court

मेरे पिता सुंदर लाल बहुगुणा ने अदालत में खड़े होकर अपना बयान शुरू किया – मैं एक न्यायाधीश, पुलिस अधिकारी और वन संरक्षक का बेटा हूँ. दर असल मेरे अर्ध शिक्षित दादा अम्बा दत्त बहुगुणा टिहरी नरेश के कृपा भाजन होने के फलस्वरूप कई उच्च पदों पर काम कर चुके थे, जिस नरेश का ताज़ो – तख़्त मेरे पिता को नोच कर, सरदार वल्लभ भाई पटेल की शह पर नोच के फेंकना था.

तेरी निगाहे – करम है तो क्या कमी है मुझे

सामजिक, राजनैतिक और पारिवारिक तनावों से श्लथ हो कर मैं कभी अर्ध रात्रि के बारह बजे तो, तो कभी भोर के तीन बजे कमर वहीद नक़वी को फोन कर भौंकता – तू भी मर गया मेरे लिए, अब इस पृथ्वी नामक उपग्रह पर मेरा कोई खेवन हार नहीं है. मैंने शराब पीकर अपने पिता और नक़वी दोनों को सर्वाधिक सताया. लेकिन दोनों ने मुझे सदैव पनाह दी. सुबह दफ्तर आने पर नकवी के भाव विन्यास से लगता ही नहीं था कि कल रात कोई अप्रिय वार्ता हुयी है. आखिर बड़प्पन एक यथेष्ठ सहनशीलता चाहता है, जो दुर्लभ है.

यह चारागर

राजीव नयन बहुगुणा
राजीव नयन बहुगुणा

इलाहाबाद के सी एम ओ अपनी मण्डली के साथ इस न्यायालय में तत्काल पेश हों, न्यायमूर्ति ने यह हुकुम सुनाते हुए अपनी आँखें पोंछी. मी लार्ड, आपको विदित ही होगा की मैंने एलोपैथी इलाज़ सिर्फ मजबूरी में एक बार स्वाधीनता संग्राम के समय क़ैद में रहते हुए लिया था, मेरे पिता ने घबरा कर कहा. आप चिंता न करें, आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा, आपका पुत्र तथा वैयक्तिक डाक्टर भी साथ रहेगा. आपके बारे में मेरे पिता से मैं सब कुछ सुन चुका हूँ बहुगुणा जीं, न्यायाधीश ने कहा.

यस्य स्मरण मात्रेण

कस्टडी में लो इसे, यू पी सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ आईएएस एस को इंगित करते हुए न्यायमूर्ति ने आदेश दिया. सर यह तो मेरे रिश्ते के बड़े भाई हैं, आईएएस धीरेन्द्र बहुगुणा का बचाव करते हुए मैंने कहा.

तमीज़ से खडा रह . मुंह से हाथ हटा . गर्दन नीचे कर, आँख झुका, तू यहाँ बाप की शादी में नही आया है , न्यायाधीश ने आईएएस को कहा. या मैं सिखाऊं तुझे कोर्ट में खड़े होने की तमीज़? अतिशय विनम्र न्यायाधीश की इस धमकी पर मैं खुद भी हैरान था

(ज़ारी)

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.