/आईपीएस नजरुल ने ममता बनर्जी के खिलाफ दर्ज किया फौजदारी मुकदमा…

आईपीएस नजरुल ने ममता बनर्जी के खिलाफ दर्ज किया फौजदारी मुकदमा…

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||
अभूतपूर्व प्रशासनिक संकट है बंगाल में इन दिनों. बाकी देश में भी इसकी कोई नजीर है या नहीं मालूम. राज्य सरकार की सेवा में रहते हुए वरिष्ठतम आईपीएस अफसर ने मुख्यमंत्री के खिलाफ फौजदारी मुकदमा दर्ज करा दिया. Nazrul_Islam
एक समय मुख्यमंत्री के घनिष्ठ रहे साहित्यकार पुलिस अफसर नजरुल इस्लाम ने इससे पहले मुख्यमंत्री पर अल्पसंख्यकों के साथ छलावा करने करने का आरोप ही नहीं लगाया बल्कि पूरी एक किताब लिखकर प्रकाशित कर दी, वे लगातार सख्त भाषा में मुख्यमंत्री की आलोचना करते रहे हैं. इस मुताल्लिक उनके खिलाफ अभियोगपत्र भी दायर हो गया और उनकी पदोन्नति भी रुक गयी.
दरअसल इसी पुस्तक को लेकर ही दोनों के संबंध बिगड़ गये. वरना ममता बनर्जी जब रेलमंत्री थी, तब उनके सबसे नजदीक रहे हैं नजरुल इस्लाम. तब वाम जमाने की भी उन्होंने खुलकर आलोचना की थी. मुख्यमंत्री बनने के बाद दीदी के करीब ही रहे हैं नजरुल. पर नजरुल इस्लाम देश भर में शायद विरले ही पुलिस अफसर हैं जो प्रतिष्ठित साहित्यकार भी हैं और उनकी कलम उनकी वर्दी पर हमेशा भारी पड़ती रही है.
वाम शासन की जितनी आलोचना की उन्होंने, उससे कम वे दीदी की नीतियों का विरोध नहीं कर रहे हैं. यहां तक फिर भी ठीक था. दमयंती सेन से लेकर पचनंदा तक तमाम पुलिस अफसरान किनारे भी किये जाते रहे हैं. लेकिन आईपीएस पुलिस अफसर नजरुल इस्लाम ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, मुख्यसचिव संजय मित्र और गृहसचिव वासुदेव बंद्योपाध्याय के खिलाफ फौजदारी मामला दायर करके खुली बगावत कर दी है.
नजरुल के मुताबिक ये तमाम लोग उन्हें नाजायज ढंग से परेशान कर रहे हैं. हालांकि इस बारे में नजरुल ने सार्वजनिक तौर पर मुंह नहीं खोला है. वे कहते हैं कि अभी उन्हें इस बारे में कोई बात नहीं करनी है. लालबाजार भी अजब पशोपेश में है, वहां भी हर जुबान पर ताला है. कोलकाता के हेयर स्ट्रीट थाने में 17 अगस्त को नजरुल ने यह मामला दर्ज कराया है. जिसमें उन्होंने साफ तौर पर आरोप लगाया कि है कि उन्हें बेइज्जत करने के लिए जालसाजी भी की गयी है.
मालूम हो कि अल्पसंख्यकों के बारे में लिखी उनकी पुस्तक पर सरकार को कड़ा ऐतराज रहा है. एक वक्त तो इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने की भी तैयारी हुई और इसे लेकर खूब हंगामा हुआ. बहरहाल किताब प्रतिबंधित नहीं हुई लेकिन सरकारी सेवा में रहते हुए कोई ऐसी पुस्तक कैसे लिख सकता है, इसे लेकर नजरुल के खिलाफ विभागीय जांच पड़ताल हुई. नजरुल पर सांप्रदायिकता भड़काने का आरोप लगा. लेकिन रजिस्ट्रार आफ पब्लिकेशन ने नजरुल को क्लीन चिट देते हुए साफ कर दिया कि उनकी पुस्तक में आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है.
इसके बाद मुख्यमंत्री को भेजे अपने गोपनीय पत्र को लेकर भी नजरुल विवाद में फंस गये. मुख्यमंत्री की शुभकामनों के जवाब में तीखी प्रतिक्रिया भेजी नजरुल ने. जिसे प्रशासनिक दृष्टि से विष वमन ही माना गया. इससे मुख्यमत्री से उनके संबंध और क़टु होते गये. क्रमशः वे किनारे लगते गये और उनकी प्रतिक्रियाएं तीखी से तीखी होती गयीं. nazrul islam
नजरुल ने बाहैसियत रेलमंत्री ममता बनर्जी के लगातार अनैतिक कार्यकलापों का खुलासा किया. यहां तक कि रेल मंत्रालय में गैरकानूनी आर्थिक लेनदेन ममता के कार्यकाल में हुए, ऐसे आरोप भी लगाये नजरुल ने. जाहिर है कि संबंध बिगड़ने में रही सही कसर पूरी हो गयी. उनके इन आरोपों के जवाब में ही राज्य सरकार की ओर से जवाबी कार्रवाई शुरु हो गयी.
बताया जाता है कि उनकी किताब पर प्रतिबंध की कोशिश भी इन्हीं आरोपों की प्रतिक्रिया में हुई. मुख्यमंत्री के खिलाफ गंभीर आरोप लगाने की वजह से नजरुल के खिलाफ दुबारा चार्जशीट जारी की गयी. इसके जवाब में नजरुल ने जवाबी मामला दायर कर दिया. सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में इस मामले की सुनवाई होने लगी और नजरुल की पदोन्नति रोक दी गयी. इस पर राज्य सरकार को पत्र लिखकर नजरुल ने आरोप लगाया कि अनैतिक तरीके से उनकी पदोन्नति रोक दी गयी है. उन्होंने तभी चेतावनी दे दी थी कि निर्दिष्ट समय के भीतर उन्हें उनके पत्र का जवाब न मिला तो वे फौजदारी मामला दर्ज करायेंगे. वह अवधि पार हो गयी और सचमुच नजरुल ने फौजदारी मुकदमा दर्ज करा ही दिया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.