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बाड़मेर में रिफाइनरी के लिए पानी कहाँ से लाओगे अशोक जी…

क्या प्यास बुझाये प्यासों की, प्यासा है खुद पैमाना…

 -सुग्रोवर||

बिना राजनैतिक दूरदृष्टि के बाड़मेर में रिफाइनरी की स्थापना इतनी आसान नहीं है जितनी कि समझी जाती रही. मीडिया दरबार ने राजस्थान विधानसभा में इस साल की बजट घोषणाओं का अंदाज़ा लगते ही चेता दिया था कि बजट में बाड़मेर रिफाइनरी के लिए पानी के इंतजाम को दरकिनार कर दिया गया है और रिफाइनरी के लिए ज़रुरत अनुसार पानी की व्यवस्था के बिना राजस्थान में रिफाइनरी के सपने देखना भी बेमानी है. मगर अब यह साबित हो गया है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री दूसरे नेताओं को पटखनी देने में भले ही माहिर रहे हों मगर उनके पास राजस्थान में रिफाइनरी की स्थापना के लिए व्यापक सोच ही नहीं रही.Ashok Gehlot

अब रिफाइनरी की स्थापना से पहले एचपीसीएल ने राज्य सरकार से रिफाइनरी में काम आने वाले 50 से 60 लाख गैलन पानी प्रतिदिन उपलब्ध करवाने की गारंटी मांगी है. बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी इलाके में पहले ही पानी की कमी के चलते सरकार के सामने इंदिरा गांधी नहर से इतनी बड़ी मात्रा में पानी उपलब्ध करवाना सबसे बड़ी चुनौती है. मीडिया दरबार ने इसी साल तीन मार्च को विशेषज्ञों से बातचीत के आधार पर राज्य सरकार को चेताने का प्रयास किया था कि बाड़मेर रिफाइनरी में उत्पादन शुरू होने पर काफी बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होगी लेकिन राजस्थान सरकार और अन्य नेताओं को इस ओर ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं थी. अब एचपीसीएल द्वारा राजस्थान में रिफाइनरी की स्थापना से पहले 50 से 60 लाख गैलन पानी प्रतिदिन उपलब्ध करवाने की गारंटी मांगे जाने ने न केवल राजनीति के माहिर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की नींद ही ख़राब कर दी है बल्कि जल्दबाजी में बाड़मेर में रिफाइनरी की घोषणा को हवाई घोड़े साबित कर दिया है.

दरअसल राजस्थान में रिफाइनरी की घोषणा महज़ राजनैतिक गोटियाँ सेकने का औजार बन चुकी है. इसी के चलते रिफाइनरी को पानी पहुँचाने की किसी योजना पर काम किये बिना आनन फानन में रिफाइनरी की घोषणा कर दी गई. राजस्थान सरकार ने कभी यह सोचा भी नहीं कि रिफाइनरी के लिए क्या क्या जरूरतें है. अशोक गहलोत सरकार ने हालाँकि इंजिनियर इंडिया लिमिटेड से आग्रह कर एक DFR (Detailed Feasibility Report) तैयार करवाई थी. यह रिपोर्ट साफ़ कहती है कि रिफाइनरी के लिए जितने पानी की आवश्यकता होगी वह पहले से प्यासा बाड़मेर जिला पूरी नहीं कर पायेगा. आप सोचते होंगे कि क्या पानी इतनी बड़ी समस्या है? जी हाँ! बाड़मेर के भूगर्भ में इतना पानी है ही नहीं कि वो किसी रिफाइनरी की प्यास बुझा सके. इसके लिए सरकार को पहले रिफाइनरी स्थल तक पानी का इंतज़ाम करना होगा. मगर सरकार ने आज तक इस मुद्दे पर सोचा ही नहीं और ना ही बजट में इसके लिए कोई प्रावधान किया. जबकि यह इंतज़ाम इंदिरा गाँधी नहर की एक शाखा रिफाइनरी स्थल तक ला कर किया जा सकता है (जो कि असम्भव तो नहीं पर चुनौती पूर्ण और बेहद खर्चीला काम है) या फिर किसी बड़े जल स्रोत से एक बड़ी पाइपलाइन रिफाइनरी स्थल तक डाली जाए.

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गौरतलब है कि कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए प्रतिदिन करीब 50 लाख गैलन पानी की जरूरत होती है जिसमें से काफी बड़ी मात्रा में पानी प्रदूषित हो जाता है बाकी के पानी को रिसाइकिल किया जा सकता है. इसी कारण अब तक स्थापित की गई अधिकांश रिफाइनरियां समुद्र तट पर होती हैं और एचपीसीएल के लिए भी यह पहला ही मौका होगा जब किसी मरु क्षेत्र में इतनी बड़ी रिफाइनरी की स्थापना की जाएगी. समुद्री तट पर एचपीसीएल की अभी दो रिफाइनरियां है एक मुंबई तट पर जहां से 6.5 मिलियन टन तेल प्रोसेस किया जा सकता है जबकि दूसरी विशाखापट्टनम में जिसकी क्षमता करीब 8.3 मिलियन टन है. समुद्र तट पर होने के के कारण अन्य रिफाइनरियों से प्रोसेस किया हुआ तेल आसानी से निर्यात भी किया जा सकता है जबकि राजस्थान में रिफाइनरी में उत्पादन के बाद तेल को निर्यात करने के लिए पश्चिमी तट तक ले जाने के लिए लंबी पाइपलाइन बिछानी होगी. दूसरी ओर, राजस्थान की रिफाइनरी में ही मंगला क्षेत्र से कच्चा तेल लाने के लिए पचपदरा तक नई पाइपलाइन डालनी होगी. जानकारों के अनुसार रिफाइनरी के काम में जुटी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन जैसी सबसे बड़ी तेल उत्पादक कंपनी भी अपनी नई रिफाइनरी ओडिशा के समुद्री तट स्थित पारादीप में लगाने जा रही है ताकि उसे कभी भी पानी की समस्या से दो चार न होना पड़े.

रिफाइनरी की घोषणा से पहले मीडिया दरबार पर प्रकाशित रिपोर्ट…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.