/तो क्या एक लड़की फ़ोटोग्राफ़र नहीं बन सकती…

तो क्या एक लड़की फ़ोटोग्राफ़र नहीं बन सकती…

-राजेश भारद्वाज||

इस देश में रोज़ हज़ारों की संख्या में बलात्कार होते है. कोई ख़ास तव्जों नहीं देता. थोड़ी बहुत पहुँच या पैसा हो तो FIR दर्ज हो पाती है. इस भ्रष्ट व्यवस्था में जहाँ बग़ैर रिश्वत दिए सामान्य लोगों को कुछ भी हासिल नहीं होता. वहां आप कल्पना करें कि यदि एक स्त्री बलात्कार की शिकायत करें, किसी पैसे वाले समर्थ व्यक्ति के ख़िलाफ़ तो उसका क्या हश्र होगा! आप समझ सकते है कि व्यवस्था का ऊँट किस करवट बैठेगा. किसी गिध्द की भांति नज़र रखे हर पद एक सतर्क भेड़िया बैठा है, जो अतिरिक्त कमाई के सारे पैतरे जानता है. बहुत सारी जगहों पर तो संत्री से लेकर मंत्री तक ने अपना नेटवर्क तैयार कर रखा है.a girl

हक़ीक़त तो यह है कि हम ग़रीब लौंगों का बलात्कार की शिकायत करने पर हर स्तर पर बार बार बलात्कार होता है. ख़बर कर देने पर हमारा पुरूष प्रधान समाज सबसे पहली सजा तो उस स्त्री और उस परिवार के ख़िलाफ़ ही तो सुनाता है. वे सामाजिक रूप से तिरस्कृत हो जाते है. उस स्त्री के विवाह और सामान्य जीवन जी सकने संभावना क्षीण भर ही होती है.

ज़रा सोचिए अपराधियों का सामना करते हुए जिस बहादुर लड़की ने अपने प्राण त्याग दिए उस निर्भया का हम वास्तविक नाम तक नहीं जानते. उसका नाम ऐसे छुपाया गया जैसे उसने कोई अपराध किया था. नाम सार्वजनिक न करना हमारी इस मानसिकता का बड़ा सबूत है.

मुम्बई की घटना में वह लड़की अकारण ही अपने दोस्त को लेकर नहीं गयी थी, ना ही वह उस काम का हिस्सा था. दोस्त को अपने कार्य हेतु लेकर जाना भारतीय समाज में स्त्री होने की विकलांगता है. यदि वह लड़का होती तो न उसे किसी को साथ ले जाने की ज़रूरत होती और ना ही कुछ हुआ होता. शायद महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने कुछ सोच कर महिला पत्रकारों को सशस्त्र पुलिसकर्मी साथ ले जाने का प्रावधान किया है. लेकिन सर बाक़ी स्त्रियों का क्या? कहीं ऐसा तो नहीं मान लिया गया कि वे मोबाईल में खींची गयी तस्वीर से डर कर चुप बैठ जाएगी.

वैसे हम सभी जानते है की जिस बड़ी संख्या में बलात्कार के मामले सामने आ रहे है, हक़ीक़त उससे कहीं ज़्यादा बदतर है. शुक्र है कि सिर्फ महानगरों में इन पर इतना हल्ला मचता हैं. वर्ना तो इस देश मे सरकार चलाना ही मुश्किल हो जाता !

मैं घरेलू हिंसा, पर्दाप्रथा, छेड़छाड़, स्त्री भ्रूण हत्या, पोषण में भेदभाव , तेज़ाब से चेहरा जला देना किसी की बात नहीं कर रहा हूँ. मुझे डर है कहीं लड़कियाँ यह ना समझ ले कि एक लड़की फ़ोटोग्राफ़ी नहीं कर सकती.

वैसे मुझे आदत सी हो गयी है “स्त्रियों के नर्क” इस देश में रहने की.

बुरा मत मान जाना बस कभी कभी डर जाता हूँ .

(राजेश भारद्वाज की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.