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अब दैनिक भास्कर में छंटनी का दौर शुरु…

-विनीत कुमार||

अब दैनिक भास्कर में छंटनी का दौर शुरु. 1 सितंबर से शायद बंद हो जाए दिल्ली संस्करण. दर्जनों पत्रकार फिर से दूसरे अखबारों और संस्थानों में जाकर वहां काम कर रहे लोगों के लिए संकट पैदा करेंगे. मैंने अबकी बार सड़क पर आ जाएंगे शब्द का प्रयोग नहीं किया क्योंकि नेटवर्क-18 मामले में हमने देखा कि अधिकांश सीएनएन-आइबीएन,आइबीएन-7 से छंटकर उन चैनलों में फिट हो गए जिसे नेटवर्क 18 की अटारी पर चढ़कर कमतर बताकर कोसते रहे.Dainik-Bhaskar-Group-Logo

दैनिक भास्कर से छांटे गए लोग संभवतः इसी तरह अपने से कमतर के संस्थान में जाएं और वहां काम कर रहे लोगों के लिए संकट बनें. मीडिया में आमतौर पर होता ये है कि संस्थान का ठप्पा कई बार इस तरह काम करता है कि नक्कारा और अयोग्य भी अगर नामी संस्थान से घुसकर निकलता है तो सी ग्रेड, डी ग्रेड के संस्थान उस नामी संस्थान को भुनाने के लिए उन नक्कारों को रखकर ढोल पीटते हैं- देखो जी, हमारे यहां लोग आइबीएन 7 छोड़कर आ रहे हैं, स्टार छोड़कर आए हैं. एनडीटीवी इंडिया से निकाले गए उदय चंद्रा को लेकर लाइव इंडिया में इसी तरह के ढोल पीटे जाते थे जबकि हम हैरान हुआ करते कि इसे एनडीटीवी इंडिया ने काम कैसे दे दिया था? वो शख्स भी अजीब नमूने की तरह पेश आता. लैप्पी को ऐसे चमकाता जैसे मिसाइल लिए घूम रहा हो, कभी कायदे से इस पर काम करते नहीं देखा.. बाद में उसके चिरकुट और प्रोमैनेजमेंट रवैये से फोकस टीवी में अपने ही सहकर्मियों के हाथों कुटाई भी हुई थी. खैर, ऐसे छंटनी के शिकार पत्रकार समझौते और कम पैसे में भी काम करने के लिए कमतर संस्थानों में तैयार हो जाते हैं.

एबीपी न्यूज के सीओओ अविनाश पांडे जैसे लोगों की कमी नहीं है जो ये मानते हैं कि ये सब छंटनी-वंटनी लगी रहती है. इसी में लोगों को नौकरी भी मिल जाती है..लेकिन सरजी, हमें तो सिर्फ छंटनी ही दिख रही है, कहीं मिल रही हो तो बताइए..हमारे मीडिया साथी का हौसला बढ़ेगा.

(विनीत कुमार की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.