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आसाराम और दाभोलकर के बीच…

By   /  August 28, 2013  /  9 Comments

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-अली सोहराब||

लाख टके का सवाल है. क्या बलात्कार के मामले में आसाराम बापू गिरफ्तार होंगे या हमेशा की तरह आरोपों के दलदल से साफ बच निकलेंगे? एक और प्रश्न है. क्या डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर के कातिल धरे जाएंगे? चौंकिए मत. दाभोलकर और आसाराम के मामलों में असमानता के बावजूद अखंड रिश्ता है. आसाराम संत हैं, लेकिन उन पर कदाचार का आरोप है. दाभोलकर पाखंड के खिलाफ अलख जगाते हुए मारे गए. एक अपराध का शिकार हुआ, तो दूसरे पर गुनाह की तोहमत है. इंसानों के बीच कभी-कभी ऐसे विरोधाभास अनचाहे जुड़ाव रचते हैं. आसाराम से शुरू करता हूं. 15-20 साल पुरानी बात है. आगरा स्थित दफ्तर में कुछ लोग मेरे सामने बैठे थे, सब के सब धनी-मानी और नामी. उनके मुखिया ने बात शुरू की कि ‘राष्ट्रसंत’ आसाराम बापू कुछ महीनों बाद यहां प्रवचन के लिए आने वाले हैं. हम लोग इस आयोजन की समिति से जुड़े हुए हैं. आप और आपके अखबार से सहयोग की अपेक्षा है. धार्मिक हस्तियों के मामले में मैं हमेशा अज्ञानी रहा हूं. पहले कभी ‘बापू’ का नाम नहीं सुना था. अपने अज्ञान को छिपाए बिना मैंने पूछ लिया कि ये कौन साहब हैं? कुछ सेकंड के लिए कमरे में सन्नाटा पसर गया. उनमें से एक ने बताया कि बापू गुजरात के ‘महान संत’ हैं. वह जहां जाते हैं, लाखों लोग जुटते हैं. उनके प्रवचन किसी अमृत वर्षा से कम नहीं होते.asaram-angree

उन्हीं लोगों ने यह भी बताया कि बापू के प्रवचन के लिए साउंड सिस्टम, तंबू-कनात, भोजन, जलपान आदि के लिए लोग पहले से ही नियत हैं. हमें सिर्फ उनका भुगतान करना है. पत्रकारीय जिज्ञासा में मैंने उनसे पूछा कि तब तो इस आयोजन पर लाखों खर्च हो जाएंगे? कहां से जुटा रहे हैं आप लोग इतना? जवाब साफ-साफ नहीं मिला, पर वह बैठक एक अबूझ खटास के साथ समाप्त हुई. मैंने यह भी पता लगाने की कोशिश नहीं की कि इंतजामात के बारे में उन लोगों के दावे कितने सही या गलत हैं, अलबत्ता अनजाने में ही आसाराम के आने का इंतजार करने लगा. संयोग से वह कोठी मीना बाजार के मैदान में प्रवचन करने वाले थे. मैं जिस मकान में रहता था, उसकी छत और बालकनी से वहां का दृश्य साफ दिखता है. एक दिन मैंने भी मैदान का जायजा लिया और विस्मित रह गया. सैकड़ों बड़े-बूढ़े, औरतें और बच्चे वहां मौजूद थे. बापू नियत समय पर प्रवचन करते थे. लाउडस्पीकर की मेहरबानी से एक दिन सुनने की कोशिश की. नि:संदेह, उन्हें लोगों को जोड़ने और बांधने में महारत हासिल थी. उस दिन यह भी देखा कि बापू मर्सिडीज में चलते हैं और कार से ही दर्शनार्थियों को हाथ हिलाकर आशीर्वाद भी देते रहते हैं.

उनके प्रति लोगों की लालसा और जिज्ञासा स्पष्ट थी. कुछ ही साल पहले अमेरिका के ओरेगॉन में ओशो यानी रजनीश संगीन आरोपों में गिरफ्तार हुए थे. तब उनके हिमायतियों ने कहा था कि संसार की सबसे ताकतवर सरकार जबलपुर के पास जन्मे इस शख्स की ओजस्वी वाणी से घबरा गई. किसी ने यह भी उड़ाने का प्रयास किया था कि यह कुछ भयभीत ईसाइयों की साजिश थी. हकीकत जो भी हो, पर यह सच है कि हम जैसे लोग, जिन्होंने रजनीश के विचारों में एक अलग तरह की आब देखी थी, हताश हुए थे. अखबारों में यहां तक छपा था कि आचार्य से ओशो तक का सफर तय कर चुके रजनीश रॉल्स-रॉयस कारों का बेड़ा रखते थे और यह भी कि उन्हें एक निश्चित तापमान में रहना ही पसंद था. एक शख्स, जो अपने विचारों से सादगी की प्रेरणा देता रहा हो, उसके बारे में ऐसी जानकारी हिला देने वाली थी. अब ‘बापू’ सशरीर सामने थे. उन दिनों मन में सवाल उठते थे कि जिस देश में हम ‘धारयति इति धर्म:’ की परंपरा का पालन करते रहे हों, वहां धार्मिक लोगों को इतने तामझाम की जरूरत क्या है? यदि किसी के विचारों में अलख जगाने की शक्ति है, तो उसे प्रचार की क्या आवश्यकता? हम हिन्दुस्तानी मानते आए हैं कि मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाए.

मतलब, सधुक्कड़ी फक्कड़पन का प्रतीक है. जहां रात हुई, वहीं रम लिए और जो मिला, उसी से पेट भर लिया, पर वहां तो आस्था के नाम पर आयोजन का महाकुंभ लगा हुआ था. बरसों बाद जब ‘बापू’ पर हत्या कराने के प्रयास, बच्चों की बलि, जमीन हथियाने जैसे आरोप लगने लगे, तो उनके प्रति मेरे व्याकुल प्रश्नों की सूची कुछ और लंबी हो गई. हमारे यहां साधुओं के परिवार की परंपरा नहीं है, पर उनके पुत्र भी मिलते-जुलते आरोपों के शिकार होते रहे हैं. पता नहीं, कानूनी एजेंसियों ने अपना काम कितनी तन्मयता से किया, पर यह सच है कि उन पर कोई आंच नहीं आई. इसीलिए यह सवाल उठता है कि क्या इस बार उन पर उचित कानूनी कार्रवाई होगी या उनके ऊपर लगे आरोप गलत साबित होंगे? वह और उनके आश्रमवासी तो पीड़ित कन्या पर झूठ बोलने का दोष मढ़ ही रहे हैं. अगर वह ‘बापू’ का नाम किसी साजिश के तहत ले रही है, तो इसके सूत्रधार कौन हैं? पुलिस ने उसकी डॉक्टरी जांच कराई है. क्या उसे भी ‘मैनेज’ किया गया है? उत्तर के लिए इंतजार करना होगा.

ऐसा नहीं है कि ‘बापू’ इन आरोपों के अकेले शिकार हैं. स्वामी नित्यानंद का मामला आपको याद होगा. तमाम महिलाओं से रिश्ते रखने के आरोपी इस तथाकथित संत को तो 52 दिन जेल में रहना पड़ा था. यह बात अलग है कि अब वह बाहर हैं और उनके प्रवचनों का रंग फिर से चोखा होता जा रहा है. 2010 में एक टीवी चैनल ने तमाम प्रवचनकर्ताओं पर स्टिंग ऑपरेशन किया था. उसमें ये बाबा लोग हवाला के जरिये काले धन को सफेद करने का आश्वासन देते दिखाए गए थे. तब भी सवाल उठा था कि ऐसी कलंक कथाएं कब तक चलती रहेंगी? जाहिर है, ऐसे लोगों के पास धन और जन-बल इतना होता है कि वे अव्वल तो कानून के घेरे में नहीं आते और आ भी जाते हैं, तो नित्यानंद की तरह दोबारा अपने स्वार्थ का सरंजाम जुटाने में कामयाब हो जाते हैं. इसके उलट नरेंद्र दाभोलकर जैसे लोग हमेशा अकेले पाए जाते हैं.

धार्मिक अंधविश्वास के खिलाफ अलख जगाने वाला यह जागृत व्यक्ति दशकों से अपना काम मिशन की तरह करने में जुटा था. इसीलिए जिस तरह यह सवाल फिजा में तैर रहा है कि बापू गिरफ्तार होंगे या नहीं, उसी तरह यह भी गौरतलब है कि दाभोलकर के हत्यारे अपने अंजाम तक पहुंचेंगे या नहीं? उनके कातिल यकीनन कुछ ताकतवर लोगों द्वारा संरक्षित हैं. क्या कमाल है? पाप से जूझने वाले अकेले पड़ जाते हैं और पापी ताकतवर होते जाते हैं. पर यकीन जानिए, यह लाचारी का समय नहीं है. डॉक्टर दाभोलकर की हत्या पर इतना हो-हल्ला मचा कि महाराष्ट्र सरकार को अंधविश्वास विरोधी अध्यादेश लाना पड़ा. उम्मीद है कि सरोकार संपन्न लोग उनके कातिलों को कानून की चौखट तक लाने के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे.

इसके साथ ही एक बात आपको भी तय करनी है. इक्कीसवीं सदी के भारत को डॉक्टर दाभोलकर जैसे लोग चाहिए या शोशेबाजी के जरिये हमारी जेबों से पैसा निकालकर हम ही को धमकाने वाले पाखंडी? भूलिए मत, लोकतंत्र में गेंद कभी-कभी आम आदमी के पाले में भी आती है.

(यह लेख अली सोहराब के ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुका है)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

9 Comments

  1. Mahesh Magar says:

    Jo saccha hindu hai use asaramji bapu mein Ram najar ayega baki to nigure hi jane unhe kya lage

  2. Hariom Sagar says:

    jaha tak jeb khaali karne ki baat hai, unki satsang ne mujhe jeevan ka sacha sukh diya isliye mobile, car, bade makaan, restaurant me khana peena, sharab sab band ho gaya hai. unhone mere paise hi bacahye hai murkh. Aur rahi baat mercedes me ghumne ki toh kya yes adhikar sirf corrupt neta aur tax chor businessman ka hi adhikar hai kya? Bharat me sadhu ke paisa aaye isme aapko kyun jalti hai. aur sandesh bapuji ka sandesh yeh hai ki jeevan me dhan, maan, moh yeh sab aaye toh usey sirf upyog karo upbhog nahi.

  3. Amod Shastri says:

    Amritpal Ampi Baghel g aap kisee aaropi ki baat sunkar kyon apnaa nishkarsh nikaalte hein ? kyaa aap jaante hein ki uske papa ne sant samajh aasaa raam ko laakhon donate kiye the , saath hi apni beti ki education par laakhon kharch kar rahe the , yadi wo mental hoti to uskaa kahin or ieelaaj bhi chalaa hotaa & aasaa raam baapoo k paas duniyaa ko dhokhaa dene k atirikt kyaa or koiee khaasiyat hei , ki wah kisee kaa treatment yaa koiee anya upchaar kar sake ? vastutah ham log aankh waale andhe insaan hein , jin paakhndee baabaaon k kaaran hameshaa desh luttaa pittaa rahaa un paakhandiyon kaa samarthan kar k ham apnaa kyaa parichay de rahe hein ? avam kisee rape peeditaa ko "haraamin" kah denaa hamaari kis maansiktaa ko ujaagar kartaa hei ?

  4. Amod Shastri says:

    AMRITPAL G ! ME IN SABHI SANT MAHAATMAA MAANNE WAALE LOGO PAR BAHUT HI ADHIK DHYAAN DETAA HOON , TATHAA BHARAT K VINAASH KAA ASLI KAARAN BHI SAMAJHTAA HUN | YADI KISEE AESE PAHUCHE HUYE & KHUD KO BHAGWAAN MAANNE WAALE K OOPAR RAPE KAA AAROP LAGE TO USKO NARCO TEST DEKAR KHUD KO BEKSOOR SAABIT KARNE ME KYAA AAPATTI HO SAKTAA HEI ? YADI NAARCO TEST ME AAROP JHOOTHAA PAAYAA JAATAA HEI , FIR US GIRL KAA BHI YAA USKE FAMILY K LOGON KAA BHI NARCO TEST HONAA CHAAHIYE KI IS TARAH K AAROP KAA ASLI WAJAH KYAA HEI ? ISME BHALAA BURAAYI KYAA HEI ?

  5. yaha kewal rajniti ke liye Sadhu,Sant aur Brahmano par lanchhan lagaya jata he. agar sach me aisa hua to itne dino se wo haramin kyo maja le rahi thi. Uske baap ne usko vaha asrim me chhoda tha thik hone ke liye. Kyo ki wo mental thi . Wo pichha chhudana chahti he asrim se

  6. Amod Shastri says:

    YADI AASAA RAAM KHUD KO NIRDOSH KAHTAA HEI , TO USKO CHAAHIYE KI WE POLICE KO KHUD APNAA NARCO TEST KARAANE K LIYE KAHE , WE YADI AESAA NAHI KAHTAA TO POLICE KO CHAAHIYE KI WAH JAROOR AASAARAAM KAA NARCO TEST KARAAYE , OR PATAA LAGAAYE KI ABTAK KITNE LOGON KAA YAH FRAUD SANT BALAATKAAR KAR CHUKAA HEI? WESE AASAA RAAM KAA CHALNE , UTHNE , BETHNE ETC KAA TAREEKAA AEK GUNDE JESAA RAHTAA HEI , NA KI KISEE SANT JESAA , ATAH AASAA RAAM BALAATKAAR JESEE GHATNAA KO ANJAAM DE SAKTAA HEI |.

  7. ASHOK SHARMA says:

    आशा राम के नाम से बबेला क्यों गुजरात के स्वामीनारायण मंदिर ऐसे कुकर्मो के लिए कुख्यात है बैसे भी तो अब आनेबाले समय मै रामायण की जगह आसारामायण और हनुमान चालीसा की जगह मोदी चालीसा पढना पड़ेगा भगबत गीता की जगह आज आंबेडकर ग्रन्थ तो लोग पढ़ ही रहे है

  8. Ashok Sharma says:

    Aasaram ka matalab aesent of b.j.p.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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