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हाय पहले क्यों ना लूटा…

By   /  August 29, 2013  /  1 Comment

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-आलोक पुराणिक||

मिसेज गुप्ता टीवी न्यूज में सोने के भाव देखकर विकट तरीके से रो रही थीं, 34,000 रुपये प्रति दस ग्राम के पार जानेवाला है सोना.

मिसेज गुप्ता का रोना वैसे समझ में आ रहा था, अभी दो घंटे पहले घर से निकलते ही राहजनों ने उन्हे चाकू दिखाकर उनकी सोने की चेन, हाथों की चूड़ियां, कानों के कुंडल उतरवा लिये थे. ऐसी सूरत में पीड़ित से होनेवाला वार्तालाप यूं होता है, जो दो घंटे पहले संपन्न हो लिया था-

हाय, दस तोले ले गये, सौ ग्राम सोना चला गया. इत्ता सोना पहनना कोई अकलमंदी की बात है क्या. सोना तो लाकर में रखकर बताने के लिए होता है, पहनता कौन है उसे.OLYMPUS DIGITAL CAMERA

जमाना खराब है और हमारा इलाका तो जमाने से भी ज्यादा खराब है.

नार्मल सहानुभूति के ये सेशन संपन्न हो चुके थे. अब दो घंटे बाद मिसेज गुप्ता टीवी न्यूज पर सोने के भाव देखकर नये सिरे से चीत्कार कर रही थीं-

हाय मरों ने पहले ना लूटा, एक महीने पहले लूट लेते, तब सोना तीस हजार प्रति दस ग्राम से कम था. हाय लुट गयी मैं तो, पहले लूटते तो कम नुकसान होता, अब तो कित्ती लुट गयी.

जी, जुलाई, 2013 में तो सोना 28000 रुपये प्रति दस ग्राम बिका है, मैंने ही सौ ग्राम के कंगन बनवाये. हाय मिसेज गुप्ता जुलाई में लुटतीं, तो प्रति दस ग्राम छह हजार रुपये बचते. हाय तुम तो अब साठ हजार रुपये से ज्यादा लुटीं-मिसेज वर्मा बोलीं.

मैंने निवेदन किया -मिसेज गुप्ता अब इसका क्या किया जा सकता है कि आपको पहले ना लूटा गया, तब राहजन शायद कम कर्मठ रहे हों. अब आपका रुदन देखकर लगता है कि राहजनों से अपील की जाये कि हर महीने थोड़ा-थोड़ा किश्तों में लूटें, कभी चेन लूटें, कभी चूड़ी लूटें. पूरे साल ईएमआई स्टाइल में लुटो, तो तसल्ली हो रहेगी कि चलो कभी सस्ते में लुटे, कभी महंगे में लुटे. दर्द और दुख का औसत सा निकल आयेगा.

खैर, मिसेज गुप्ता रो रही हैं, सुनने को तैयार नहीं. भईया उचक्कों, रहजनों, प्लीज ईएमआई स्टाइल में लूटो, वरना दुख दोगुना हो जाता है. लुटने का दुख तो अपनी जगह रहता है, पर लुटने से ज्यादा बड़ा दुख इस बात का होता है, कि हाय पहले क्यों ना लुटे.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. bahoooooooot khoooooooooooob

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