/हज़ारों करोड़ की संपतियां हड़पने के भी आरोप हैं आसाराम पर…

हज़ारों करोड़ की संपतियां हड़पने के भी आरोप हैं आसाराम पर…

-शैलेन्द्र चौहान||

जब से दिल्ली में, आसाराम पर जोधपुर में एक नाबालिग लड़की से बलात्कार करने का आरोप लगा है, तब से आसाराम अपने कारनामों और बयानों से लगातार मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं. दिल्ली में एक लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद जब लोग सड़कों पर उतरे थे, तब आसाराम ने बलात्कार के खिलाफ कानून बनाने का विरोध करते हुए बयान दिया था. asaram4
आसाराम के पास अकूत दौलत है, राजनीतिक समर्थन है और अनेकों प्रभावशाली शिष्य हैं. आसाराम स्वयं को भगवान बताते हैं और हमारा निज़ाम यह सुनता रहता है. यह अकारण नहीं है. उनके आश्रम के प्रवक्ता मनीष बगड़िया के अनुसार आज आसाराम के पास 425 आश्रम, 1,400 समिति, 17,000 बाल संस्कार केन्द्र और 50 गुरुकुल हैं. बगड़िया का दावा है कि भारत और विदेश में आसाराम के पांच करोड़ से अधिक अनुयायी हैं. इनमें छात्र, फ़िल्म स्टार्स, क्रिकेटर, उद्योगपति और राजनेता शामिल हैं.
गौरतलब है कि आसाराम पर सरकारी मेहरबानियाँ हमेशा होती रहीं हैं. किसानों की निजी जमीनों को भी जबरिया कब्जाने में आसाराम ने कोई कसर नहीं छोड़ी. आसाराम को भगवान बनाने में सरकारी तंत्र का भी पूरा सहयोग रहा है.
मोटेरा, अहमदाबाद में जो आसाराम का आश्रम है वही उनका मुख्यालय है. यह सरदार पटेल क्रिकेट स्टेडियम के पास 10 एकड़ भूमि पर स्थित है. यह ज़मीन उन्हें राज्य सरकार ने दी थी.
फरवरी 2009 में गुजरात सरकार ने विधानसभा में स्वीकार किया कि आसाराम के आश्रम ने 67,089 वर्ग मीटर जमीन कब्जा ली है. इस समय भी आसाराम के खिलाफ अलग-अलग जगहों पर एक दर्जन से ज्यादा केस चल रहे हैं. मोटेरा के अशोक ठाकुर ने आश्रम पर अपनी पांच एकड़ जमीन कब्जाने का आरोप लगाया. अशोक का कहना है कि उनकी जमीन आश्रम से लगी हुई है और गुरु पूर्णिमा के दिन उनकी जमीन में टेंट लगाये जाते थे. आश्रम वालों को टेंट लगाने की इजाजत उनके पिता ने दी थी. उनके पिता की मौत के बाद आश्रम वालों ने उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया और कहा कि यह जमीन उनके पिता ने आश्रम को दान में दी थी. लेकिन आश्रम इस बारे में कोई सबूत पेश नहीं कर सका था.
दूसरा केस सूरत के जहांगीरपुरा गांव के किसान अनिल व्यास ने किया है. यहां के आश्रम पर कई लोगों की जमीनें कब्जाने के आरोप हैं. व्यास आश्रम से अपनी 34,400 वर्ग मीटर जमीन वापस लेने का केस लड़ रहे हैं. व्यास का कहना है कि मामला अदालत में होने के बावजूद गुजरात सरकार ने 24 जनवरी 1997 को जमीन के अधिग्रहण को नियमित कर दिया था. हालांकि 8 दिसंबर 2006 को हाईकोर्ट ने जमीन के अधिग्रहण को गैरकानूनी करार दिया और फैसला किसान के पक्ष में दिया. इसके बाद आश्रम ने इस फैसले के खिलाफ डिविजन बेंच में अपील की थी.
दिल्ली की विधवा महिला सुदर्शन कुमारी ने भी आसाराम के ट्रस्ट के खिलाफ केस दर्ज कराया है. महिला का कहना है कि उसे धोखा देकर कुछ कागजों पर साइन लिए गए थे जिसे बाद में राजौरी गार्डन में उनके मकान का ग्राउंड फ्लोर आश्रम को दान में दिया दिखाया गया. महिला ने कहा है कि 6 जुलाई 2000 को आश्रम के सत्संग में ले जाने के बहाने उसे जनकपुरी के सब-रजिस्ट्रार ऑफिस ले जाया गया. यहां उसे हिप्नोटाइज करके कुछ कागजों पर साइन ले लिए. बाद में नगर निगम अधिकारियों के आने पर उसे पता चला कि उसका ग्राउंड फ्लोर उससे ले लिया गया है.
गुड़गांव के पास राजकोरी गांव में बने आश्रम के अधिकारियों पर फर्जी दस्तावेज देकर आश्रम का रजिस्ट्रेशन कराने का आरोप लगा. राजकोरी निवासी भगवानी देवी ने आसाराम के आश्रम पर अपनी जमीन कब्जाने पर दिल्ली हाईकोर्ट की शरण ली.सरकारी एजेंसियों ने भी आसाराम के ट्रस्ट पर सरकारी जमीन पर कब्जा करने के आरोप लगाए. 2008 में बिहार स्टेट बोर्ड ऑफ रिलीजियस ट्रस्ट ने आसाराम के ट्रस्ट को अपनी 80 करोड़ रुपये की जमीन कब्जाने पर नोटिस दिया था.
अप्रैल 2007 में पटना हाईकोर्ट से रिटायर्ड जज ने आसाराम बापू और उनके चेलों पर अपनी जमीन पर कब्जा करने की शिकायत दर्ज कराई.
आसाराम की योग वेदांत समिति को 2001 में एक कथित सत्संग के लिए 11 दिन के लिए मध्य प्रदेश के रतलाम में मंगल्य मंदिर के परिसर का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी लेकिन 12 साल बाद भी समिति ने परिसर को ख़ाली नहीं किया है और 700 करोड़ रुपए मूल्य की 100 एकड़ भूमि पर क़ब्ज़ा किया हुआ है. सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टीगेटिंग ऑफिस (एसएफआईओ) आसाराम, उनके बेटे नारायण साई पर आईपीसी और कंपनीज एक्ट 1956 के तहत मुकदमा चलाना चाहता है. इस बारे में एसएफआईओ ने कॉरपोरेट मंत्रालय को सिफारिश भेजी है. कॉरपोरेट मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, हमें एसएफआईओ की सिफारिश मिली है, जिसमें आसाराम, उनके बेटे और कुछ अन्य लोगों पर मुकदमा चलाने की बात कही गई है. इस पर विचार हो रहा है. विवादित जमीन का मालिकाना हक जयंत विटामिंस लिमिटेड (जेवीएल) नाम की एक फर्म के पास बताया जा रहा है. जेवीएल के पब्लिक लिस्टेड कंपनी है जिसे 2004 में अनियमितताओं के चलते बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज से डीलिस्ट कर दिया गया था.
साल 2000 में गुजरात सरकार ने आसाराम आश्रम को नवसारी जिले के भैरवी गांव में 10 एकड़ ज़मीन दी थी. ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि आश्रम ने और छह एकड़ भूमि पर अतिक्रमण कर लिया है. ग्रामीणों के कड़े विरोध के बाद पुलिस की सहायता से ज़िला प्रशासन ने अतिक्रमण गिरा दिया और भूमि का क़ब्ज़ा ले लिया.
इतना ही नहीं आसाराम के आश्रमों में नाबालिग बच्चों की हत्याएं होतीं रहीं. जमीन कब्जाने से लेकर बागी शिष्यों पर हमले करवाने तक, महिलाओं के यौन शोषण से लेकर संदिग्ध स्रोतों से दौलत जमा करने तक, आसाराम बापू हर तरह के विवादों में लिप्त रहे लेकिन आसाराम नेताओं की मेहरबानी से कानून की गिरफ्त में कभी नहीं आ पाए.
पांच जुलाई 2008 को दो छात्रों के शव साबरमती नदी के तट पर पाए गए थे. 10 वर्ष के दीपेश वाघेला और 11 के अभिषेक वाघेला. दोनों बच्चे मोटेरा में आसाराम आश्रम के गुरुकुल (आवासीय विद्यालय) में पढ़ रहे चचेरे भाई थे. बच्चों के घरवाले एक महीने में आठ बार उनसे मिलने आश्रम गए थे. तीन जुलाई को उन्हें आश्रम से फोन पर पूछा गया कि क्या बच्चे घर पहुंचे हैं? लेकिन बच्चे घर पर नहीं थे. आश्रम में जाकर बच्चों के बारे में पूछने पर गुरुकुल के व्यवस्थापक पंकज सक्सेना ने उनसे पीपल के पेड़ के 11 चक्कर लगाकर अपने बच्चों के बारे में पूछने को कहा. परिवार वालों ने ऐसा ही किया पर कुछ नहीं हुआ. आश्रम वालों ने उन्हें पुलिस में शिकायत भी नहीं करने दी. अगली सुबह पुलिस में शिकायत दर्ज करने गए तो पुलिस ने शिकायत दर्ज करने के बजाय उन्हें ही डांटा. बाद में आश्रम के पास दोनों बच्चों के शव मिले लेकिन पुलिस ने फिर भी कार्रवाई नहीं की. बाद में मीडिया द्वारा मामले को उठाने पर आश्रम वालों ने पत्रकारों को ही पीटना शुरू कर दिया. बच्चों में से एक के पिता ने आरोप लगाया कि उनके पुत्र को एक तांत्रिक अनुष्ठान में मारा गया था. मामला गरमाने के बाद मामला सीआईडी को सौंप दिया गया. जांच के एक साल बाद सीआईडी ने इसे गैर इरादतन हत्या का मामला करार दिया. अपनी रिपोर्ट में सीआईडी ने कहा जांच के दौरान उन्हें आश्रम में तंत्र साधना और काले जादू की गतिविधियों का कोई सीधा सबूत नहीं मिला है. इस संबंध में किए गए ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ में मामले के अभियुक्त फेल हो गए थे. लेकिन उनपर कोई कार्यवाही नहीं हुई. 23 जनवरी 2013 को अहमदाबाद कोर्ट ने इस हत्या में आरोपी, आश्रम के सात शिष्यों को समन जारी किया था.
गुजरात में मृत मिले बच्चों के परिजनों ने मामले की जांच के लिए गठित जस्टिस डीके त्रिवेदी कमीशन के सामने कहा था कि उनके बच्चों की जान काले जादू और तांत्रिक क्रिया में गई थी. इस कमीशन का गठन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों के बढ़ते विरोध के बाद किया था. हालांकि कमीशन की कार्रवाई भी विवादों के घेरे में रही थी और गुजरात हाईकोर्ट ने कमीशन की आसाराम बापू और उनके बेटे पर कठोर न होने की निंदा भी की थी.
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में आसाराम के ही दूसरे आश्रम में दो और बच्चे मरे पाए गए थे. ये बच्चे रामकृष्ण यादव (नर्सरी) और वेदांत मौर्या (पहली क्लास) स्टूडेंट थे. इन दोनों की लाश 31 जनवरी 2008 को हॉस्टल के टॉयलेट में मिली थी. गुस्साए लोगों ने आश्रम के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया था और इसे बंद करने की मांग की थी.
जबलपुर स्थित उनके आश्रम के एक शिष्‍य की रहस्‍यमय मौत को लेकर वह और उनका आश्रम सवालों के घेरे में आए हैं. मृतक राहुल पचौरी के परिजनों का कहना है कि वह आसाराम का करीबी था और उनके कई राज जानता था. आश्रम में बनने वाली दवाइयों में गडबड़ी से संबंधित बातें वह आसाराम को बताने वाला था. राहुल के पिता इन्‍हीं सब बातों को अपने बेटे की ‘हत्‍या’ की वजह बता रहे हैं. पुलिस अभी इस आरोप की जांच कर रही है.
2008 से लेकर 2010 के बीच उन्हें और उनके पुत्र नारायण साईं को महिलाओं के यौन शोषण, तांत्रिक उद्देश्यों के लिए बच्चों की बलि और हिंसा का इस्तेमाल कर जमीन हथियाने जैसे आरोपों का सामना करना पड़ा लेकिन सबूतों के आभाव में, जो आसाराम एंड कंपनी सरकारी तंत्र के सहयोग से हमेशा मैनेज करती रही आरोप साबित नहीं हो पाए. इतना ही नहीं, इन आरोपों से उनकी छवि पर भी कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि उनके शिष्यों की संख्या या तो स्थिर रही या कई स्थानों पर बढ़ती गई.
आसाराम के करीबी और पूर्व सचिव राजू चांडाक और निजी फिजिशियन रहे अमृत प्रजापति ने आश्रम में कई गैरकानूनी धंधों के होने की बात कही थी. लेकिन त्रिवेदी कमीशन के सामने पेश होने से पहले चांडाक को तीन गोलियां मारी गईं और प्रजापति का आरोप रहा है कि उन पर आश्रम से जुड़े लोगों ने कम से कम छह बार हमला किया है.
बीएएमएस की पढ़ाई करने वाले प्रजापति ने ‘ओपन’ पत्रिका को बताया था कि वह आश्रम में डॉक्टर की जगह खाली होने पर 1988 में पहली बार आसाराम से मिला था. उसे खाने और रहने के अलावा 15000 रुपये मासिक वेतन देना तय हुआ. उसे सूरत आश्रम में आयुर्वेदिक लैब बनाने का काम दिया गया. शिष्यों की संख्या बढ़ने पर आसाराम ने दवाइयों की गुणवत्ता कम करने पर जोर दिया. गाय के घी की जगह मिलावटी घी का इस्तेमाल होने लगा. प्रजापति कहते हैं कि वह आश्रम के भ्रष्टाचार और महिलाओं के शोषण का गवाह हैं. वह कहते हैं, ‘उनका निजी फिजिशियन बनने पर मैंने ये चीजें बहुत नजदीकी से देखी हैं. मैं आसाराम के कमरे में कभी भी जा सकता था. उनकी मां की मौत होने के अगले दिन मैं उनके दिल्ली के आश्रम में गया. वहां एक महिला लेटी हुई थी. इसके आगे मैं नहीं देख सका.’ प्रजापति बताते हैं कि धमकाए जाने पर 20 अगस्त 2005 को उन्होंने आश्रम छोड़ दिया. सितंबर 2005 को उन्हें गाजियाबाद में करीब 15 लोगों ने पीटा. उन्होंने प्रजापति को आसाराम के खिलाफ बोलने पर जान से मारने की धमकी दी.
जोधपुर के अपने आश्रम की जिस बालिका के साथ उन पर दुराचार का आरोप लगा है, उसने खुद पुलिस में रपट लिखाई है. बलात्कार संबंधी कानून के मुताबिक पीड़िता का बयान ही काफी होता है इसलिए यह मामला संगीन है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बार भी संत समुदाय और हिंदुत्व का झंडा उठाने वाले संगठन व नेता उनके समर्थन में उतर आए हैं. शायद बलात्कार हिन्दू धर्म में अपराध की श्रेणी में नहीं आते. पुलिस इस मामले में अपनी ही तरह छानबीन कर रही है. आसाराम को सम्मन देने के लिए पुलिस टीम को उनके इंदौर आश्रम के बाहर छह घंटों का इंतजार करना पड़ता है जब कि सामान्य नागरिक के साथ पुलिस इस तरह पेश नहीं आती. यह हमारे इस महान देश में ही संभव है. आसाराम अनाप शनाप बयान दिए जा रहे हैं लोग उन्हें सुन रहे हैं. किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि उनपर लगाम लगा सके. ऐसी स्थिति में सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि इस मामले का अंजाम क्या होगा. पिछले सभी आपराधिक मामलों की तरह यह मामला भी अनिर्णीत ही रहेगा ऐसी आशंका के लिए पर्याप्त कारण निकट अतीत में ही मौजूद हैं.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.