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अन्यायी तब तक अन्‍याय करता है, जब तक कि उसे सहा जाता है…

By   /  August 31, 2013  /  1 Comment

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-शैलेन्द्र चौहान||

हम रोज ही समाचारों में पढ़ते और देखते हैं कि महिलाओं और युवतियों पर कहीं एसिड अटैक हो कहीं बलात्कार और हत्याएं होती हैं और अनेकों परिवारों में या कार्यस्थलों पर वे लगातार उत्पीडित भी होती हैं. कभी कभार शोर भी होता है, लोग विरोध प्रकट करते हैं, मीडिया सक्रिय होता है पर अपराध कम होने का नाम नहीं लेते क्यों. हम देख रहे हैं कि एक ओर भारतीय नेतृत्व में इच्छाशक्ति की भारी कमी है तो वहीँ नागरिकों में भी महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को लेकर कोई बहुत आक्रोश या इस स्थिति में बदलाव की चाहत भी नहीं है. वे स्वाभाव से ही पुरुष वर्चस्व के पक्षधर और सामंती मनःस्थिति के कायल हैं. तब इस समस्या का समाधान कैसे संभव है?Rape-help-stop-rape

यद्दपि इन वर्षों में अपराध को छुपाने और अपराधी से डरने की प्रवृत्ति खत्‍म होने लगी है. इसिलए ऐसे अपराध पूरे न सही लेकिन फिर भी काफी सामने आने लगे हैं. अन्यायी तब तक अन्‍याय करता है, जब तक कि उसे सहा जाए. महिलाओं के प्रति अपराध में यह स्‍थिति अभी कम है. महिलाओं में इस धारणा को पैदा करने के लिए न्‍याय प्रणाली और मानसिकता में मौलिक बदलाव की भी जरूरत है. देश में लोगों को महिलाओं के अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी नहीं है और  इसका पालन पूरी गंभीरता और इच्‍छाशक्‍ति से नहीं होता है. महिला सशक्तीकरण के तमाम दावों के बाद भी महिलाएँ अपने असल अधिकार से कोसों दूर हैं. उन्‍हें इस बात को समझना होगा कि दुर्घटना व्‍यक्‍ति और वक्‍त का चुनाव नहीं करती है और यह सब कुछ होने में उनका कोई दोष नहीं है.

धीमे और गैरजिम्‍मेदाराना अन्वेषण, लंबी और बोझिल कर देने वाली वकीलों की बहसें जो महिलाओं को अपमानित करने में कोई लज्जा नहीं महसूस करते और देर से दिए गए निर्णय भी महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए चिंताजनक रूप से जिम्‍मेदार हैं, ये महिलाओं की न्‍याय पाने की इच्‍छाशक्‍ति को कमजोर कर देते हैं.

भारत में रजिस्‍टर नहीं कराए गए मामले भी काफी होते हैं. पुलिस का रवैया न केवल सामंती होता है बल्कि बेहद अपमानजनक और हताश करने वाला भी होता है. महिला अपराध से संबंधित मामलों में जल्‍द कार्रवाई और सुनवाई नहीं होने के कारण अपराधी को भागने और बचाव करने का मौका मिल जाता है. दूसरी ओर इन मामलों में देरी होने से पीड़ित महिला पर अनुचित दबाव डाला जाता है या प्रताड़ना दी जाती है.

महिलाओं के विरुद्ध अपराध का एक पहलू समाज का नकारात्‍मक दृष्‍टिकोण भी है. अक्‍सर लोगों में धारणा होती है कि अपराध होने में महिला का दोष है या यह उनके उकसाने के कारण हुआ होगा. साथ ही छोटे से बड़े हर स्‍तर पर असमानता और भेदभाव के कारण इसमें गिरावट के चिन्ह कभी नहीं देखे गए.

इसके लिए कानून को और प्रभावी बनाए जाने की बात भी बार-बार सामने आती है. महिला आयोग की अध्‍यक्ष रहीं पूर्णिमा अडवाणी ने इस संबंध में अपनी चिंता प्रकट की थी. परन्तु बार बार बात सरकार के पास पहुँच कर रुक जाती है.

इस बाबत कुछेक बदलावों, सुधारों और उनके सख्ती से अनुपालन की महती जरूरत है जैसे –

दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के अंतर्गत कई राज्‍यों में दहेज प्रतिषेध अधिकारी भी नियुक्‍त नहीं हैं. हालाँकि अधिनियम में इस संबंध में बखूबी प्रावधान दिए गए हैं.

इंमॉरल ट्रैफिकिंग एक्‍ट, 1986 के बावजूद वेश्‍यावृत्ति में कोई कमी नहीं आई है. इस अधिनियम की धारा 8 में महिला को ही आरोपी माना गया है, वहीं इसे संचालित करने वाले और दलाल बच निकले में सफल हो जाते हैं. ऐसी महिलाओं के ससम्मान भरण-पोषण के लिए कोई प्रावधान सरकार के पास नहीं है.

बंधुआ मजदूरी के खिलाफ कानून बनाए जाने के बाद भी इस पर पूरी तौर पर रोक नहीं लग सकी है.

यहाँ एक बात समझने वाली है कि महिला अपने संबंधों और पद के पहले एक महिला है, वो भी अपनी प्रतिष्ठा और अधिकारों के साथ. लेकिन सामाजिक जागरूकता की कमी और लोगों में दिन-ब-दिन घटते नैतिक मूल्यों व आचरण के कारण महिलाओं की स्‍थिति दोयम बनी हुई है. जिसके लिए हमारा नेतृत्व और व्यवस्था दोनों जिम्मेदार हैं. कानून में महिलाओं को प्रतिष्‍ठा और एकाधिकार के साथ जीने की गारंटी के साथ जीने के आश्‍वासन के बाद भी असल जिंदगी में इसका लोप दिखता है.

ऐसा नहीं हैं कि महिलाओं के प्रति होने वाले अत्‍याचार केवल भारत में होते हैं. सभी देश चाहे वो विकसित हों, विकासशील या फिर गरीब, महिलाओं की स्थिति कमोबेश एक जैसी है. परन्तु अंतर यह है कि विकसितदेशों की कानून व्यवस्था इतनी लचर नहीं है. इसलिए वहां अपराध कम होते हैं और उनपर शीघ्र कार्यवाही होती है, न्याय प्रक्रिया भी वहां इतनी जटिल नहीं है.

आमतौर पर देखा जाता है कि अपराध का अन्वेषण पीड़ित की ओर फोकस रहता है, वहीं पैरवी आरोपी पर फोकस होती है. उसे लगातार अपमानित किया जाता है. उसका मनोबल सायास ख़त्म किया जाता है. यहाँ भी बदलाव की जरूरत है. क्‍या अपराध के होने में पीड़िता का दोष है. दुर्घटना कभी भी और किसी के साथ हो सकती है. वैसे इन बातों की हर समाज, सभ्‍यता और परिवेश के लिए अलग-अलग धारणाएं हैं या अवधारणा है. हर समय काल में यह समस्या अलग तरीके से समझी जाती रही है. इस अवधारणा को भारतीय कानून में अधिगृहीत किया गया. लेकिन समय और अपराधों की गंभीरता और उनमे लगातार हो रही बढ़ोत्तरी को समझते हुए इसमें बदलाव की जरूरत है.

हाल के दिनों में जेंडर जस्‍टिस की बात हवा में उछली है. पहले भी यह होता रहा है. क्‍या इससे सही न्‍याय मिलने में कोई आसानी हुई है? वैसे अक्सर यह भी देखने को मिलता है कि मुखर होने पर न्‍याय मिलता है और इज्‍जत भी लेकिन इसके खतरे भी  हैं जिन्हें इस व्यवस्था को देखना होगा. दुर्भाग्य से इस बारे में व्यवस्था की जिम्मेदारी संदेह से परे नहीं दिखती. भारतीय कानून में यूं तो जेंडर जस्‍टिस समता और प्रतिष्‍ठा के अधिकार के तहत मौलिक अधिकारों में समाहित हैं, लेकिन त्‍वरित न्‍याय और उचित अनुपालन से ही इसको बल मिल सकेगा यह बात समझना अत्यंत आवश्यक है. एक समन्वित प्रयास के बिना इन जघन्य अपराधों पर रोकथाम बहुत मुश्किल है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. mam shiva jia logao ka pas tame nhia hia phalia bat dusriya bat kia jab hamarya hia loag choar hoatoa kysa bdalawa ayga jay hiand jay bharat.

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