/महिला अधिकारों के मामले में भारत, पाकिस्तान से थोड़ा ही बेहतर है…

महिला अधिकारों के मामले में भारत, पाकिस्तान से थोड़ा ही बेहतर है…

-शैलेन्द्र चौहान||

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले दो सौ से अधिक विशेषज्ञों ने एक सर्वे के ज़रिए भारत को महिलाओं के लिए बेहद असुरक्षित बताया है. इस सर्वे की मानें तो भारत में मानव तस्करी औऱ कन्या भ्रूण हत्या के मामले सबसे ज्यादा हैं. इस मामले में भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान से थोड़ा बहुत ही बेहतर है,  इस सूची में पाकिस्तान तीसरे स्थान पर है. अफगानिस्तान को तो महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश माना गया है. लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो इस सूची में दूसरे स्थान पर है और सोमालिया भारत के बाद पांचवे स्थान पर.help-me

  1. इस सर्वे में कुछ ऐसे मुद्दों पर प्रश्न पूछे गए थे  कि
  2. खराब स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से किस जगह पर महिलाओं की सबसे ज्यादा मौत होती है
  3. कौन सी जगह पर महिलाएं सबसे ज्यादा शारीरिक हिंसा झेलती हैं
  4. परंपरागत कारणों की वजह से कहां महिलाओं के साथ सबसे जियादा भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाया जाता है.

इन प्रश्नों के जबाव इतने भयावह मिले कि भारत को महिलाओं की असुरक्षा के लिए चौथे स्थान पर ला दिया, यह स्थिति सोचनीय है. भारत को इस सर्वे में मानव तस्करी, भेदभावपूर्ण रवैय्ये और सांस्कृतिक मामलों के लिए आड़े हाथों लिया गया. सर्वे के अनुसार भारत में लड़कों को लड़कियों से ज्यादा तबज्जो दी जाती है, जिस कारण देश में कन्या भ्रूण हत्या के मामले बढ़े हैं. भारत में आज भी बाल विवाह का प्रचलन है और देश में रूढ़िवादी विचारधार समाप्त नहीं हो पाई है. भारत के पूर्व गृह सचिव के बयान को माने तो देश में करीब 100 मिलियन लोग, जिसमें महिलाओं और लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा है, भारत में मानव-तस्करी से प्रभावित हैं.

यह अलग बात है कि दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जिन्हें इस सूची में सबसे ऊंचाई पर होना चाहिए था. ये दुनिया के ऐसे देश हैं जहां एक महिला होना ही अपने आप में कठिनाई भरा औऱ खतरनाक कर्म है. इसके बावजूद हम भारत की स्थिति अच्छी नहीं मान सकते. देश के हर कोने से महिलाओं के साथ दुष्कर्म, यौन प्रताड़ना, दहेज के लिए जलाया जाना, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना और स्त्रियों के खरीदफरोख्त के समाचार सुनने को मिलते रहते हैं. ऐसे में महिला सुरक्षा कानून का क्या मतलब रह जाता है इसे आप और हम बेहतर तरीके से सोच और जान सकते हैं. इसलिए यदि महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से देखा जाए तो जिस तरह की घटनाऐं आए दिन भारत में घट रही हैं उसमें महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अगर कोई रिपोर्ट आती है तो वो रिपोर्ट कहीं न कहीं महिला सुरक्षा के लिए यहां उठाए जा रहे कदमों पर उंगली उठाती है. समय-समय पर महिला सुरक्षा को लेकर कानून बनाए जाते हैं और कानूनों में परिवर्तन भी किए जाते रहे हैं फिर भी देश में महिलाऐं असुरक्षित है.यह बेहद चिंता की बात है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.