/आसाराम अब जेल में रहे या न रहे, उसका चेहरा हो गया बेनकाब…

आसाराम अब जेल में रहे या न रहे, उसका चेहरा हो गया बेनकाब…

-संगीता शर्मा||

नाबालिग छात्रा से यौन शोषण के मामले में जोधपुर जेल में बंद आसाराम अब तक राजस्थान सरकार और मीडिया को कोसते रहे मगर न्याय के मंदिर में उनका झूठ नहीं चल पाया. सेशन कोर्ट ने उनके कृत्य को  अपराध मानते हुए उन्हें जमानत नहीं दी. अपनी पोती के समान गुरूकुल में पढ़ने वाली लड़की को दुराचार के बाद धमकाने के बाद और उन पर केस दर्ज होने के बाद भी उनका रवैया नही बदला. दूसरों को सयंम का पाठ पढाने वाले आसाराम ने मानों अपना आपा खो दिया है.Asaram-met-women-privately-Aide-tells-police

इससे यह साबित होता है आसाराम अपनी गलती पर पर्दा डालने के लिए यह सारी कवायद कर रहे है. पहले अपनी दुराचार की कहानी सोनिया गाँधी व राहुल गांधी पर मढ़ दी. बाद में सम्मन तामिल हो गया तो मीडिया पर बरसते रहे और उनके इशारे पर मीडिया से मारपीट होती रही. यहां तक कि उन्होने गिरफ्तार होने से पहले इंदोर में दिए प्रवचन में राजस्थान सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से धमकी देते हुए कह डाला कि राजस्थान में चुनाव होने वाले है और उनके साथ हो रहे घटनाक्रम का नतीजा भुगतना पड़ेगा. उनके समर्थकों ने एक महिला अधिकारी को रिश्वत देकर मामला रफा दफा करने की भी कोशिश की तो आसाराम के जेल पहुंचते ही जोधपुर डीसीपी को मारने की धमकी मिल गर्इ. इन सारी कड़ियों को जोड़कर देखा जाए तो उनका असली चेहरा और व्यकितत्व सामने आ गया है. जो किसी संत का तो नहीं हो सकता.

आसाराम और उनके समर्थक इस सारे घटनाक्रम में मीडिया व सरकार को कोस रहे है  लेकिन उनसे पूछे कि गलत इरादे से उन्होने उस लड़की को कमरे में बुलाया था ना कि मीडिया और सरकार ने भेजा था. इस सारे मामले को मीडिया ट्रायल बताने वालों से पूछा जाए कि क्या एक संत जिसके लाखों अनुयायी है और वे अपनी पोती समान एक शिष्या के साथ शर्मनाक हरकत कर दे और मीडिया को फिर भी चुप्पी साध लेनी चाहिए? ऐसी बयानबाजी करने वालों की यह सोचकर रूह क्यों नहीं कांपती कि 15 अगस्त की रात उस लड़की की जगह उनकी बेटी बहन या पोती होती तो क्या होता?

मीडिया जब उनका असली चेहरा और उनके हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति का सच्चार्इ दुनिया के सामने ला रहा है तो इसमें क्या गलत है? पुलिस ने पीड़िता के बयान के आधार पर मामले की गंभीरता को समझ कर कार्रवार्इ की हे तो उसमें गलत किया है? पुलिस ने हिम्मत दिखाते हुए यदि एक बडे धर्म के ठेकेदार पर उसके कुकृत्य की वजह से हाथ डाला है तो क्यों उसे खरीदने और धमकाने के प्रयास किए जा रहे है?  क्यो सरकार को  धमकी दी जा रही है? आसाराम इंदोर इसलिए ही भागे थे कि वहां कि भाजपा सरकार उन्हें गिरफ्तारी से बचा लेगी, मगर उन पर इतने संगीन आरोप था कि ऐनवक्त पर भाजपा सरकार ने भी किनारा कर दिया.

आसाराम को उम्मीद थी कि वे बरसों से अपनी मर्दानगी दिखाते रहे और अब जब उनकी पोल खुल गर्इ तो सोचा वे सबको खरीद और डरा धमका कर मामला दबा देगे. यह उनकी भूल साबित हुर्इ और अब वे जेल की सलाखों के पीछे है तो महज अपनी शर्मनाक और अशोभनीय कृत्य की वजह से. पुलिस, सरकार, मीडिया के बाद अब न्यायपालिका ने भी उन पर लगाए आरोपों को गंभीर मान लिया है. सुप्रीम कोर्ट ने उनको सुरक्षा देने पर एतराज जताया और बुधवार को वकीलों की फौज भी अपनी दलीलों से आसाराम की जमानत नहीं करा पार्इ.  उन्हें तीसरी रात भी अब जेल में ही काटनी पड़ेगी और कल फिर उनकी जमानत के लिए हार्इकोर्ट में अर्जी लगार्इ जाएगी. शायद मेडिकल ग्राउंड और उम्र की वजह से उन्हें वहां राहत मिल भी जाए. हालांकि आसाराम के लिए सकून की बात सिर्फ इतनी है जेल में उन्हें जरूर वीआर्इपी सुविधाएं मिल रही है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.