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आसाराम की हवस बुझाने का शिल्पी उर्फ़ संचिता गुप्ता करती थी इंतजाम…

By   /  September 5, 2013  /  No Comments

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धर्म के नाम पर देश की धर्मभीरु जनता के बीच स्वयंभू भगवान बन बैठे आसाराम एक नाबालिग लड़की के साथ यौन दुराचार के मामले में आरोपी हैं. इस आरोप में आसाराम जमानत न मिल पाने के कारण जेल की सलाखों के पीछे पहुँच गए हैं. अपने भक्तों के बीच भगवान की कथित उपाधि पाए आसाराम इस आरोप में गिरफ्तार हुए ही, उनका एक विश्वासपात्र सेवक शिवा भी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया है.

इस पूरे मामले की तफ्तीश कर रही पुलिस टीम ने गिरफ्तार शिवा के माध्यम से आसाराम के कांडों की सीडी तो प्राप्त हुई ही है साथ ही खुलासा ये भी हुआ है कि इस कांड में उनका पीए भी शामिल था. इन सबसे बढ़कर चौंकाने वाला जो तथ्य सामने आया है वो यह कि आसाराम की रंगरेलियों के लिए, उनकी भोगवादी प्रवृत्ति को संतुष्ट करने के लिए छिंदवाडा गुरुकुल की वार्डन शिल्पी आसाराम के लिए लड़कियों, महिलाओं का इंतजाम कर आसाराम तक पहुँचाया करती थी. शिल्पी महिलाओं को इलाज के बहाने आसाराम के पास रात को भेजा करती थी. इस तथ्य की पुष्टि शिवा द्वारा भी की जा चुकी है. खुद उस नाबालिग पीड़िता को शिल्पी ने ही भूत-प्रेत का भय दिखाकर, इलाज करवाने का जाल बिछाकर आसाराम के पास पहुँचाया था. यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि छिंदवाडा गुरुकुल वही विद्यालय है जहाँ कि पीड़ित लड़की शिक्षा प्राप्त कर रही थी.

आसाराम के छिन्दवाड़ा आश्रम में बने गुरुकुल की वार्डन शिल्पी उर्फ़ संचिता गुप्ता आसाराम की हवस बुझाने के लिए गुरुकुल में पढ़ रही लड़कियों को आसाराम के बिस्तर तक पहुंचाती थी, अब इसे पुलिस ढूंढती फिर रही है.

आसाराम के छिन्दवाड़ा आश्रम में बने गुरुकुल की वार्डन शिल्पी उर्फ़ संचिता गुप्ता आसाराम की हवस बुझाने के लिए गुरुकुल में पढ़ रही लड़कियों को आसाराम के बिस्तर तक पहुंचाती थी, अब इसे पुलिस ढूंढती फिर रही है.

शिल्पी अभी तक पुलिस की गिरफ्त में नहीं आई है, इस कारण बहुत से महत्त्वपूर्ण खुलासे अभी होना बाकी है. बताया जाता है कि संचिता गुप्ता नाम की इस ‘शिल्पी’ के पूर्व में आसाराम से शारीरिक सम्बन्ध रहे हैं. उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसको छिंदवाडा गुरुकुल हॉस्टल का वार्डन बनाया गया. जिसके माध्यम से आसाराम अपनी कामेच्छा को पूरा करते रहे. शिल्पी का इस तरह भूमिगत होना अपने आपमें एक अलग कहानी कहता है. यदि आसाराम पर लगा आरोप गलत है तो शिल्पी सामने आकर उनके पक्ष में सबूत देकर उनको बचाने की कोशिश क्यों नहीं कर रही है? इससे साफ जाहिर है कि आसाराम पर आरोपों की गंभीरता कहीं गहरे तक है और इसी गंभीरता को समझकर उनकी ठोस राजदार शिल्पी अभी तक भूमिगत है. दरअसल आसाराम और शिल्पी के अभी तक जिस तरह के संबंधों की जानकारी छन-छन कर सामने आई है उससे साफ जाहिर है कि उसका काम हॉस्टल चलाने से अधिक आसाराम की यौनेच्छा को पूरा करना था. उसको स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि अब पुलिस तफ्तीश के नाम पर सिर्फ इसी एकमात्र केस को नहीं बल्कि पूर्व में आसाराम की कारगुजारियों से सम्बंधित मामलों को भी खंगालने का काम करेगी. ये बात तो किसी से भी छिपी नहीं है कि आसाराम पर ये कोई पहला आरोप नहीं लगा है. इसके पूर्व भी महिलाओं की झाड़-फूंक, उनके इलाज के बहाने उनके यौन शोषण के किस्से सामने आते रहे हैं, ये और बात है कि खुलकर किसी पीड़ित ने सामने आने की हिम्मत नहीं जुटाई. इसके अलावा और भी कई मामले हैं जो व्यापक रूप से तफ्तीश के इंतज़ार में हैं. वर्षों से आसाराम के साथ रही शिल्पी को भलीभांति उनके काले कारनामों की जानकारी होगी और वो ये भी समझ रही होगी कि आसाराम संभव है कि अपने रसूख का उपयोग कर, अपने स्वास्थ्य का हवाला देकर किसी न किसी तरह बाहर आ जाएँ किन्तु शिल्पी जैसे किसी साधारण से मोहरे को बच पाना संभव नहीं होगा.

आसाराम के कुकृत्यों के सत्य को जितने करीब से शिल्पी, शिवा और आसाराम का पीए शरद जानते, समझते है उतना शायद कोई और न जानता होगा. ये भी संभव है कि उनके कुकृत्यों के जितने सबूत शिवा के पास से मिले हैं, उससे कहीं अधिक शिल्पी के पास हों और हो सकता है कि अपने आपको पक्के सबूतों की गिरफ्त से बचाने के लिए आसाराम ने ही शिल्पी को कहीं प्रश्रय दिलवा दिया हो. इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा कि आसाराम के बड़े-बड़े रसूखदार लोगों के साथ सम्बन्ध हैं, उनके भक्तों की लम्बी-चौड़ी कतार में ऐसे लोगों का भी जमावड़ा होगा जो सही-गलत सभी कार्यों को सरलता से अंजाम देते होंगे. ऐसे में खुद आसाराम द्वारा भी शिल्पी को भूमिगत करवा देना बहुत बड़ा काम नहीं है. हाँ, अब पुलिस को जांच इस पक्ष की भी करनी चाहिए कि कहीं पुराने आरोपों, मामलों से खुद को बचाने के लिए शिल्पी की जिन्दगी से ही खिलवाड़ न किया गया हो.

बहरहाल आसाराम, शिवा अभी पुलिस गिरफ्त में हैं और शिल्पी, पीए की तलाश जारी है. जब तक उसकी गिरफ़्तारी नहीं हो जाती तब तक उसके छिपे होने, छिपाए होने, जिन्दा होने न होने के बारे में सिर्फ संदेह ही व्यक्त किया जा सकता है.

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About the author

बुन्देलखण्ड के उरई-जालौन में जन्म। बुन्देलखण्ड क्षेत्र एवं बुन्देली भाषा-संस्कृति विकास, कन्या भ्रूण हत्या निवारण, सूचना का अधिकार अधिनियम, बाल अधिकार, पर्यावरण हेतु सतत व्यावहारिक क्रियाशीलता। साहित्यिक एवं मीडिया क्षेत्र में सक्रियता के चलते पत्र-पत्रिकाओं एवं अनेक वेबसाइट के लिए नियमित लेखन। एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन।
सम्प्रति साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ और इंटरनैशनल रिसर्च जर्नल ‘मेनीफेस्टो’ का संपादन; सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’ तथा ‘पीएचड होल्डर्स एसोसिएशन’ का संचालन; निदेशक-सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान; महाविद्यालय में अध्यापन कार्य।
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