/आसाराम को बचाने की खातिर शिल्पी और प्रकाश को उतारा जा सकता है मौत के घाट…

आसाराम को बचाने की खातिर शिल्पी और प्रकाश को उतारा जा सकता है मौत के घाट…

आसाराम के खास सेवादार और राज़दार शिवा से जोधपुर पुलिस की तफ्तीश ने जो राजफाश किये हैं उनसे साफ़ ज़ाहिर है कि आसाराम के शिवा के अलावा दो और राज़दार हैं, मध्यप्रदेश के छिन्दवाड़ा आश्रम स्थित गुरुकुल की वार्डन शिल्पी उर्फ़ संचिता गुप्ता, और आसाराम का रसोइया प्रकाश.

जोधपुर पुलिस के अनुसार आसाराम के छिन्दवाड़ा आश्रम में बने गुरुकुल की वार्डन शिल्पी उर्फ़ संचिता गुप्ता आसाराम की हवस बुझाने के लिए गुरुकुल में पढ़ रही लड़कियों को आसाराम के बिस्तर तक पहुंचाती थी, अब इसे जोधपुर पुलिस ढूंढती फिर रही है.

यदि हम आसाराम पर पहले से उछलते आरोपों पर नज़र डालें तो उस पर हत्याओं के आरोप भी लगते रहे हैं. ऐसे में यह आशंका बेमानी नहीं कि आसाराम को बचाने की खातिर शिल्पी और प्रकाश जैसे आसाराम एंड कम्पनी के अहम् किरदार और मुख्य गवाहों को मौत के घाट उतार दिया जाये.

शिवा के फोन रिकॉर्ड के मुताबिक घटना वाले दिन शिल्पी आसाराम और पीड़ित परिवार से लगातार संपर्क में थी. मालूम हो कि शिल्‍पी आसाराम के जोधपुर गुरुकुल की वॉर्डन थी और उसपर आरोप है कि वो आसाराम को लड़कियां सप्‍लाई किया करती थी. सामने आया है कि काफी लंबे समय तक शिल्‍पी और आसाराम के संबंध रहे हैं जिसके बदले में आसाराम ने शिल्‍पी को दिल्‍ली और अहमदाबाद में एक-एक फ्लैट बतौर गिफ्ट दिया था. फिलहाल शिल्‍पी फरार है और पुलिस उसकी तलाश कर रही है.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक इस पूरी साजिश में आसाराम के अलावा तीन अहम किरदार और हैं. आसाराम का विश्वासपात्र उनका रसोइया प्रकाश, दूसरा आसाराम का सेवादार शिवा और तीसरा छिंदवाड़ा आश्रम के हास्टल की वॉर्डन शिल्पी और प्रकाश  फरार हैं. वो कहां हैं ये कोई नहीं जानता. लेकिन पुलिस सूत्रों की माने तो प्रकाश आसाराम का इतना खासमखास है कि उनका मोबाइल वो खुद अपने पास रखता है. आसाराम से किसी को भी बात करनी होती है तो वो प्रकाश के जरिए ही बात करते थे. जोधपुर पुलिस की माने तो अगर प्रकाश मिल गया तो सारी गुत्थी सुलझ जाएगी.

ऐसे में यह शंका निराधार नहीं कि आसाराम की रक्षा के लिए सबूत मिटाने की खातिर शिल्पी और प्रकाश की हत्या हो सकती है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.