/आसाराम के अलावा भी कई धर्म के ठेकेदार करते रहे हैं यौन अपराध…

आसाराम के अलावा भी कई धर्म के ठेकेदार करते रहे हैं यौन अपराध…

-बालेन्दु स्वामी||

धर्म का चोला पहने आसाराम के ऊपर यौन शोषण के आरोप लग रहे हैं, उधर बनारस के भी एक महाराज अभयानंद पर बलात्कार के आरोप लगे. पूर्व में भी कृपालु, प्रकाशानंद, सत्य साईं बाबा तथा अन्य बहुत से संत महात्माओं पर इस तरह के आरोप लगे हैं. असल में ये परम्परा बहुत पुरानी है और यौनाचार के प्रसंग धार्मिक ग्रंथों में भी वर्णित हैं. कि किस तरह हमारा धर्म और संस्कृति औरत के प्रति इस घ्रणित अपराध को बढ़ावा देती है!swami_narayan_sex

मध्य प्रदेश के एक बीजेपी के मंत्री ने बलात्कार की घटना के सन्दर्भ में बयान दिया था कि पूरे भारत में ड्रेस कोड लागू होना चाहिए और यह सब विदेशी संस्कृति के प्रभाव से ऐसा हो रहा है. कांग्रेस के एक नेता भी लड़कियों को रात में न निकलने देने की वकालत करते सुने गए. इसके अलावा भी मैंने धर्म और संस्कृति के झंडाबरदारों की कई ऐसी पोस्ट फेसबुक पर देखी जिनमें कि लड़कियों के रात में बाहर निकलने और उनके पहनावे इत्यादि को बलात्कार का जिम्मेदार ठहराया जा रहा था. स्त्री की स्वतंत्रता का पूर्णरूपेण हनन कर देने वाले एक धर्म के अनुयायी तो मेरे पेज पर कहने लगे कि ईश्वर ने औरत को कमज़ोर बनाया है.

धर्म और संस्कृति के पैरोकारों तुम्हें शर्म आनी चाहिए, तुम्हारे जैसे गंदे लोगों की वजह से ही आज हमारे देश का चरित्र और हालात इस स्तर तक नीचे गिर चुके हैं कि खुद को भारतीय कहलाने में भी शर्म महसूस होती है. क्योंकि तुम्हारे हिसाब से औरत कमज़ोर है, ताड़न की अधिकारी है, नर्क का द्वार है, पराया धन है और दान करने योग्य वस्तु है. इंसान समझा कहाँ तुमने और तुम्हारे धर्म ने उसको. एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 सालों में तुमने 60 लाख बेटियां मार दी. जो नहीं मार पाते वो बेटी के जन्म पर बुझ से जाते हैं फिर मन मारकर स्वीकार तो करना ही पड़ता है. कितनी बार तो मैंने देखा है कि एक बेटे की चाह में बेटियों की लाइन लगा देते हैं क्योंकि कपाल क्रिया तो वही करेगा और वंश तो उसी से चलेगा. कितनी जगह तो मैंने बेटी का जन्म होने पर माँ को ताना सुनते भी देखा है. क्योंकि बेटी को पालना भी तो कोई हंसी खेल नहीं है. लड़का कुछ भी करे, कहीं आये जाये, कैसा भी पहने कोई फर्क नहीं पड़ता पर लड़की के ऊपर तो हज़ार बंदिश होंगी. कहाँ जाना, कब जाना, क्या पहनना, किससे मिलना यह सब कुछ लड़की कोई अपनी मर्जी से थोड़ी न कर सकती है. अरे भूल जाइए शादी ब्याह या फिर सेक्स पार्टनर अपनी मर्जी से चुनने की आज़ादी यहाँ तो पढ़ना लिखना और पहनना ओढ़ना तक अपने हाथ में नहीं होता लड़की के. जिस समाज में लड़की की ये दशा हो तथा उसे अभिशाप समझा जाता हो, वहां कौन लड़की होना चाहेगा और कौन बेटी पैदा करना चाहेगा!

जब हमारे देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तथा और बड़े बड़े लोग कहते हैं कि हमारी भी बेटियां हैं और हमें भी चिंता है बेटियों की तो मुझे बड़ी हंसी आती है और मन में आता है कि जरा इनसे पूछा जाये कि इनकी बेटियों ने कभी दिल्ली की बसें देखी हैं क्या? बलात्कार तो रोज़ सबके साथ और सामने नहीं होता परन्तु जब कोई लड़का बस में या मन्दिर में सट कर खड़ा होता है, या गलत ढंग से हाथ फिराता है, अथवा चिकोटी काटता है, या फिर आते जाते फब्तियां कसता है. कैसा महसूस करती है? यह तो भुक्तभोगी ही बता सकती है, परन्तु मुख्यतया बात ये है कि जिस भारतीय परिवेश में लड़की को पालापोसा जाता है उसमें उसकी प्रतिरोध करने की क्षमता भी मर जाती है और वो उसे किसी तरह कड़वा घूट मानकर पी जाती है. क्योंकि मैं तो लड़की हूँ इसलिए “मुझे तो सहना है”, यह सब. क्या हम आप नहीं जानते कि लड़की को किस तरह से हंसने, बोलने, छींकने इत्यादि के सलीके सिखाये जाते हैं, हमारे महान देश में, याद रखियेगा केवल दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में ही भारत नहीं है, महानगरों का कल्चर शेष भारत से बहुत अलग है. जरा महानगरीय संस्कृति से इतर अन्य शहरों व देहातों में देखो कि यहाँ लड़की किस तरह की पारम्परिक परिस्थितियों में बड़ी होती है. इस तरह से अपनी बेटियों की परवरिश करके सोचिये कि आप अपनी बेटी को क्या बना रहे हैं? उनकी सारी प्रतिरोधक क्षमता को ही मार दिया आपने और फिर चाहते हैं कि बलात्कार रुक जाये!

किस धर्म और संस्कृति की बात कर रहे हैं आप, जहाँ के शास्त्रों और किस्सों में इंद्र जैसे बलात्कारी देवता पुरुष की भी पूजा होती है और विष्णु अगर छल पूर्वक किसी से यौनाचार करे तब भी उसे इसलिए स्वीकार कर लिया जाता है क्योंकि “समरथ को नहिं दोष गुसाईं” और असमर्थ स्त्री को पत्थर होने का शाप भी भोगना पड़ता है, शाप तो इन्द्र को भी मिलता है, जरा सुनिए किस बात का कि इन्द्र के शरीर में एक हज़ार योनियाँ बन जायेंगी. संभवतः एक नहीं बल्कि एक हज़ार योनि एक साथ देखने की परिकल्पना ने ही इस प्रकार के शाप की रचना करी होगी. परन्तु ध्यान दीजिये इस पूरी कहानी में कि योनि होना ही अपने आप में शाप है, यह हमारा धर्म सिखाता है हमें.

इस पुरुषवादी धर्म और संस्कृति ने ही लड़की को ऐसे पालने पोसने और बड़ा करने की वकालत करी कि एक पुरुष के लिए उसका बलात्कार करना आसान हो जाये. आज औरत क्या नहीं कर सकती और क्या नहीं कर रही परन्तु क्या समझते हैं आप कि अगर सुनीता विलियम्स पारम्परिक भारतीय परिवेश में पली बढ़ी होती तो वह न होती जोकि वो आज है. औरत को कमज़ोर बताने वाले मूर्खों से पूछना चाहिए कि पुराने समय की वीरांगनाओं की बात छोड़ भी दें तो यह बताओ यह कमज़ोर महिलायें विभिन्न देशों की सेनाओं में क्या कर रही हैं! शर्म आनी चाहिए तुम्हें, औरत को कमज़ोर बनाने वाले तुम्हारे इस बलात्कारिक षडयंत्र पर. असल में यह पुरुषवादी मानसिकता ही बलात्कारी है.

बलात्कार दरअसल एक धार्मिक समस्या है क्योंकि धर्म ने ही औरत को भोग्या, वस्तु, अपवित्र, आज्ञाकारिणी, पर्देवाली, कमज़ोर और दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया है. कुछ धर्म तो साफ़ साफ़ उसे पीटने की भी वकालत करते हैं. समस्या की जड़ में जाओ, जरा सोचो कि औरत के प्रति इस प्रकार की धारणा का निर्माण धर्म ने ही किया है. फांसी की सज़ा से बलात्कार नहीं रुकने वाले, औरत के प्रति दृष्टिकोण को बदलना होगा. “जहाँ स्त्री होती है वहां देवताओं का वास होता है” इस तरह के छलने वाले और दोगले वक्तव्य देने वाले शास्त्र ही यह भी कहते हैं कि स्त्री नर्क का द्वार होती है और कहीं कहीं तो कुछ तथाकथित साधू सन्यासी कहते हैं कि स्त्री की शकल देखना भी पाप है और दिख जाये तो वो प्रायश्चित भी करते हैं और उसी सम्प्रदाय के सन्यासियों की सेक्स फ़िल्में भी बाज़ार में आ जाती हैं. देखो कितने दोगले हैं ये धार्मिक लोग और इनके ग्रन्थ, मैं तो उन्हीं शास्त्रों में यह भी लिख दुंगा कि भारत में जहाँ अकेली स्त्री होती है वहां वहशी बलात्कारियों का वास होता है.

उन्हें शर्म आनी चाहिए जोकि स्त्री की स्वतंत्रता और पहनावे को बलात्कार का जिम्मेदार ठहराते हैं और लड़कियों से कहते हैं कि ये मत करो, वो मत पहनो, वहां मत जाओ, ऐसे रहो और वैसा करो. अरे तुम मर्द हो! कहाँ गई गैरत तुम्हारी, अपने ऊपर तुम कंट्रोल नहीं कर सकते और औरत को उपदेश दे रहे हो, आखिर ताला तुम अपने पैंट पर क्यों नहीं लगा लेते और अगर कंट्रोल नहीं होता तो फेक दो काट कर. बताओ अपने चरित्र को देखकर कौन हुआ कमज़ोर मर्द या औरत? ये हरामखोर तर्क देते हैं कि अगर औरत ऐसे पहनेगी और बाहर निकलेगी तो और क्या होगा! इसी मानसिकता के लोग ही हैं वो जो मौका मिलने पर अपनी माँ, बहन और बेटी का बलात्कार करने में भी नहीं चूकते क्यों कि उनकी दृष्टि में तो यह स्वाभाविक है, जहाँ औरत की चमड़ी दिखी और ये बेकाबू हुए यह तो पूरी तरह नार्मल है उनके लिए आखिर एक पुरुष जो हैं वो.

आपको पता है कि एक रिपोर्ट के अनुसार 93% बलात्कार घरवालों, नाते रिश्तेदारों, परिचितों के द्वारा ही होते हैं. अब बताइये यहाँ कौन सा पहनावा, मोबाइल और रात में बाहर निकलना कारण है बलात्कार का? सब कुछ घर में ही होता है और औरत को उसके औरत होने की कीमत चुकानी पड़ती है. इस प्रकार की पुरुषवादी मानसिकता और प्रवृत्तियों से ही औरत को बचाने के लिए ही परिवार तक के मर्दों से पर्दा करना औरत को सिखाया गया. अक्सर ही आजकल आप अख़बारों में पढ़ सकते हो कि पिता, ससुर, जेठ, भाई, चाचा इत्यादि के द्वारा औरतों का ही नहीं बल्कि नाबालिग बच्चियों का भी बलात्कार होता है. पहनावे और औरत की आज़ादी को बलात्कार का कारण मानने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक लोगों से यह कहना चाहता हूँ कि जब लगभग रोज ही हम अख़बारों में पढ़ते हैं कि 2 अथवा 3 साल की बच्ची से लेकर 10 साल तक की बच्चियों से बलात्कार हो रहे हैं तो कृपया बताएं कि इस उम्र की बच्चियां कैसा कपड़ा पहनकर और किस प्रकार का अंग प्रदर्शन करके इन पुरुषों को इतना कामोत्तेजित कर देती हैं कि वो उनका बलात्कार करने पर विवश हो जाता है.

क्या आप सच में यह समझते हैं कि बलात्कार क़ानून व्यवस्था की समस्या है? या फिर यह सोचते हैं कि सज़ा कड़ी कर देने से आप इसे रोक सकेंगे? सत्य तो यह है कि बलात्कार एक सामाजिक और सांस्कृतिक समस्या है. वह धर्म जोकि स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक बनाता है, जोकि स्त्री को पिता, पति और पुत्र के संरक्षण में रहने की वकालत करते हुए उसे कमज़ोर बनाता है, वह समाज और संस्कृति जिसमें स्त्री के चेहरे को देखकर योनि की कल्पना से उत्तेजित हो जाने वाले पुरुष की कुदृष्टि से बचने के लिए औरत को घूँघट, पर्दा और बुरका पहनना पड़ता है, वहां आप बलात्कार को कैसे रोक पायेंगे? याद रखिये जिस समाज में इस प्रकार की पुरुषवादी मानसिकता रहेगी, उसे आप बलात्कार जैसे अपराध से किसी भी क़ानून और सजा के द्वारा मुक्त नहीं कर पाएंगे. जबतक औरत को समान नहीं समझोगे तब तक बलात्कार जैसे अपराध नहीं रुक सकते और धर्म कभी भी औरत को समानता पर आने नहीं देगा. धर्म का सारा षडयंत्र ही यही है कि औरत को कभी भी पुरुष के समान अधिकार नहीं दिए जाएँ उसे देवी तो बना दिया परन्तु इन्सान नहीं समझा.

यदि बलात्कारिक मानसिकता रोकनी है तो पहले स्त्री की यौन शुचिता जैसी बातें करना बंद करो और औरत की इज्ज़त को अंग विशेष में सीमित करना बंद करो. “इज्ज़त लुटना” जैसे जुमले बंद करो. कुदृष्टि के भय से औरत को कमज़ोर बनाने वाली घूँघट और बुरके की प्रवृत्तियां बंद करो और उसे इन्सान समझो वस्तु नहीं.

धर्म और संस्कृति के झूठे गर्व में मदहोश लोगों को आजकल यदि कुछ भी हो जाये तो पाश्चात्य संस्कृति को दोष देने का फैशन चल पड़ा है. जब कि सत्य यह है कि यहाँ पश्चिम से बहुत जादा व्यभिचार हो रहा है, और ये बात मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ क्यों कि दोनों संस्कृतियों को जी रहा हूँ. पैदा पला बढा यहाँ हूँ और पिछले 13 साल से वहां रह व काम कर रहा हूँ. जितने अपराध, बलात्कार, बेईमानी यहाँ होती है, वहां ऐसी स्तिथी नहीं है. यहाँ के महानगर हों या गाँव आपकी माँ, बहन, बेटी अँधेरा होने पर बाहर निकलने में असुरक्षित महसूस करती है, दो साल की बच्ची से लेकर अस्सी साल की बुढ़िया तक से बलात्कार की घटनाएँ प्रायः सुनने में आती हैं, परन्तु वहां सामान्यतः ऐसा नहीं है, एक जवान लडकी भी अकेले रात को बस अथवा ट्रेन में सुरक्षित यात्रा कर सकती है. आखिर हम वहां की संस्कृति के गुणों को क्यों नहीं देखते और आयात करते हैं? न तो मैं पाश्चात्य संस्कृति के गुण गा रहा हूँ और न ही भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाना चाहता हूँ, मैंने दोनों ही संस्कृतियों के गुण दोष के विषय में बहुत लिखा है. ये भड़ास तो मेरे मन का कष्ट है क्यों कि मुझे मेरे देश से प्रेम है, परन्तु मुझे आज भारतीय होने पर गर्व नहीं हो रहा बल्कि शर्म आ रही है कि किस तरह के समाज में रह रहे हैं हम. क्या दशा है हमारे धर्म की प्रमुखता वाले देश की, चाहे राजनीति हो, नौकरशाही हो, धार्मिक जगत हो सब तरफ दुराचार और भ्रष्टाचार नज़र आता है. मैं धर्म और संस्कृति की दुहाई देने वाले लोगों से ये कहना चाहता हूँ कि इन समस्यायों का हल पाश्चात्य सभ्यताओं को दोष देने से नहीं मिलेगा बल्कि इसके जड़ में देखना होगा कि समस्या आखिर उत्पन्न कहाँ से होती है. जबतक तुम समाज की मानसिकता नहीं बदलोगे भारत को बलात्कार से मुक्त नहीं कर पाओगे.

(बालेन्दु स्वामी की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.