/बलुवाकोट के आपदा पीड़ितों को राशन लेने धारचूला बुलाया…

बलुवाकोट के आपदा पीड़ितों को राशन लेने धारचूला बुलाया…

भाकपा (माले) ने जताया रोष..कहा प्रशासन है बेलगाम…

बलुवाकोट आश्रम पद्धति विद्यालय में बने शिविर में रह रहे आपदा पीडि़तों को प्रशासन चावल-आटा तक उपलब्ध नहीं करा पा रहा है. एसडीएम ने बलुवाकोट के आपदा पीडि़तों को राशन लेने धारचूला मुख्यालय बुला लिया. इस बात को लेकर आपदा पीडि़तों में आक्रोश व्याप्त है. आपदा पीडि़तों को तंग करने में प्रशासन कोई कसर नहीं छोड़ रहा है. इस अव्यवस्था को कोई देखने वाला नहीं है. भाकपा माले के जिला सचिव जगत मर्तोलिया ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर इस अव्यवस्था की शिकायत की.baluwakot-dharchula

उन्होंने कहा कि प्रशासन ने अगर बलुवाकोट में शिविर बनाया है तो उसकी जिम्मेदारी है कि वह शिविर में रहने वाले परिवारों के अलावा किराये में चले गये आपदा प्रभावितों को भी राशन की व्यवस्था स्थानीय स्तर पर करे. उन्होंने कहा कि आपदा पीडि़तों के घर बह चुके हैं. उनका रोजगार उनसे छीना जा चुका है. इस स्थिति में वह दो वक्त की रोटी के लिए प्रशासन के रहमो करम पर टिके हुए हैं. प्रशासन आपदा प्रभावितों को परेशान करने में तुली हुई है. बलुवाकोट से धारचूला आकर एक प्रभावित परिवार को अस्सी रूपये टिकट में खर्च करने पड़ रहे हैं.

प्रशासन ने अभी कई प्राइवेट वाहनों को किराये में लिया हुआ है. इसके बाद भी वह आपदा पीडि़तों को मात्र राशन लेने के लिए तहसील मुख्यालय बुला रहा है. उन्होंने कहा कि धारचूला प्रशासन अपनी मनमर्जी से कार्य कर रहा है. एसडीएम को धारचूला के कांग्रेसी विधायक का संरक्षण मिला हुआ है. इसलिए वह उच्च अधिकारियों की बात भी नहीं सुन रहा है. उन्होंने कहा कि कांग्रेसी विधायक एसडीएम के माध्यम से आपदा पीडि़तों को तंग कर कांग्रेस के लिए गड्डा खोद रहे हैं. स्थिति यह है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता भी अब विधायक और प्रशासन की जनविरोधी सांठगांठ से तंग आकर प्रदर्शन करने लगे हैं.

उन्होंने कहा कि कांग्रेसी अगर इस व्यवस्था पर नियंत्रण रखने में नाकाम हो गये हैं तो उन्हें विधायक को अपनी सदस्यता से त्यागपत्र देने का सुझाव दे देना चाहिए. उन्होंने कहा कि भाकपा (माले) लगातार आपदा पीडि़तों की समस्याओं को उठा रही है. जिलाधिकारी से इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए बलुवाकोट सहित अन्य स्थानों के आपदा पीडि़तों को स्थानीय आधार पर राशन बंटवाने की व्यवस्था को करने की मांग की गयी है. ऐसा न करने पर आन्दोलन की चेतावनी दी गयी है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.