/5.7 इंच का स्टेटस…

5.7 इंच का स्टेटस…

-आलोक पुराणिक||

वाइफ ने बताया- नया नोट आया है, तुम ले लेना.

मैंने निवेदन किया- नोट कौन सा नया है, सारे तो पुराने हैं. गांधीजी ही चल रहे हैं नोटों पर, जिनकी शिक्षाएं मानकर काम तो ना चल पा रहा है, पर नोट तो गांधीजी के पुराने ही चल रहे हैं.Galaxy-Note-II

वाइफ ने डपटा- तुम भुक्खड़ टाइप के आदमी, नोट के नाम पर सिर्फ नोट ही दिखते हैं. अरे नया नोट उर्फ सैमसंग का मोबाइल फोन नोट आया है. 5.7 इंच की स्क्रीन है, झक्कास, लेते ही स्टेटस किसी बाबा के लुच्चत्व की तरह हाई हो जायेगा.

मैंने निवेदन किया-हाय कित्ती बात करे कोई. घर के लैंडलाइन से बात, फिर टैबलेट से, मोबाइल से, फिर लैपटाप-डेस्कटाप पर फेसबुक के जरिये, अब नोट से बात करो, कित्ती बात करें.

वाइफ ने फिर डपटा – तुम पिछड़े आदमी, नोट वगैरह का इस्तेमाल बातचीत के लिए करते हो. स्टेटसवान लोग इसका प्रयोग दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं. इसमें एचडी सुपर अमोल्ड डिस्प्ले, बैटरी 3200 एमए एच की है.

मैंने पूछा- ये अमोल्ड क्या होता है, क्या नोट अमोल पालेकर की तरह विनम्र दिखता है, तो क्या डिस्प्ले जानी लीवर्ड यानी फनी भी होता है, ग्रेट कालोबोरेशन बिटवीन मोबाइल एंड फिल्म इंडस्ट्री और बैटरी 3200 एएमए एच का क्या मतलब है.

OLYMPUS DIGITAL CAMERAवाइफ ने फिर डपटा- यू बैकवर्ड, अमोल्ड, एमए एच का मतलब पूछते हो, समझदार लोग सिर्फ बताते हैं, पूछते नहीं किसी से. जैसे हमारे नेता सिर्फ बताते हैं कि महंगाई ग्लोबल है, बस करप्शन लोकल है. किसी से पूछते थोड़े ही हैं. इस नोट में एक्शन मेमो है, इसमें तुम लिख सकते हो कि किसी को काल करना है, तीन बजे, तो यह नोट खुद ही काल कर देगा तीन बजे.

मैंने पूछा- उफ्फ, अपने आप ही कर देगा काल, मानो मैं किसी को सिर्फ दिखाने भर को लिए नोट करूं कि तीन बजे काल करूंगा, और मुझे करना ना हो, तो ये फोन अपने आप काल कर देगा. मेरे फर्जीवाड़े में मेरा नोट मदद ना करे, तो बेकार है. मोबाइल-नोट में फर्जीवाड़े का जुगाड़ हो, तो ही इसे हाई-टेक माना जा सकता है.

तुम बैकवर्ड, मोबाइल नोट का इस्तेमाल सिर्फ बात करने के लिए करते हो-वाइफ ने मुझे पिछड़ा घोषित कर दिया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.