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बर्गर पर डिस्काऊंट…

By   /  September 8, 2013  /  No Comments

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-आलोक पुराणिक||

हाल में संपन्न हुए पुस्तक मेले में बर्गर-महात्म्य का पता चला.

बर्गर की दुकान पर टकाटक भीड़, लोग लाइन लगाकर दबादब बर्गर खरीद रहे थे, यद्यपि बर्गर पर एक परसेंट का भी डिस्काऊंट ना था.

बुक की दुकानों पर दस-परसेंट, बीस-परसेंट, तीस-परसेंट डिस्काऊंट था, पर बर्गरवाली भीड़ वहां ना थी.chicken-burger-chicken

बुक-मेले में बर्गर की लाइन सबसे लंबी होती है.

पिछले साल फूड मेले में बर्गर-जलेबी-दोसा-ढोकला दबादब बिक रहे थे, एक दुकान तक किताब की ना थी वहां. बर्गरवाले अपने मेले में बुक को घुसने ना देते. पर बुक मेलेवालों को बर्गर का यथोचित, डिस्काऊंट विहीन सम्मान करना पड़ता है.

एक हलवाई-मित्र है मेरा, मेरी कोई किताब जब भी छपकर आती है, तो वह मुफ्त मांगता है.

हलवाई-मित्र अपनी दुकान पर जलेबी छानता है और मैं कभी मुफ्त मांगू, तो डपटता है- धंधे में कोई दोस्ती नहीं. रकम निकालो, जलेबी पकड़ो.

मैं फिर निवेदन करता हूं-दोस्ती के नाम पर डिस्काऊंट ही दे दे.

हलवाई-मित्र फिर गर्व से कहता है-जलेबी है जलेबी, किताब ना है, कि डिस्काऊंट पर दूं.

मैं फिर निवेदन करता हूं-मेरी किताब होती है, तो तू मुफ्त ले लेता है.

हलवाई-मित्र बताता है-देख मेरी जलेबी धंधा है, तेरी किताब तेरा शौक है. शौक की कोई कीमत ना होती.

OLYMPUS DIGITAL CAMERAसत्य वचन, हिंदी में आम तौर पर लेखक के लिए किताबें शौक होती हैं, घरवाले हड़काये रहते हैं कि इनके शौक ने तबाह कर दिया. एक हिंदी लेखक का बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करनेवाला बेटा मुझे बता रहा था-पापा के शौक ने आफत कर दी है,किताब उनकी आती है, लोकार्पण वगैरह, चाय-पानी का जुगाड़ करो, लोकार्पण में आडियंस को घेर-बटोर कर लाओ. बिकती-बिकाती पता नहीं कितनी है, बरसों-बरस रायल्टी का चेक ना आता.(जो आता भी तो पांच सौ हजार का होता). पापा फिर अगले साल लोकार्पण, लोकार्पण किताब-किताब करने लगते हैं. फिर वही आफत, इस बार तो मैंने पापा से कह दिया है-हर साल किताब अफोर्ड ना कर सकते, तीन साल में एक लाओ.

नियोजन सिर्फ परिवार का ही कंसेप्ट ना है, परिवार-नियोजन के साथ अब किताब-नियोजन का कंसेप्ट भी सामने आ रहा है.

छोड़िये बुक को, आइये बिना डिस्काऊंट का बर्गर खायें.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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