/एक छोटे से अपराध में जड़ें समायी है मुजफ्फरनगर दंगे की..

एक छोटे से अपराध में जड़ें समायी है मुजफ्फरनगर दंगे की..

मुजफ्फरनगर में एक संप्रदाय की लडकी से दूसरे संप्रदाय का युवक छेड़छाड़ करता है तो लडकी का भाई क्रोध में आकर अपनी बहन से बदतमीजी करने वाले युवक की हत्या कर देता है. इसपर दूसरे पक्ष के कुछ युवक मिलकर उस युवती के दो भाइयों को मार डालते हैं. फिर इस अपराध कथा का राजनैतिक फायदा उठाने के लिए एक राजनैतिक दल के कट्टरपंथी संगठन महापंचायत के नाम पर महासभा बुलाते हैं और वहां जमकर दूसरे संप्रदाय के विरूद्ध ज़हर उगला जाता है.muzaffarnagar riots

नतीज़ा वापिस लौटती गुस्साई भीड़ से दूसरे संप्रदाय के लोगों का आमना सामना होता है तो हिंसात्मक उत्पात शुरू जाता है. जिसके चलते कई जिंदगियां दम तोड़ देती हैं और बहुत सी जिंदगियां मौत से जीतने की लड़ाई लड़ने लगती है. कई बच्चे यतीम हो जाते है तो कई सुहागने बेवा हो जाती हैं.

कुल मिला कर एक अपराध से शुरू हुई यह आग धर्म आधारित वोटों के ध्रुवीकरण का हथियार बन जाती है. राजनीति का यह घृणित खेल अभी थमा नहीं है. सपा और भाजपा दोनों इस दंगे को अपने अपने पक्ष में भुनाने में लगी हैं तो कांग्रेस मुजफ्फर नगर के इस दंगे की आग में भाले से बाटियाँ सेंक रही है.

अब यह आग सिर्फ मुजफ्फरनगर में ही नहीं लगी हुई है बल्कि इस आग की ज्वाला सोशल मीडिया को भी जला रही है. एक तरफ कट्टरपंथी तत्व फेसबुक और ट्विटर के ज़रिये धार्मिक भावनाएं भड़का रहे हैं तो दूसरी तरफ कट्टरता के खिलाफ सावचेत करने के लिए भी लोग आगे आ रहे हैं.

प्रसिद्ध लेखक और सामाजिक शास्त्री मोहन श्रोत्रिय अपनी फेसबुक वाल पर इस मुद्दे पर लिखते हैं कि:

“किसी #वहम के शिकार मत होओ, #कांग्रेसियो !

भाजपा-सपा को कोस कर, और दंगों की आग पर हाथ सेंक कर तुम राजनीतिक रोटियां नहीं सेंक पाओगे !

#मुज़फ्फ़रनगर दिल्ली से ज़्यादा दूर नहीं है ! ध्यान है न?

केंद्र में, और दिल्ली में भी, अभी सरकार तुम्हारी ही है. भूल तो नहीं गए?

तुम मज़े लेते रहोगे, तो यूपी को गुजरात बनने से तो नहीं ही रोक पाओगे, दिल्ली में भी इस संकट को न्यौत लोगे. इतनी कम-निगाही ठीक नहीं है, देश के लिए !

बनना-बिगडना, सिर्फ़ तुम्हारा होता, तो कुछ न कहता. न ताली बजाओ, न कोसो उन दोनों को, अपनी सकारात्मक भूमिका अदा करो. हस्तक्षेप करो, सक्रिय-सकारात्मक हस्तक्षेप !”

तो पत्रकार नितिन ठाकुर का कहना है कि “अब तक 14 मर चुके हैं और 40 घायल हैं. हैरान हूं देखकर कि तुम लोगों का खून कितना सस्ता है जो उसे नालियों में बहाने को तैयार बैठे हो. तुम मूलरुप से हिंसक हो. अगर मामला धार्मिक उन्माद का ना हो तब भी तुम अपने रिश्तेदारों, भाइयों और पड़ोसियों का खून किसी ना किसी बात पर बहाते ही हो. तुम्हें तो अपने अवैध हथियारों और अवैध मंशाओं को बाहर निकालने का बहाना भर चाहिए. शर्म करो कि तुम्हारे घर के झगड़े सुलझाने के लिए आर्मी को आना पड़ गया है. पूरा हिंदुस्तान तुम पर थूक रहा है और अब तो विदेशों तक से लोग जानना चाहते हैं कि क्या तुम बुद्धि बेचकर खा चुके हो जो अपने घरों को अपने ही हाथों से जला रहे हो. मुझे अफसोस है कि तुम जैसे लोगों से मेरा रिश्ता है.

सामाजिक कार्यकर्ता मोहित खान कहते है कि “मुज़फ्फरनगर के हालातों को देखने के बाद मेरे एक पत्रकार मित्र का कहना है कि “ये खुशबु है गुजरात की” जो मुलायम के सहयोग से नाक में सड़ांध मार रही है.”

मोहित खान ने अपनी एक अन्य वाल पोस्ट पर लिखा है कि “चलिए मान लिया माहौल भाजपाइयों ने ख़राब किया तो अखिलेश बाबू आप क्या कर रहे हो सरकार में बैठ कर? अगर नहीं संभलता तो हट जाइये आप ज़िम्मेदारी लेते हुए.

और कांग्रेसियों तुम क्या इसमें केवल सपा और भाजपा पर आरोप लगा रहे हो क्या तुम्हारी इतनी औकात नहीं कि तुम्हारी केन्द्रीय सरकार अखिलेश सरकार को बर्खास्त करे जिसके शासनकाल में अभी तक सैकड़ों दंगे हो चुके हैं.

और तुम, भाजपा वालो……..दिल पर हाथ रख कर पूछोगे अपने आप से तो पता तो तुम्हे खुद भी है कि तुम क्या कर रहे हो.

बात एकदम साफ़ है कोई सक्रिय रहकर दंगे भड़का रहा है और कोई हाथ पर हाथ धरकर उन दंगाइयों की मदद कर रहा है. और सबसे बड़ावाला अपने समय का इंतज़ार कर रहा है आखिर उसे भी UP ही चाहिए न.”

इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह भी हैं कि स्थानीय पुलिस ने इस अपराध की शुरुआत के समय ही तुरंत कार्रवाई की होती तो यह हालात ही पैदा नहीं होते. मगर पुलिस के पास समय कहाँ होता है त्वरित कार्रवाई करने का.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.