/निहत्थों और निर्दोषों को ना मारो…

निहत्थों और निर्दोषों को ना मारो…

जहाँ एक तरफ मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर अपने अपने राजनैतिक हित साधने के लिए कुछ राजनेता देश भर में कट्टरपंथी धार्मिक भावनाएं भड़काने में लगे हैं वहीँ सोशल मीडिया पर देश के जिम्मेदार नागरिक सक्रिय हो गए हैं तथा सबसे अनुरोध कर रहे हैं कि कट्टरपंथियों के बहकावे में न आयें और अपने विवेक का इस्तेमाल कर भारत के गंभीर और जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दें. हमने फेसबुक पर पोस्ट की गयी ऐसी ही अपीलों को इस पोस्ट में समाहित किया है…

-नितिन ठाकुर||

एक-दूसरे का घर जला रहे बेवकूफों,खुद लगाई इस आग पर पानी डालो. अगर ये आग और भड़की तो किसे-किसे जलाकर खाक कर देगी तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं. आग लगाना तुम्हारे हाथ में है लेकिन भड़की आग पर काबू पाने का दम तुम्हारे बाप में भी नहीं है. अगर ये लड़ाई हिंदू और मुसलमान की मानकर लड़ रहे हो तो फिर मैदान में पाला खींचकर एक-दूसरे पर टूट पड़ो मगर निहत्थों और निर्दोषों को ना मारो. बेचारी औरतों पर ना टूट पड़ो. गरीबों के घर ना लूटो. जिनके दम से तुम दंगे कर रहे हो उन्हें ब्लैक कैट कमांडो मिले हुए हैं,बंगलों के बाहर एंबुलेंस लगी हैं और फायर ब्रिगेड का पानी उन्हीं की सुविधा के लिए है. उनका कुछ ना बिगड़ेगा..अपना सब कुछ तुम खो बैठोगे.

अब मुझे वाकई डर लग रहा है..मेरठ के दंगे याद आ रहे हैं..फिर से जले शरीर आंखों के सामने घूमने लगे हैं..वीरान गलियां ज़हन में खौफ पैदा कर रही हैं. समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं..यहां बैठा बेबस महसूस कर रहा हूं..वाकई.muzaffarnagar violence

-राकेश श्रीवास्तव||

सर्व धर्म संभाव मार्का धर्मनिरपेक्षता की कब्र पर पनपी साम्प्रदायिकता बड़ी ज़हरीली साबित हो रही है .. दिल्ली से ऐसी धर्मनिरपेक्षता ‘राजधर्म’ का आह्वान करती रह जाती है और गुजरात कब्र बनता रहता है .. उसी तरह उत्तर प्रदेश में तत्कालीन शाषकों के तथाकथित सर्व धर्म समभाव के फ्रेम वर्क में इस्लामी कट्टरवाद पनाह पाता है … हिन्दू कट्टरवाद तो सभी दलों में राजनीतिक सामाजिक यथास्थितिवाद के साये तले पलता ही है … राजनीति में शुद्ध और कठोर धर्मनिरपेक्षता का कहीं पता नहीं … प्रशाषण में कानून के शाषण की संभावनाओं को गुजरात के कई अधिकारियों या उत्तर प्रदेश में दुर्गा शक्ति नागपाल आदि के रूप में किनारे कर दिया जाता है ..

-मोहम्मद अनस||

दंगों की आग में उत्तर प्रदेश को झुलसा देने वाली सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और विपक्ष में अमित शाह जैसे हत्यारे जिसे सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली है और जिसकी जमानत रद्द करवाने की अर्जी देने की ज़िम्मेदारी कांग्रेस पर बनती है पर उसने ऐसा नहीं किया.

इन तीनो राजनैतिक दलों को कौन कौन वोट नहीं देगा और गाँव समाज में लोगों को इनकी सियासत से परिचित करवाएगा ?

हमें लखनऊ में मूर्तियाँ मंजूर हैं पर प्रतापगढ़, मसूरी, फैजाबाद और मुजफ्फरनगर जैसे जिलों में जिंदा लोगों की लाशें नहीं.

-अंकित मुत्रिजा||

उत्तर-प्रदेश के मुजफ्फरनगर में साम्प्रदायिक हिंसा अपने चरम पर हैं. ऐसे में कौन ग़लत – कौन सहीं की जगह हमें इंसानी जानों की सलामती की दुआँ करनी चाहिए. प्रदेश की कमान ऐसे निक्कमों के हाथ सौंपने पर संवेदनशील और अमनपरस्त आवाम जरूर दुखी होगी. साम्प्रदायिक ताक़ते राजनीतिक नफ़े की खातिर पूरे प्रदेश के अमन-चैन को नफ़रतों की भट्टी में फूंकने पर आमादा हैं. और उत्तर प्रदेश को निरूत्तर प्रदेश में तब्दील कर देने वाली प्रदेश की कलेश सरकार क्या मूकदर्शक बनकर सब देखने के लिए ही चुनी गई थी जो पिछले चौबीस घंटे से साम्प्रदायिक हिंसा का तांडव जारी हैं. लोगों को चाहिए कि वो साधारण और सतही समझ से बचकर भूल से भी किसी की भावनाओं को न भड़काएं. मौजूदा सरकार के सत्ता में आने के बाद से तकरीबन 27 मर्तबा नफ़रतों की आग जली ज़ाहिर तौर पर जिस आग में उन सभी ने सुकून से हाथ तापें जिनका मकसद ही आवाम को एक दुसरे के खून का प्यासा बनाकर खुद के हित साधना हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.