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विनोद कापड़ी, आपको सलाम…

By   /  September 9, 2013  /  No Comments

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-सुग्रोवर||

मैं इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी से न तो कभी मिला था न निजी तौर पर जानता ही था. पिछले साल भड़ास के संपादक यशवंत सिंह को जेल भिजवाने वाले मामले ने मुझे विनोद कापड़ी से परिचित करवाया. मगर यह परिचय वेब मीडिया की उन रिपोर्टों के जरिये था, जिनसे विनोद कापड़ी की छवि एक ऐसे खलनायक बतौर सामने आ रही थी जिसने एक फ़र्ज़ी FIR के ज़रिये एक पत्रकार को सीखचों के पीछे भेज दिया था. यशवंत सिंह से भी मेरी कोई दोस्ती नहीं थी. एक दो बार फोन पर ही बात हुई थी. लेकिन एक पत्रकार को इस तरह से जेल भेज दिए जाने की घटना ने मुझे विचलित कर दिया था. Vinod Kapdi

ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. झाड़खंड में राज़नामा.कॉम चलाने वाले मुकेश भारतीय की गिरफ्तारी वाला मामला ताज़ा ही था. मीडिया दरबार ने मुकेश भारतीय की गिरफ्तारी पर  भी अपनी आवाज़ बुलंद की थी और बाद में खुद मुकेश ने ही बताया था कि मीडिया दरबार पर उसके पक्ष में लिखे गए लेखों के प्रिंटआउट उसके वकील द्वारा कोर्ट में पेश करने से ही उसे ज़मानत मिल पाई थी.

मीडिया दरबार ने यशवंत सिंह के मामले की भी रिपोर्टिंग शुरू कर दी और जब सी न्यूज़ के संवाददाता को दिए गए साक्षात्कार में खुद कापड़ी ने स्वीकार किया कि यशवंत सिंह ने उनसे बीस हज़ार रुपये उधार मागें थे तो लखनऊ से कुमार सौवीर ने उस पर रिपोर्ट लिखी और मीडिया दरबार पर प्रकाशित हुई. जब यह सब चल रहा था तो उससे कुछ समय पहले  ही मीडिया दरबार के लिए शुरू से लिखते रहे लेखक और सहयोगी धीरज भारद्वाज, जो “मैं मर्तब करूँ किताब-ए-इश्क़ और मेरा कहीं नाम न हो” जैसी मेरी सामने न आने की नीति का फायदा उठाते हुए नॉएडा में खुद को मीडिया दरबार का मालिक घोषित कर चुके थे, मगर उनकी यह सच्चाई सामने आने के बाद कि वे भारद्वाज नहीं बल्कि श्रीवास्तव हैं और खुद को मीडिया दरबार का संपादक भी लिखने लगे हैं और भी कुछ ऐसी घटनाएँ थी जो हमें नागवार गुजर रही थी तो हमने उनका नाम साईट से हटा दिया  और उन्हें दिए गए सभी अधिकार वापस ले लिए गए थे.

जब धीरज के कुछ मित्र विनोद कापड़ी का पक्ष लेकर उनके पास पहुंचे तो उनके पास करने या कहने को कुछ नहीं था. वे कर भी क्या सकते थे. न तो वे कभी मीडिया दरबार के संपादक थे और ना ही मालिक. मरते क्या न करते, मुझे अपराधी ठहराते हुए साईट चोरी का मनघडंत आरोप मढ़ दिया मुझ पर और खुद बरी हो गए. जबकि मीडिया दरबार के सर्वर और डोमेन का पेमेंट तक हमारे यहाँ से होता था जिसके सारे बैंकिंग प्रमाण थे हमारे पास. खुद धीरज के मोबाइल का रिचार्ज भी मेरी नेट बैंकिंग से होता था.

खैर, बात चल रही थी विनोद कापड़ी की. मेरे भीतर तमाम कडुवाहटों के बावजूद हमेशा इंसानियत के प्रति दर्द रहा है और खास तौर पर पत्रकारों के लिए तो मैं हमेशा अपनी सीमाओं के पार भी जाता रहा हूँ, जिसके चलते कई बार मुझे बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी है. मुकेश भारतीय और यशवंत सिंह वाले प्रकरण में भी मेरी यही भावना काम कर रही थी. कुछ समय बाद यशवंत सिंह जेल से बाहर आ गया और मेरी नज़रों से यह प्रकरण भी रफा दफा हो गया. कल हमारे बहुत पुराने मित्र और मार्गदर्शक कमर वहीद नकवी ने जब फेसबुक पर विनोद कापड़ी का स्टेट्स अपडेट शेयर किया तो उसे पढ़कर कर मैं बुरी तरह चौंक गया. चौंकना लाजिमी भी था. विनोद कापड़ी ने मुजफ्फरनगर दंगों के शिकार हो प्राण गवां देने वाले पत्रकार राजेश वर्मा के परिवार को आर्थिक सहायता देने के लिए राहत कोष की स्थापना की थी. वह भी तब,  जबकि राजेश वर्मा IBN 7 के स्ट्रिंगर थे INDIA TV  के नहीं.

मैं करीब दस मिनिट के लिए जैसे सुन्न सा हो गया. विनोद कापड़ी के हृदय में एक पत्रकार के लिए इतनी वेदना हो सकती है, यह कभी सोचा भी न था. फिर सबसे पहले विनोद कापड़ी की वाल पर जाकर उन्हें इनबॉक्स में सन्देश भेजा, उनकी मुहिम से जुड़ने के लिए और उनका स्टेट्स अपनी वाल पर शेयर किया. इसके अलावा खुद भी अपनी वाल पर “राजेश वर्मा राहत कोष” में योगदान करने के लिए अपील भी की. इतना सब करने के बाद भी मन को सुकून न था और अब यह पोस्ट लिख डाली ताकि मन को सुकून हासिल हो. विनोद कापड़ी जी, सुरेन्द्र हर किसी को सलाम नहीं करता, मगर आपने मुझे मजबूर कर दिया है आपको सलाम करने के लिए. आपको मेरा सलाम! कोई गलती हुई हो तो क्षमाप्रार्थी भी हूँ!!

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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