/मरियल मारे, रोने ना दे…

मरियल मारे, रोने ना दे…

-आलोक पुराणिक|| 

मुहावरों के रिवाइज होने का दौर है. जबरा मारे रोने ना दे, का मुहावरा पुराना हुआ, नया यूं है-मरियल मारे, रोने ना दे.

एनबीटी(7 सितंबर, 2013) के मुताबिक, रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत जिस तरह बार्डर पर इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत कर रहा है, उससे चीन में डर है कि कहीं हम उसकी बराबरी ना कर लें.

आलोक पुराणिक
आलोक पुराणिक

भारत की तैयारियों से चीन डर रहा है, ये जानकर आश्वस्त हुआ.

पर मन में कुछ सवाल उठते रहे, मन में उठे सवाल-जवाब इस प्रकार हैं.

जी, चीन डरा हुआ है, मान लिया. मरियल है, मान लिया. फिर बार-बार इंडिया में घुस कर हमारे सैनिकों को गश्त करने से रोकता क्यों है. मरियल है, तो मारता क्यों है हमे.

अबे, मरियल ही तो मारते हैं दूसरों को, हम ताकतवर हम किसी को ना मारते. हम पावरफुलों की तैयारियां देखने आते हैं. आते है, चले जाते हैं इसे घुसपैठ ना कहो, इसे तो विजिट मान लो, चेकिंग विजिट मान लो.

जी सिर्फ आकर नहीं चले जाते. कभी-कभी हफ्तों रह भी जाते हैं.

अबे, डरते हैं, देखकर कि हमने कितनी तैयारी कर ली है. अब तो हम बार्डर की अपनी साइड पर अपना हैलीकाप्टर तक उतारने लगे, ये पावर देखकर जलते हैं हमसे. जलोकड़े हैं मुए.

जी, ये तो कतई नान-प्रोफेशनल सी सास-बहू टाइप बात हो गयी कि हमसे जलने आते हैं वो हमारे बार्डर पर.

अबे, जलने आते हैं, वो हमारी पावर से डरने आते हैं.

जी, इतनी बार आते हैं चीनवाले कि लगता है कि सतत लात मारो अभियान चला रहे हैं वो. हर बार आकर हमारे पिछवाड़े एक तगड़ी लात जमाकर, हमें हमारे ही बार्डर में और अंदर ठेल जाते हैं. आप कह रहे हैं कि हमारी पावर से डरते हैं.

अबे समझ, चीन वाले लात मार कर ये देखते हैं कि हम कितने पावरफुल हैं. वो पिछवाड़े में लात मारते हैं, तो हम लड़खड़ाकर हाय हाय करते हैं. फिर बता देते हैं कि हम पावरफुल हैं, देख हम लड़खड़ाये बस, गिरे नहीं. या गिरे तो पूरा ना गिरे.

जी बिलकुल समझा, हमारी पावर से ही जलने के लिए विदेशी हमारे बार्डर में आते हैं.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.