/वी के सिंह ने कर दी संतोष भारतीय की चमगादड़ जैसी हालत…

वी के सिंह ने कर दी संतोष भारतीय की चमगादड़ जैसी हालत…

-नचिकेता देसाई||

अपना उल्लू सीधा करने के लिए किसी भी हद तक जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय को इस बार उन्हीं की जात बिरादरी वाले वी के सिंह ने बुरे राजनैतिक संकट में फंसा दिया है. पत्रकार महोदय की स्थिति कुछ सांप – छछूंदर जैसी हो गयी है. न तो वे वी के सिंह को निगल पा रहे हैं और नहीं उगल पा रहे. राजनैतिक रंग मंच पर भारतीय उस चमगादड़ की तरह लटक रहे हैं जिसे पशु और पक्षी दोनों ही अपनी जाति में मानने को तैयार नहीं हैं.santosh bhartiya and vk singh

लोक नायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण आन्दोलन में सक्रियता का दावा कर और स्वयं ठाकुर जाति से हैं, इस बिना पर कलकत्ता के हिंदी साप्ताहिक ‘रविवार’ के अंश कालिक संवाद दाता के रूप में नियुक्त होने के बाद भारतीय ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री राम नरेश यादव की सरकार में तबादले से ले कर ठेके दिलवाने का खुल कर व्यापार किया.

‘रविवार’ साप्ताहिक के बैनर का भर पूर फायदा उठाते हुए भारतीय ने उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली के सत्ता के गलियारों में अपनी अच्छी खासी घुस पैठ बना ली. एक चतुर कलाकार की तरह भारतीय अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से लोगो के विश्वसनीय बनने का महारथ रखते हैं. सो, जल्दी ही उन्होंने पूंजीपति कमल मुरारका का विश्वास जीत लिया और उन्हें एक नया साप्ताहिक अख़बार ‘चौथी दुनिया’ शुरू करने को राजी कर दिया. चौथी दुनिया के संपादक बनने के बाद भारतीय ने कमल मोरारका को राज्य सभा सदस्य बनवाने में मदद की और स्वयं वी पी सिंह से ठाकुरवाद के जोर पर लोक सभा चुनाव  लड़ा और जनता मोर्चा की लहर के बल पर जीता.

ठाकुरवाद के चलते वी पी सिंह के प्रधान मंत्री न रहने पर संतोष भारतीय ने चन्द्रशेखर से मेल जोल बढ़ाना शुरू कर दिया ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे. इसी समय उन्होंने गुजरात के मुख्य मंत्री चिमन पटेल द्वारा एक विधवा की जमीन हड़प कर लेने का पर्दाफाश करने वाली खोजी रपट को प्रीतिश नंदी से मिल कर Illustrated Weekly of India में  छपने से रुकवा दिया. इस सेवा के बदले भारतीय को संतुष्ट करने के लिए चिमनभाई ने क्या दिया यह तो सिर्फ दिवंगत मुख्य मंत्री या स्वयं संतोष भारतीय ही बता सकते हैं.

कुछ समय बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती की चाटुकारिता करने के बावजूद चुनावी राजनीति में असफल हो जाने के बाद भारतीय ने फिर से कमल मोरारका को ‘चौथी दुनिया’ अख़बार को पुनर्जीवित करने के लिए राजी कर लिया. ‘चौदू’ के पुन: प्रकाशन पर भारतीय ने  फिर से अपनी खोयी ताकत वापस पा ली और इस बार वे अन्ना हजारे की नाव पर सवार हो गए. यहाँ भी उनका ठाकुरवाद काम आया.  पूर्व सेना अध्यक्ष वी के सिंह को सामने ला कर भारतीय ने भोले भाले अन्ना हजारे को अपना करिश्मा दिखा कर प्रभावित कर दिया.

अन्ना हजारे को जब अमेरिका जाने का न्योता मिला तो उनके साथ वी के सिंह और संतोष भारतीय भी लग लिए. अमेरिका में हजारे पर डॉलर बरसे जिसका हिसाब किसने रखा यह तो अनुमान लगाने की बात है.

अब जब वी के सिंह ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के साथ एक मंच से सेना के पूर्व जवानो की रैली को संबोधित किया तो भारतीय का ऊँट किस करवट बैठे? अब तक तो भारतीय अपने आप को सेक्युलर कहलाते आये हैं. क्या अब वोह भाजपा में शामिल होंगे?

कहा जाता है कि राजनीति में दुश्मन के साथ एक बिस्तर शेयर करना पड़ता है.

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आपातकाल में भूमिगत पत्रिका रणभेरी निकाल कर पत्रकारिता की शुरुआत की. हिंदी तथा अंग्रेजी भाषा में १९७८ से आज तक विभिन्न पत्र पत्रिका तथा समाचार संस्थानों में काम किया.