/मुजफ्फरनगर बनी मुलायम की यादवास्थली…

मुजफ्फरनगर बनी मुलायम की यादवास्थली…

-सुग्रोवर||

मुजफ्फरनगर दंगे ने एक तरफ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की क़ाबलियत पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं वहीँ, नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय फ़लक पर अपने हिन्दू राष्ट्रवाद के पंख पसारने का मौका दे दिया और मोदी तथा उनके समर्थकों ने इस मौके का जम कर फायदा भी उठाया.Mulla Mulayam with Akhilesh Yadav
अखिलेश यादव का सबसे बड़ा दोष यह है कि उन्होंने मुजफ्फरनगर में समय रहते कठोर कदम नहीं उठाया और कट्टरपंथी ताकतों को मज़हबी ज़हर फ़ैलाने का पूरा समय दे दिया. जिसका पूरा फ़ायदा उठाया कट्टरपंथी ताकतों ने.
धारा 144 लागू होने के बावजूद प्रशासन ने अल्पसंख्यक समुदाय की सभा होने दी और बीएसपी सांसद कादिर राणा, विधायक और कांग्रेस के नेताओं ने स्टेज बनाकर भडकाऊ भाषण देना शुरू कर दिया.
दूसरी तरफ मुजफ्फरनगर के भाजपा विधायक और कट्टरपंथी राष्ट्रवादियों ने भड़काऊ तौर तरीके अपना कर पूरे मामले में सांप्रदायिकता ज़हर घोला तो सोशल मीडिया पर नरेन्द्र मोदी की साइबर सेल ने विभिन्न फर्जी वीडियो, फर्जी तस्वीरों और अखबारी कतरनों को फोटोशॉप के ज़रिये तोड़ मरोड़ कर फैलाया और पूरे देश में सनसनी फैला दी.
मैं कभी भी मुलायम सिंह या उनकी पारिवारिक पार्टी और उनकी नीतियों का समर्थक नहीं रहा. लेकिन जब हम जब मुजफ्फरनगर जैसे दंगों पर नज़र डालते हैं और उसका विश्लेषण करते हैं तो हमें ईमानदारी से इस पहलू पर भी नज़र दौड़ानी चाहिए कि उस दंगे का सबसे ज़्यादा फ़ायदा किसको होगा.

आज जब हम उत्तरप्रदेश के राजनैतिक नफे नुकसान का आंकलन करते हैं तो पता चलता है कि इन दंगों का नुकसान सपा को पहुंचा है और सबसे अधिक फ़ायदा भाजपा को.
हालाँकि मुजफ्फरनगर दंगों में दोनों पक्ष हताहत हुए हैं. उदाहरण के तौर पर पत्रकार राजेश वर्मा को भी दंगाइयों ने मौत के घाट उतार दिया तो फोटोग्राफर इसरार भी इस दंगे में अपनी जान गँवा बैठा. यानि जान माल का नुकसान दोनों पक्षों को पहुंचा है. मगर अल्पसंख्यक समुदाय कुछ ज्यादा ही डरा है.
अल्पसंख्यक वर्ग ने मुलायम सिंह पर भरोसा किया मगर सपा सरकार इस वर्ग को सुरक्षा नहीं दे पाई, जिसके चलते अल्पसंख्यक वर्ग मुलायम सिंह से सख्त नाराज़ हो गया और जमीतुल उलेमा ए हिन्द, मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और अन्य तमाम मुस्लिम संगठनों ने मुजफ्फरनगर में हुए हालिया दंगे को लेकर अखिलेश सरकार को बर्खास्त करने की मांग करके मुलायम सिंह को करारा झटका दिया है.
सबसे दुखद यह बात है कि इतना बड़ा दंगा हो जाने के बावजूद मुलायम सिंह और अखिलेश यादव मुजफ्फरनगर नहीं पहुंचे. उत्तरप्रदेश पुलिस के उच्चाधिकारी तो अंदरखाने यहाँ तक स्वीकार कर रहे हैं कि सत्ता में होने के बावजूद मुलायम सिंह और उनके मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश यादव का मुजफ्फरनगर जाना खतरे से खाली नहीं है.
गौरतलब है कि मुलायम सिंह की राजनीति यादव और मुस्लिम वोटों पर आधारित रही है और मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में रखने के लिए मुलायम सिंह ने हर तरह की ड्रामेबाजी की. जिसके चलते उन्हें मुल्ला मुलायम का तमगा भी मिल गया. मुलायम सिंह भी बड़ी शान से इस तमगे को अपने सीने पर टांक इतराते रहे. मगर यही तमगा मुजफ्फरनगर दंगों के चलते मुलायम के सीने से खुद उनके चहेते मुस्लिम संगठनों ने नोच कर उतार फेंका है. जिसके चलते मुलायम सिंह न घर के रहे न घाट के.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.