/टीवी मरवा देगा…

टीवी मरवा देगा…

-आलोक पुराणिक||

नेताजी कह रहे हैं- हमरा इंडिया बहुतै पावरफुल है इत्ता पावरफुल कि फिनलैंड देश की पापुलेशन से करीब दो गुने तो यहां रेहड़ी-खोमचे हैं- करीब एक करोड़.OLYMPUS DIGITAL CAMERA

मैंने निवेदन किया- नेताजी इस अंदाज में मुल्क की पावर ना बताया कीजिये, कनफ्यूज्ड हो जाते हैं कि इस पर रोया जाये कि हंसा जाये.

सड़क के उस पार कोने में चाय, चाट-गोलगप्पे, समोसे की दुकानें हैं, जिन्हे रेहड़ी-खोमचेवाले कहा जाता है. पुलिसवाले यहां फ्री का खाना-रिश्वत के चक्कर में, लेखक विषय की तलाश में, नेता पब्लिक का मूड भांपने आते हैं गज्जू चायवाले ने हाल में टीवी पर आ रहा नया इश्तिहार देखा है, उसमें बताया गया है कि रेहड़ी-खोमचेवाले को बतौर पथविक्रेता कस्बा विक्रय क्षेत्र (इसका मतलब मुझे ना पता) में माल बेचने और पुलिसवालों को खिलाकर उनसे कीमत लेने तक का अधिकार भी है.

गज्जू चायवाला हज्जू चाटवाले से पूछ रहा है- अब पईसा ना देना पड़ेगा क्या ठुल्लू हवलदार को, क्या वह हमारा माल खाकर हमको पईसा देगा. कईसा-कईसा कामेडी दिखाता है बे टीवी पे. टीवी तो मरवा देगा.

हज्जू चाटवाला पढ़ा लिखा सा है- कह रहा है कि एकाध बार ठुल्लू से पईसा मांग कर देखियेगा, तब ना पता चलेगा.

ठुल्लू हवलदार कह रहा है- पूरा इश्तिहार ध्यान से देखिये, तब पता चलेगा. उसमें बताया गया है कि कस्बा विक्रय समिति से कस्बा विक्रय क्षेत्र में बेचने का सर्टिफिकेट वगैरह लेना पड़ेगा. हमें ना दीजियेगा रकम, तो सर्टिफिकेटवालों को दीजियेगा. रकम देने से कहां बचेंगे. और इश्तिहार ध्यान से देखो-पथविक्रेता के गोलगप्पे खाकर पैसे देते हुए हवलदार एक आंख दबाकर शायद ये बता रहा है कि बेट्टे मजाक में दे रहे हैं इस बार. पर मजाक रोज-रोज ना होगा. बेट्टे रकम देने से कहां बचोगे.

सत्य वचन, रकम देने से कहां बचेंगे.

ठुल्लू हवलदार सिंगल विंडो लाइसेंसिंग अथारिटी है, सारे लाइसेंस, सारे परमिट, सारे सर्टिफिकेट उसके डंडे से झड़ते हैं. कई जगह से लाइसेंस-परमिट-सर्टिफिकेट लाने पड़ जायें, तो खोमचेवाले कह उठें कि भईया पुरानावाला सिंगल विंडो लाइसेंस ठुल्लू हवलदार लाइये.

तो यह बताइये, इस पथविक्रेता इश्तिहार को सीरियसली लें या नहीं.

ठुल्लू हवलदार आंख दबाकर कह रहे हैं-खुद ही समझ लीजिये.

हें, हें, सब समझ गये हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.