/फिर फोटू बनिये…

फिर फोटू बनिये…

-आलोक पुराणिक||

 

डिस्क्लेमर-यह लेख राजनीति पर नहीं, सम्मानपूर्वक जीवन जीने की नीति पर है…

श्लोक-

छोटू चरण रहंति बीस वर्षानि, बीस से पचास घोंटू चरण चलस्यानि

पचास से सत्तर विस्फोटू चरणानि, तदनंतर सम्मानपूर्वक फोटू बनानि

भावार्थ-चालू चक्रम नामक नीतिकार चालू-चंद्रिका नामक ग्रंथ के इस श्लोक में पूरी लाइफ को चार चरणों में बांटते हैं-छोटू चरण-उम्र के बीस साल तक, घोंटू चरण-बीस से पचास साल, विस्फोटू चरण-पचास से सत्तर साल तक, फोटू चरण-सत्तर से ऊपर.OLYMPUS DIGITAL CAMERA

छोटू चरण

छोटू चरण बीस साल रहता है, इसमें बंदा लिखे-पढ़े-कार्टून नेटवर्क, पोगो चैनल देखे, परिजनों द्वारा छोटू बुलाये जाने पर आनंदित महसूस करे. छोटू चरण के लिए उपयुक्त हरकतें अगर बंदा आगे के चरण में करता है, तो फिर सम्मान क्षीण हो जाता है. कई ऐसे नेता हैं, जो छोटू चरण से पार जाने के बाद भी छोटूनुमा हरकतें करते हैं.

घोंटू चरण

फिर बीस से पचास साल के चरण में बंदे का घोंटू चरण होता है, घोंटू का आशय यहां दो प्रकार से है. एक, दुनिया, परिवार, नौकरी, कंपनी बंदे को इस चरण में घोंटती हैं. दूसरा आशय ये कि बंदा ही दुनियादारी के सबक घोंटता है कि बीबी से झूठ कैसे बोलें, बास से झूठ कैसे बोलें. घोंटू चरण के खत्म होने तक बंदा दुनियादारी की आवश्यक योग्यताएं अर्जित कर लेता है.

विस्फोटू चरण

पचास से सत्तर साल के चरण में बंदे को पूर्व के चरणों में अर्जित क्षमताओं से विस्फोट कर देना चाहिए. अगर सत्तर तक वड्डा विस्फोट ना हो पाये, तो पुनर्जन्म के सिद्धांत पर गहरा यकीन करना चाहिए कि कोई गल नी, अगले जन्म में या उसके बाद के जन्म में पैदा होकर प्राइम मिनिस्टर या जो मन करे बन जायेंगे. कोई एक जन्म थोड़े है, आगे देखेंगे.

फोटू चरण

यह चरण सत्तर के बाद शुरु होता है. इस चरण में बंदे को अपनी गति फोटू जैसी कर लेनी चाहिए, सिर्फ देखना चाहिए. बोलना ना चाहिए. बोलने पर उसे किसी से यह सुनना पड़ सकता है कि हम अपने विस्फोटू चरण में हैं, आपकी सुनें या अपनी करें. अपनी इज्जत अपने हाथ, अपनी फोटू अपने साथ.

इस चरण में सम्मान सिर्फ फोटू बनकर ही मिलता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.