/जहां विश्वकर्मा को भी जंग लग गया है…

जहां विश्वकर्मा को भी जंग लग गया है…

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​||

बंगाल में विश्वकर्मा पूजा निर्माण और सृजन के उत्सव बतौर मनाने की परंपरा रही है. कुल मिलाकर उत्पादन प्रणाली के देवता हैं विश्वकर्मा.लेकिन बदहाल बंगाल अब उद्योग और कारोबार में कभी अव्वल रहे बंगाल की छाया भी नहीं है. फिर भी  कोलकाता शहर में मंगलवार को विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कामगारों और कर्मचारियों ने देवताओं के वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा की और उनसे कारखानों और उद्योगों की सुरक्षा का आशीर्वाद मांगा. दस्तकारों, वास्तुकारों, यांत्रिकी कर्मचारियों, कामगारों, औद्योगिक कामगारों व कारखानों में काम करने वाले मजदूरों और श्रमिकों ने भगवान विश्वकर्मा ने अपनी सुरक्षा और काम में बेहतरी की कामना की. साइकिल रिक्शा और ऑटो रिक्शा स्टैंड सहित कई स्थानों पर पूजा का आयोजन किया गया. लोगों ने अपने-अपने वाहनों को फूल-मालाओं से सजाया, संवारा. वहीं दूसरी तरफ इंजीनियरों ने पूजा के अवसर पर एक दिन के लिए काम बंद रखा.इसके अलावा शहर में कारखाने और गोदामों को भी पूजा के अवसर पर बंद रखा गया और श्रमिकों ने भक्तिगीतों और पकवानों के साथ विश्वकर्मा पूजा मनाया. शहरवासियों ने भी अपने अपने निजी वाहनों को धो-पोंछकर उसकी साज-सज्जा की.  युवाओं ने इस अवसर पर पतंगबाजी प्रतियोगिता भी आयोजित की.Kolkata_South_Central

हो भी तो कैसे?

कभी कोयलांचल के बिहार झारखंड समग्र अंचल से लेकर आसनसोल दुर्गापुर शिल्पांचल एक तरफ तो दूसरी तरफ हुगली नदी के आर पार हावड़ा से लेकर हुगली और बैरकपुर तक विश्वकर्मा पूजा आयोजन रात को दिन में तब्दील कर दिया करता था. अब भी दुर्गोत्सव और त्योहारी सीजन का औपचारिक उद्बोधन विश्वकर्मा पूजा से होता है. लेकिन कुल मिलाकर यह महज मूर्ति पूजा और कर्मकांड तक सीमाबद्ध है,इसमें उत्पादन शक्ति की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति नहीं है.हो भी तो कैसे? पांच सौ साल पुराने हावड़ा जनपद की पहचान ही उसके कलकारखानों और उद्योग धंधों से है. जहां विश्वकर्मा को भी जंग लग गया है.कामगारों का मुक्तांचल रहा है हावड़ा.जिसे दीदी अब राजधानी बना रही हैं. लेकिन हावड़ा की किस्मत ने अभी करवट नहीं बदली है. कल कारखानों की बंद मशीनों में संगीत के बिना हावड़ा जाग नहीं सकता. मृत जनपद की प्रेतनगरियों में उत्सव में प्राण प्रतिष्ठा हो ही नहीं सकती.

बंद ही बंद

हावड़ा में रेमिंगटन, इंडिया मशीनरी, हिंद गैलवानाइजिंग कारखाना, जेकेडब्लू जैसे विश्वविख्यात कारखाने अब बंद हैं. बंद हैं हथकरघे तमाम. बंद है लेथ मशीनें. बंद है इंजीनियरिंग उद्योग. बंद है घुसुड़ी हनुमान जूट मिल.

कब्रिस्तान सिलसिलेवार

आजादी के बाद हावड़ा, बैरकपुर और हुगली शिल्पांचल की कोई छवि अगर बनी है तो वह छवि सिलसिलेवार बने कब्रिस्तानों की छवि है. रोजगार और आजीविका वंचित जनजीवन में मरघट का सन्नाटा है. नौकरियों, हाकरी, दलाली और अपराध जीवन धाम के चार अध्याय है.

अनुपस्थित उत्पादक समाज

कभी नैहट्टी के समरेश बसु ने बीटीरोडेर धारे लिखकर साहित्य जगत में तूफान पैदा कर दिया था. रातदिन शिफ्टों में चल रहे सैकड़ों कल कारखानों के बीच लाइफलाइन बीटी रोड पर चलते हुए कहीं भी उत्पादक समाज का कोई अस्तित्व ही महसूस नहीं होता आज.आगपाडा़ का डकबैक हो या सुलेखा कारखाना सब बंद हैं. टैक्समेको न हो तो बीटी रोड को पहचनना भी मुश्किल.

कोयलांचल में बची हलचल

कोयलांचल और आसनसोल दुर्गापुर में जो हलचल दिखती है वह  बीसीसीएल और ईस्टर्न कोलफील्ड्स और दुर्गापुर इस्पात कारखाने की वजह से हैं. वरना वहां भी मरघट कम नहीं है.

उजाड़ कपड़ा उद्योग

हावड़ा से लेकर नदिया तक बंगाल की लंबी कपड़ापट्टी कहीं नहीं है अब. हुगली किनारे के शिल्पांचल को अंग्रेज कभी भारत का मैनचेस्टर कहते थे. एक एक करके सारी कपड़ा मिलें बंद हो गयी. मोहिनी मिल, बेलघरिया और बंगलक्ष्मी मिल सोदपुर की ख्याति तो देशभर में थीं.

जूट उद्योग तबाह

हुगली के दोनों किनारे की रौनक जूट मिलों की वजह से थी. अब जूट उद्योग का कोई माई बाप नहीं है. मिल मालिक तबाह हैं. मिलें बंद होती रही हैं एक के बाद. कामगार बेरोजगार होते रहे. हालात लेकिन सुधरे नहीं है. बंगाल के शिल्पांचल का कंकाल बाकी है अब. न खून है और न हाड़.

मांस, प्राण पखेरु तो न जाने कब उड़ गये. टीटागढ़ लूटमैक्स, बरानगर जूटमिल, खड़दह जूटमिल, एनजेएमसी जूट मिल, गौरीपुर जूट मिल लंबे समय से बंद हैं.

साहागंज में सन्नाटा

हुगली में साहागंज विश्वकर्मा पूजा के लिए बंगाल भर में मशहूर है. लेकिन डनलप के विश्वविख्यात कारखाना में लाकाउट होने से विश्वकर्मा की सुधि लेने की हालत में नहीं रहे लोग.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.