/प्याज का क्वार्टर, प्याज का अध्धा…

प्याज का क्वार्टर, प्याज का अध्धा…

-आलोक पुराणिक||

हाय प्याज, कित्ता प्याज, इत्ता प्याज,

प्याज ही प्याज एवरीवेयर, बट नोट टू इट इवन ए प्याज, फिर प्याज आ गया.

प्याज से हुआ एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू इस प्रकार है, प्याज विकट सेलिब्रिटी हो गया है. एक वड्डे टीवी चैनल में एक स्टार एंकर को डांटता प्याज कह रहा था-मेरे भावों की रिकार्ड नहीं रखेगा, तो क्या खाक एंकरी करेगा.OLYMPUS DIGITAL CAMERA

अबे प्याज, उफ्फ, हाय, नो, लिमिट, कित्ता लिखेंगे प्याज पर. फिर प्याज पर बवाल, सत्तर रुपये किलो मिल रहा है, सातवें आसमान पर प्याज. ना ना अब सात आसमान से काम ना चलेगा, सत्तर-अस्सी आसमान चाहिए, या इनसे भी ऊपर, प्याज की सही सिचुएशन बताने को.

प्याज-जी लिखते रहिये, लिखते रहिये, जो खा नहीं पाते, वह लिखते हैं.

अबे प्याज-क्या घोटालों जैसी बात कर रहा है कि जो खा पाते हैं, खा जाते हैं, जो नहीं खा पाते, उन पर लिखते हैं. अबे तू प्याज है, या घोटाला.

प्याज-इस मुल्क में आखिर में हर आइटम को घोटाला ही होना है. खेल, रेल, कोल,पोल, सब आखिर में घोटाला ही है. उन घोटालों के खिलाफ सद्गुणों का भाषण देनेवाले कुछ संत उन घोटालों से बड़े घोटाले हैं. अभी एक एसएमएस आया है मेरे पास, जब किसी चालू संत से हरि ओम का जाप सुनें, तो लेडीज लोगों को हरी होम करना चाहिए, हरी यानी जल्दी घर भागना चाहिए. एक और रिपोर्ट मेरे पास आयी है, संत पाशा ने अदालत में कहा कि बिपाशा चाहिए, उससे ज्ञान चर्चा करनी है. भंग, चरस भी दिलवाइये-राम राम करना है. अदालत ने डांटते हुए बाबा से कहा-बाबा कम में काम चलाओ. तो बाबा ने पलटकर कहा ओके तो फिर रम दिलवाइये, कम में काम चलाऊंगा. राम को कम करके मैंने रम कर लिया है. दिलवाइये.

अबे प्याज, तू बहुत अपडेट रहता है.

प्याज-ये मुल्क मैं ही चला रहा हूं, देख कुछ नेताओं की दुकान मैं ही उखाड़ूंगा, कुछ नेताओं की दुकान मैं ही जमाऊंगा. तू औकात में रह.

अबे प्याज, मेरी औकात तक मत पहुंच.q

प्याज-बड़े-बड़ों की औकात की हवा निकाली है मैंने. मुझ पर पचास-साठ हजार लेख लिखकर जो रकम मिले, उसमें प्याज का क्वार्टर, या आधा प्याज भर खरीद कर मस्त रहियो. पूरे प्याज से तो सिर्फ बात करना, खरीदने की सोचना भी मत.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.