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कोलकाता की सड़कों पर अब टैक्सी चलायेंगी महिलाएं…

By   /  September 19, 2013  /  No Comments

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-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||

बंगाल और खासकर महिलाओं की सुरक्षा के बारे में उठ रहे सवालों का मुंह तोड़ जवाब देने जा रही है मां माटी मानुष की सरकार. कोलकाता की सड़कों में अब टैक्सी चलायेंगी महिलाएं. महिलाओं की सुरक्षा पर अक्सर मुखर प्रख्यात साहित्यकार नवनीता देव सेन ने डा. अमर्त्य सेन के साथ विवाह के बाद जवानी में घर में बच्ची को सुलाकर रात नौ बजे के बाद लंदन में टैक्सी चलाने का अपना अनुभव साझा करते हुए तहेदिल से ममता बनर्जी के इस क्रांतिकारी उपक्रम का स्वागत किया है. दिल्ली में भी कुछ गैरसरकारी संस्थाओं ने महिला टैक्सी चालकों की सेवाएं लेना शुरु कर दिया है.india_taxi

भारत में क्यों नहीं?

गौरतलब है कि मध्य पूर्व एशिया में महिलाएं बतौर टैक्सी चालक बहुत लोकप्रिय है. जहां महिलाओं की आजादी भारत के मुकाबले बहुत कम है. मध्य पूर्व के देशों में ईरान ने सबसे पहले 2006 में महिला टैक्सी चालकों की इजाजत दी थी. इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात, लेबनान, सीरिया, कुवैत और मिस्र ने अपने यहां महिलाओं को टैक्सी चलाने की इजाजत दे दी. पुरुष चालकों की तुलना में महिला चालक ड्राइविंग में अधिक ध्यान देती हैं. साथ ही ग्राहक भी पुरुष चालकों के मुकाबले महिला चालकों से ज्यादा सहज महसूस करते हैं. अगर मध्य पूर्व में महिलाएं टैक्सी चला सकती हैं तो भारत में क्यों नहीं. मध्य पूर्व के शहरों में महिलाएं पुरुष चालकों के मुकाबले लोगों को आरामदायक और सुरक्षित सेवा उपलब्ध करा रही हैं. यहां महिलाएं गुलाबी रंग की टैक्सियां बखूबी सड़कों पर दौड़ा रही हैं.
सुरक्षा को लेकर चिंता

अब दो दिन की घोषित बस हड़ताल अगर आखिरी वक्त तक नहीं टलती तो बसों के लिए दो दिनों तक हैरान परेशान होने के बजाय परिवहन मंत्री मदन मित्र को आप कोस नहीं सकते. हालांकि कुछ शक्की लोग अब भी इन महिला टैक्सी चालकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.

परिवहन में नदारद महिलाएं

वैसे खास कोलकाता में यह कोई नयी बात नहीं है. बीस साल पहले नीलरतन सरकार अस्पताल में एंबुलेंस चलाती रही हैं एक महिला. लेकिन उनके रिटायर होने के बाद सरकारी परिवहन में महिलाएं सिरे से अनुपस्थित है. प्रगतिशील वाम जमाने में भी महिला सशक्तिकरण की दिशा में परिवहन में महिला चालकों की नियुक्ति नहीं हो पायी. हालांकि कुछ समय पहले वातानुकूल वाल्वो और सीएसटीसी की कुछ बसों में महिला कंडकटरों को नौकरी दे दी गयी हैं. लेकिन वे अब कहीं नहीं दीखतीं.

चार हजार नये परमिट

बहरहाल परिवहन मंत्री ने ऐलान कर दिया है कि पूजा से पहले महानगर कोलकाता में चार हजार नये टैक्सी परमिट जारी किये जायेंगे और महिलाओं ने अगर आवेदन किया तो उन्हें भी परमिट मिल जायेगा.

पूजा के दौरान ही

अब महिलाओं पर है कि वे कोलकाता मे टैक्सी चला कर परिवर्तन के जमाने में कानून व व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा संबंधी शंकाओं को निर्मूल साबित कर पाती हैं या नहीं.
ऐसा हो गया तो पूजा के दौरान ही कोलकाता की सड़कों पर महिलाएं भी टैक्सी चलाती नजर आयेंगी.

रियायती दरों पर कर्ज भी

मदन बाबू ने वायदा किया है कि उन्हें बैंकों से रियायती ब्याज दरों पर कर्ज भी दिलायेगी सरकार.

सुबह सात बजे से शाम पांच बजे तक

हालांकि मदन बाबू ने यह साफ कर दिया है कि सुबह सात बजे से शाम पांच बजे तक महिलाओं को टैक्सी चलाने का परमिट दिया जायेगा.जाहिर है कि नवनीता दी की तरह लंदन में रात में टैक्सी चलाने का अवसर कोलकाता में महिलाओं को नहीं मिलेगा.हालांकि मदन बाबू यह भी कह रहे हैं कि यह बंदोबस्त शुरुआत के लिए है.

बसों में महिला कंडक्टर भी

मदन बाबू ने सरकारी बसों में महिलाओं को कंडक्टर पदों पर नियुक्ति देने का वायदा भी किया है और ऐसी नियुक्तियों के लिए समय उन्होंने बांधा भी नही है.

माकपा ने स्वागत किया
माकपा ने भी इस उपक्रम का स्वागत किया है. पूर्व मंत्री रेखा गोस्वामी ने स्वागत के साथ यह दावा भी किया कि वाम जमाने में लक्जरी कारे चला रही थी तीन तीन महिलाचालक. वैसे आम तौर पर महिला सशक्तिकरण से जुड़ी संस्थाएं इस उपक्रम का स्वागत कर रही हैं.हालाकि रेखा जी ने महिला टैक्सी चालकों की सुरक्षा का इंतजाम करने पर भी जोर दिया है.

पटना में भी पहल

पटना की सड़कों पर जल्द ही आपको महिलाएं कैब की स्टेयरिंग थामे दिखेंगी. महिलाओं को टैक्सी चलाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.महिला ऑटो के सफल परिचालन से उत्साहित बिहार ऑटो चालक संघ ने अब महिलाओं को टैक्सी चलाने का प्रशिक्षण देने का फैसला लिया है. इसकी शुरुआत अक्टूबर से होगी. बिहार स्टेट ऑटो चालक संघ ने ऑटो के बाद महिलाओं को चार चक्के की गाड़ियां चलाने का प्रशिक्षण देने का फैसला लिया है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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