/नीतीश ने बदला पैंतरा, बोले, टोपी और तिलक दोनों जरूरी…

नीतीश ने बदला पैंतरा, बोले, टोपी और तिलक दोनों जरूरी…

-राज कमल||

जालीदार टोपी के हिमायती मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब उत्तर प्रदेश में मुज़फ्फरनगर दंगे के बाद सपा सरकार की हालत और हालात को देखा तो अब पैंतरा बदल रहे हैं. नीतीश कुमार ने आज अपने बयान में धार लगाते हुए कहा की- “टोपी और तिलक दोनों जरुरी है.”nitish

चुनावी माहौल में विकास, सुशासन और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर छिड़ी बहस के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कांग्रेस की तर्ज पर समावेशी विकास का मंत्र दिया है. इस बहाने उन्होंने अल्पसंख्यकों की खातिर किए जा रहे कार्यो के लिए अपनी पीठ थपथपाई तो परोक्ष रूप से भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा. नाम लिए बगैर उन्होंने कहा- ‘बाहर जो हवा चलाई जा रही है, वह ब्लोअर की हवा है, कुदरत की नहीं.’ उन्होंने टोपी व तिलक को साथ लेकर चलने की वकालत की.

शुक्रवार को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में ‘भारत की अवधारणा’ पर व्याख्यान में नीतीश मुख्य वक्ता थे. लगभग 40 मिनट के भाषण में उन्होंने अधिकतर समय या तो सांप्रदायिक दंगे पर बात की या बिहार में अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए उठाए गए कदमों के बारे में. मुजफ्फरनगर दंगे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ‘कुछ ताकतें सांप्रदायिक तनाव को हवा देती हैं.’ आठ साल तक शांत रहे बिहार में भी पिछले कुछ हफ्तों में तनाव फैलाने की कोशिशें हुई हैं. हमें खुद से पूछना चाहिए कि वह कौन लोग हैं?

इस दौरान उनका हर निशाना गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी पर केंद्रित था. नीतीश ने कहा कि हर वर्ग को साथ लेकर चलने की कोशिश ही भारत की अवधारणा है. जो इससे हटने की कोशिश करता है, वह समाज के लिए खतरा है. इसके लिए मन में सभी के लिए सम्मान होना चाहिए. ‘कभी टोपी लगानी पड़ेगी तो कभी तिलक भी लगाना होगा.’

अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्लाह, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के. रहमान खान की मौजूदगी में उन्होंने याद दिलाया कि बिहार में उनकी सरकार सबके लिए काम कर रही है. भागलपुर दंगे की दोबारा जांच कराकर दोषियों को सजा दिलाने, अल्पसंख्यक बच्चों के लिए वजीफा जैसे कदम का उल्लेख करते हुए नीतीश ने कहा कि सबका विश्वास जीतकर ही देश को एकजुट रखा जा सकता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.