/बाबागिरी के पीछे का घिनौना सच : एक विश्लेषण..

बाबागिरी के पीछे का घिनौना सच : एक विश्लेषण..

-आर के पाण्डेय ‘राज’||

भारत जैसे देश में जहाँ कृष्ण जैसे महान व्यक्तित्व ने सभी क्षेत्रों में सच्चाई को स्वीकार करके एक से एक नायाब उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, वहाँ हम क्यों चाहते हैं कि सन्त या महापुरुष मुखौटे धारण करके अप्राकृतिक जीवन जियें? सेक्स या सम्भोग एक अति सामान्य और स्वाभाविक क्रिया होने के साथ-साथ प्रत्येक जीव के लिये अपरिहार्य भी है, जिसे रोकना या दमित करना अनेक प्रकार की मानसिक बीमारियों और विकृतियों को जन्म देता है. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसे कभी भी रोकना नहीं है, बल्कि हर हाल में इसकी जरूरत को स्वीकार करने का साहस जुटाना होगा. तब ही हम सच्चे महापुरुषों एवं सन्तों को फलते-फूलते देख सकते हैं. अन्यथा हमें अपने आपको आये दिन ऐसे यौनाचारी तथा पाखण्डी साधु-सन्तों और महापुरुषों या राजनेताओं के हाथों अपनी भावनाओं को आहत होते रहने देने के लिये सदैव तैयार रखना चाहिये. आप और हम ऐसे बाबाओं के कारनामों से अपने आपको आक्रोशित और अवसादित करते रहेंगे, जिस से इन बाबाओं का तो कुछ नहीं होगा हम और आप मानसिक तौर पर परेशान जरुर हो जायेंगे. लेकिन मन और अंतरात्मा इस समर्पण की स्वीकारोक्ति नहीं देती, नैतिकता विरोध के लिए प्रेरित करती है.shades of godmen

कुछ वर्ष पूर्व गुजरात में जैन सन्त सेक्स स्केण्डल में लिप्त पाये गये थे. गुजरात से ही ताल्लुक रखने वाले सन्त आसाराम एवं उनके पुत्र नारायण सांई पर भी अनेक बार आपत्तिजनक आरोप लग चुके हैं. दिल्ली में इच्छाधारी सन्त को सेक्स रैकेट में पकडे जाने की खबर अभी ठण्डी भी नहीं हुई थी कि कर्नाटक के स्थानीय समाचार चैनलों ने परमहंस नित्यानंद के दो महिलाओं के साथ अश्लील कृत्य में शामिल होने का वीडियो फुटेज जारी कर दिया. जिससे परमहंस नित्यानंद के विरुद्ध स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पडा और लोग सडकों पर उतर आये एवं नित्यानन्द की तस्वीर को जूतों से पीटते हुए अनेक हिन्दी चैनलों पर भी दिखाये गये. परमहंस नित्यानंद का वह आश्रम जहाँ पर वे लोगों को प्रवचन दिया करते थे, 29 एकड के क्षेत्र में फैला हुआ है. जिससे उनके बडे और धनाढ्य सन्त होने का प्रमाण स्वतः ही मिल जाता है. आश्रम के एक प्रवक्ता ने कहा कि परमहंस नित्यानंद के खिलाफ साजिश रची गई है. कुछ वर्षों पूर्व इसी प्रकार के आरोपों वाला एक आलेख पूर्ण पुट्टपर्ती के साई बाबा पर भी देश की प्रतिष्ठित पत्रिका इण्डिया टुडे ने प्रकाशित किया था. परन्तु बात आई-गयी हो गयी. मामला दब गया और जनता भूल गयी. उस समय मुरली मनोहर जोशी देश के मानव संसाधन मन्त्री थे और वे साई बाबा के भक्त रहे हैं.

उपरोक्त मामले तो इस आलेख के प्रारम्भ में भूमिका के रूप में दिये गये हैं. अन्यथा इस प्रकार के अनेकों उदाहरण हर गाँव, शहर और कस्बे में मिल जायेंगें. इतिहास उठाकर देखें तो हर कालखण्ड में ऐसे अनेकों मामले होते रहे हैं. हर वर्ग, जाति और सम्प्रदाय में कमोबेश इस प्रकार की घटनाएँ सामने आती रहती हैं. भारत में ही नहीं हर देश में इस प्रकार के मामले देखे जा सकते हैं. चूंकि पूर्व में इस प्रकार की घटनाएँ खबर नहीं बन पाती थी. इसलिये लोगों को पता नहीं चल पता था, लेकिन इन दिनों मीडिया में गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है. इसलिये चैनल और समाचार-पत्र अपनी दर्शक एवं पाठक संख्या में वृद्धि करने के लिये आजकल तो ऐसे हालातों को पूर्व नियोजित तरीके से घटनाओं में परिवर्तित करके खबरें बना कर बेच रहे हैं.

ऐसे हालात में जनता की ओर से हंगामा करने और देश तथा जनता की सम्पत्ति को नुकसाने पहुँचाने वाली भीड को उकसाने के लिये मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है. मीडिया के लोगों में भी ऐसे ढेरों मामले हैं, लेकिन बिना मीडिया के सहयोग के उन्हें उजागर करना किसी के लिये सम्भव नहीं है. पिछले दिनों मुझे मेरे एक मित्र ने बताया कि अपने आपको राष्ट्रीय चैनल कहने वाले दिल्ली (नोएडा) के एक चैनल में युवा और सुन्दर दिखने वाली लडकियों को आऊट ऑफ टर्न (बिना बारी के) पदोन्नति देना आम बात है और एक-दो बर्ष बाद ही उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखा दिया जाता है. कारण ये है कि आज मीडिया में स्टिंग ऑपरेशन का दौर है और स्टिंग ओपरेशन की सच्चाई ये है की प्रायः स्टिंग के लिए मीडिया के द्वारा अमूमन ऐसे ही युवा और सुन्दर महिलाओं का चयन किया जाता है. लेकिन सच्चाई ये है की स्टिंग में शामिल अधिकाँश लड़कियां स्वयं को उस व्यक्ति के सामने एक शिकार के रूप में परोसती हैं और लगातार परोसती रहती हैं. धीरे धीरे कई रहस्योद्द्घाटन होते जाते हैं और स्टिंग ओपरेशन के नाम पर कॉर्पोरेट मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ा लेती है. शिकार बनी उस लड़की का भविष्य क्या हुआ, वो कहाँ गयी इस बात से किसी को पता नहीं चलता. कुछ अपना जॉब प्रोफाईल बदल लेती हैं, तो कुछ हाई प्रोफाईल कॉल-गर्ल बन जाती हैं.

इस सन्दर्भ में, मैं कहना चाहता हूँ कि यदि हम इतिहास के पन्ने पलट कर देखेंगे तो पायेंगे कि ऋषी-मुनियों के काल से लेकर आधुनिक काल के सन्तों तक कोई भी काल खण्ड ऐसा नहीं रहा, जिसे कि हम यौनाचार से मुक्त काल कह सकें. आदि काल में केवल पुरुष यौनाचार करने या इसे बढावा देने के लिये जिम्मेदार माना जाता रहा था, जबकि आज के समय में स्त्री ने उस पर पुरुषों द्वारा थोपी गयी लक्ष्मण रेखा को लांघना शुरू कर दिया है.

मानव मनोविज्ञान का सर्वमान्य सिद्धान्त है कि जब भी किसी पर कोई बात जबरन थोपी जाती है तो उसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से भयंकर होती है. हम आम लोग मानव होकर के भी मानव की स्वाभाविक वृत्तियों को भुलाकर ईश्वर की आराधना से जुडे लोगों, जिन्हें हम सन्त-महात्मा कहते हैं से अपेक्षा करने लग जाते हैं कि ईश्वर की भक्ति का रस चखने वाला व्यक्ति अन्य बातों के अलावा काम से तो पूरी तरह से मुक्त होना चाहिये, जबकि सच में ऐसा न तो कभी हुआ है और न हीं वर्तमान में और न हीं ऐसा सम्भव है. कुछ कपोल कल्पित कहानियों को छोड दिया जाये तो स्वयं हमारे भगवान भी काम से मुक्त नहीं रहे हैं तो फिर भगवान के भक्तों से काम से मुक्त रहने की अपेक्षा करना उनके साथ ज्यादती के सिवा कुछ भी नहीं है.

गाईड फिल्म के हीरो की तरह कोई बात जब किसी पर थोप दी जाती है तो उस व्यक्ति की मजबूरी हो जाती है कि वह जनता द्वारा गढी गयी छवि के अनुरूप आचरण करने का प्रयास करे. जबकि उसके अन्दर बैठा मानव तो आम मानव जैसे सभी कार्य करने को छटपटाता रहता है. हम ऐसे कथित या वास्तविक सन्तों से आम मानवीय आचरण करने की अपेक्षा नहीं करना चाहते. इसी का परिणाम है कि उन्हें मुखौटा लगाकर जीने को विवश होना पडता है. जैसे ही मुखौटे से पर्दा हटता है, हम ऐसे व्यक्ति के फोटो पर जूतों की माला पहनाने लगते हैं.

इसके पीछे भी हमारा एक मनोविज्ञान है. हमें इस बात का उतना दुःख नहीं होता कि सन्त महाराज ऐसा यौनाचार क्यों कर रहे हैं, बल्कि दुःख इस बात का होता है कि सन्त की जो छवि हमने गढी वह टूट क्यों गयी. हमने धोखा क्यों खाया? अब हम किसके समक्ष अपने पापों का पायश्चित करेंगे? हम लोगों के समक्ष किस प्रकार से कह सकेंगे कि हम यौनाचारी सन्त के भक्त रहे हैं? यही नहीं, बल्कि कुछ भक्तों को तो ऐसे मामले उजागर होने पर इस बात के कारण भी गुस्सा आता है कि जिस यौनानन्द से वे स्वयं वंचित हैं और जिन यौनानन्दों को त्यागने के लिये सन्त जी प्रवचन देते रहे, वे स्वयं उनका पूर्णानन्द लेते रहे?

इस सम्बन्ध में एक बात पाठकों की अदालत में रखना जरूरी समझता हँू, बल्कि एक सवाल उठाना चाहता हूँ कि भक्तगण क्या इस बात से परिचित नहीं हैं कि जब वे सन्तों के प्रवचन सुनने जाते हैं तो दान पेटी में जो भी धन अनुदान करते हैं, वह सन्त जी जेब में जाता है. इस धन को दान करने के पीछे भक्तों का विचार नेक हो सकता है, लेकिन इस धन के उपयोग के बारे में भी तो भक्तों और अनुयाईयों को विचार करना चाहिये. मुझे याद है कि दस वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के एक शहर में एक सन्त जब भी सात दिन के लिये प्रवचन देने आते थे तो आयोजक उन्हें दस लाख रुपये का अग्रिम भुगतान किया करते थे. जिसके बदले में दान पेटी से आने वाला धन तथा एकत्रित किये जाने वाले चन्दे पर कार्यक्रम आयोजकों का पूर्ण अधिकार होता था. इस प्रकार के आयोजनों से आयोजकों को सात दिन में कई लाख की कमाई होती थी. इस प्रकार की बातों के बारे में जानकारी होने के बाद भी भक्तगण दान पेटी में प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य ही डालकर आते हैं.

यदि निष्पक्षता से देखा जाये तो धन और सन्त का कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिये. सच्चे सन्त को तो दो वक्त के भोजन और जरूरी कपडों के अलावा किसी वस्तु की जरूरत होनी ही नहीं चाहिये. लेकिन आज के सन्त तो वातानुकूलित कक्षों में निवास करते हैं और वातानुकूलित वाहनों में ही यात्रा करते हैं. हम स्वयं उन्हें सारी सुख-सुविधाएँ जुटाते हैं, लेकिन इसके विपरीत हम यह भी चाहते हैं कि कंचन (धन-दौलत) के करीब रहकर भी वे कामिनी (काम) से दूर रहें! क्या यह आसान और सम्भव है? ऐसा हो ही नहीं सकता. इसलिये जो-जो भी सन्त यौनाचार के कथित आरोपों में पकडे जा रहे हैं, उनको इस मार्ग को अपनाने के लिये प्रत्यक्षतः भक्त भी उकसाते हैं.

इस सम्बन्ध में यह बात और भी विचारणीय है कि प्रत्येक स्त्री और पुरुष का अनिवार्य रूप से यौन जीवन होता है. जिसे भोगने का उसे जन्मजात और संविधान सम्मत अधिकार होता है. जब हम सन्त और महापुरुषों से अपेक्षा करते हैं कि वे सेक्स से दूर रहें तो हम संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित दैहिक स्वतन्त्रता के मूल अधिकार से सन्तों को वंचित करने का अपराध कर रहे होते हैं. जिसकी प्रतिक्रिया में इन लोगों को मूजबूरन गोपनीय रूप से अपनी यौनेच्छा को तृप्त करना पडता है, जिसमें पकडे जाने का खतरा हमेशा बना रहता है. फिर भी आज के समय में सन्त होना सबसे सुरक्षित व्यवसाय सिद्ध हो रहा है!

भारत जैसे देश में जहाँ कृष्ण जैसे महान व्यक्तित्व ने सभी क्षेत्रों में सच्चाई को स्वीकार करके एक से एक नायाब उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, वहाँ हम क्यों चाहते हैं कि सन्त या महापुरुष मुखौटे धारण करके अप्राकृतिक जीवन जियें? सेक्स या सम्भोग एक अति सामान्य और स्वाभाविक क्रिया होने के साथ-साथ प्रत्येक जीव के लिये अपरिहार्य भी है, जिसे रोकना या दमित करना अनेक प्रकार की मानसिक बीमारियों और विकृतियों को जन्म देता है. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसे कभी भी रोकना नहीं है, बल्कि हर हाल में इसकी जरूरत को स्वीकार करने का साहस जुटाना होगा. तब ही हम सच्चे महापुरुषों एवं सन्तों को फलते-फूलते देख सकते हैं. अन्यथा हमें अपने आपको आये दिन ऐसे यौनाचारी तथा पाखण्डी साधु-सन्तों और महापुरुषों या राजनेताओं के हाथों अपनी भावनाओं को आहत होते रहने देने के लिये सदैव तैयार रखना चाहिये.

अन्त में एक बात और भी कहना चाहूँगा कि जो-जो भी सन्त या महापुरुष सेक्स स्केण्डल में पकडे जा रहे हैं, उनके बारे में सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने वाले अंध-भक्तों को भी समझाया जाए की ईश्वर से बड़ा कोई संत नहीं हो सकता. ईश्वर कुकर्म की इजाजत या छूट इन बाबाओं को नहीं देता. ये भी कानून के मातहत हैं और अगर ये दरिन्दे हैं तो इनसे दूरी बनाना जरुरी है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.