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जिसने बढ़ाई थी यूपी की शान, आज चला रहा पान की दुकान…

By   /  September 22, 2013  /  1 Comment

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-आर. के. पाण्डेय “राज”||

जिस शख्स ने अपनी प्रतिभा से उत्तर प्रदेश की शान में चार चांद लगा दिए थे. आज उस शख्स को अपना परिवार चलाने के लिए पान की दुकान का सहारा लेना पड़ रहा है. जी हां हम बात कर रहे है, कानपुर के बर्रा इलाके में रहने वाले सुरेश शिरोमणि की, जो किसी जमाने में उत्तर प्रदेश के बॉक्सिंग चैपियन रह चुके है. सुरेश ने ये गौरव एक साल या दो साल तक ही बरकरार नहीं रखा, बल्कि साल 1987 से 1996 तक इनके सिंहासन को कोई हिला भी ना सका.Suresh Boxer

सुरेश के अनुसार उन्हें बचपन से ही इस खेल में रुचि थी. बचपन का यह शौक बड़े होते-होते जूनून में बदल गया. इस प्रतिभा को सबसे पहले कानपुर के डीबीएस कॉलेज के छात्रों और टीचर्स ने देखा. इस कॉलेज के स्पोर्ट्स टीचर अरुण कुमार शर्मा ने देखते ही कह दिया था, कि तुम इस खेल में अपने साथ-साथ देश का भी नाम रौशन करोगे. इसके बाद से सुरेश ने अरुण कुमार को ही अपना गुरु बना लिया, और फिर सुरेश ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

साल 1988 से 1996 के बीच सुरेश ने दर्जनों मैडल जीते. इसमें राष्ट्रीय स्तर पर पांच मैडल थे बाकी प्रदेश स्टार पर जीते हैं. सुरेश ने सबसे पहले वर्ष 1987-88 में मेरठ में जूनियर बॉक्सिंग चैम्पियनशिप जीतकर प्रदेश वासिओं के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी. इसके बाद उन्होंने साल 1993 में हैदराबाद, मिजोरम, में हुए आल इण्डिया जूनियर बॉक्सिंग चैम्पियनशिप जीतकर, प्रदेश की नाम लिस्ट में अपना नाम सबसे ऊपर कर लिया. इस दौरान सुरेश का दो बार चुनाव नेशनल कैम्प में हुआ, लेकिन वह कहते हैं आदमी के बढ़ते कदम उस वक़्त रुक जाते है, जब पैसा बीच में आ जाता है.

सुरेश की माने तो इनके पिता स्वर्गीय डोरी लाल शिरोमणि ने इनको इस खेल में जाने से मना किया था. लेकिन वह नहीं माने, और एक के बाद एक बॉक्सिंग के खेल की सीढियां चढ़ते गए, गुजरते वक़्त के साथ खेल में बढ़ती राजनीति, सरकार की उपेक्षा और घर की खराब होती आर्थिक स्थिति के आगे सुरेश ने घुटने टेक दिए. उसके बाद साल 1997 में इन्होंने बॉक्सिंग खेलनी छोड़ दी, खेल छोड़ने के बाद सुरेश ने आरपीएफ में पुलिस की नौकरी के लिए कोशिश की, इन्हें लगा कि इनके खेल सर्टिफिकेट के आधार पर कुछ तो तबज्जो दिया जाएगा, लेकिन एक अधिकारी ने इनको इंटरव्यू में पास करवाने के लिए 15,000 रुपये की मांग कर डाली, तब सुरेश पूरी तरह से टूट गए.

Suresh Boxer1साल 1997 से 2000 तक सुरेश नौकरी के लिए भटक ही रहे थे, कि साल 2000 में पिता जी ने इनकी शादी कर दी. शादी हो जाने के बाद सुरेश की जिम्मेदारियां बढ़ गई, वह समझ नहीं पा रहे थे, कि क्या करें. तब सुरेश ने अपने जीवन यापन के लिए जो फैसला लिया, उसे सुनकर इनकी मां की आंखो से आंसू निकल आए. इनके बाबूजी को गहरा सदमा लगा. दरअसल सुरेश ने अपने परिवार का पेट पालने के लिए पान की दुकान खोलने की इच्छा जाहिर की, और साल 2002 में सुरेश ने एक पान की दुकान खोल ली.

जिस शख्स ने अपने जीवन में आजतक पान, गुटखा या अन्य नशा ना किया हो, उसके लिए ये काम बेहद मुश्किल था. लेकिन कहते हैं ना मज़बूरी इंसान से सब करवा देती है. अब सुरेश ने भी इस पान की दुकान को अपना मुक्कदर बना लिया है. दुकान के साइन बोर्ड पर “बॉक्सर पान की दुकान” लिखवा दिया. सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक सुरेश अपनी दुकान पर ही बैठते हैं, आज इनकी दुकान कानपुर के दक्षिण इलाके में बेहद फेमस हो गई है. गुटखा, सिगरेट और अन्य नशे की चीजों से घृणा करने वाले सुरेश अब दिन भर इन्ही सब चीजों के बीच घिरे रहते हैं. लेकिन वह खुद इनका सेवन नहीं करते हैं.

लोग सुरेश को उनके नाम से नहीं बल्कि बॉक्सर के नाम से जानते है. बॉक्सर सुरेश के दो बच्चें हैं, जिसमें एक लड़की प्रिंसी, जो क्लास 5वीं में पढ़ती है, और बेटा क्लास 4 में. बॉक्सर कभी नहीं चाहते की उनका बेटा इस खेल को चुने और इसमें आगे बढे.Suresh Boxer2

सुरेश को आज भी वह दिन याद है जब पहली बार इंडिया कैम्प में चुनाव हुआ था. लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने की वजह से इन्होंने अपना नाम वापस ले लिया था. तब दुश्मनों को रिंग में पस्त कर देने वाले सुरेश खूब रोये थे. उनका कहना है की आज से बीस साल पहले उत्तर प्रदेश सरकार जहां इनको बाहर जाने पर दो टाइम का खाना और एक टाइम का नास्ता करने के लिए महज 80 रुपये देती थी. लेकिन पंजाब और हरियाणा की सरकार अपने बॉक्सर को 400 रुपये देती थी. आज वर्तमान में भी उत्तर प्रदेश सरकार जहा बॉक्सर को महज 150 रुपये देती है, तो पंजाब और हरियाणा की सरकार 700 रुपये दे रही है. एसे में आप खुद अंदाजा लगा लीजिए कि कहा के खिलाड़ी बेहतर होंगे, और अपने देश का नाम रोशन करेंगे.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. surash jia koa miya nmas kar krta hua deas koa kya khajya das miya gdara loga jada hia hogya hia choar loga hia

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