/फुटकर चंदे के दम पर माकपा की आय सौ करोड़…

फुटकर चंदे के दम पर माकपा की आय सौ करोड़…

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||

भारत में सर्वहारा क्रांति के सबसे बड़े झंडाबरदार की आय दूसरी कारपोरेट पार्टियों की आय के मुकाबले अब भी कम है. पार्टी का दावा है कि उसका फंड पूरा का पूरा सफेद है. लेकिन पार्टी की आय सौ करोड़ से ज्यादा हो गयी है और इसकी आधी रकम पार्टी सदस्यों और समर्थकों के चंदे से हासिल हुई है. अंबेडरकरवादियों का भी यही दावा है, जिनके यहां संसाधन जुटाना एकमात्र ऐजंडा है और फंडिंग अनिवार्य. माकपा ने आधिकारिक तौर पर अपनी आय को सार्वजनिक करते हुए दावा किया है कि उसके पास छुपाने के लिए कुछ नहीं है.political parties income

गौरतलब है कि हाल में एसोसियेशन आफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स ने आरोप लगाया था कि माकपा की ज्यादातर आय का स्रोत अज्ञात है. मीडिया में इस आरोप के व्यापक प्रकाशन प्रसारण के बाद माकपा ने अपनी छवि के मुताबिक यह खुलासा कर दिया है. देश के राजनीतिक दलों को आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13 (ए) के तहत कर छूट प्राप्त है. हालांकि उन्हें 20 हजार रुपए से अधिक आय या चंदा प्राप्त होने पर इसका लेखा (बुक ऑफ एकाउंट) रखना होता है.

आय व्यय का ब्यौरा दने की बाध्यता

मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ( माकपा) ने कहा है कि सभी राजनीतिक दल वैधानिक तौर पर अपनी आय और व्यय का ब्योरा उपलब्ध कराने को बाध्य हैं. इसके साथ ही उनको 20,000 रुपयों से अधिक चंदा देने वालों की सूची भी प्रकाशित करनी होती है. पार्टी नियमानुसार जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और आयकर अधिनियम के तहत अपनी आय का विवरण देती रही है. दाताओं के नाम,पते और पैन कार्ड नंबर भी इस ब्यौरे में शामिल है. माकपा निर्वाचन आयोग और आयकर विभाग के समक्ष नियमित रूप से इसकी जानकारी उपलब्ध कराती है.

बैंक खातों पर ब्याज आठ करोड़

अंतिम रपट तक माकपा की आय 103 करोड़ 43 लाख 65 हजार 122  रुपये हैं. माकपा के मुताबिक इस आय में बैक खातों से मिलने वाली ब्याज ही आठ करोड़ रुपए है.

दस लाख पार्टी सदस्य

पार्टी का दावा है कि माकपा की सदस्य संख्या इस समय 10 लाख से अधिक है. माकपा ने कहा कि पार्टी की आय का अधिकांश हिस्सा ऐसे दान से आता है कि जिसकी रकम 20,000 रुपये से कम होती है और कभी-कभी तो केवल 1,000 रुपये तक भी होती है. इसलिए पार्टी के 10 लाख से अधिक सदस्यों और लाखों अन्य दानदाताओं के नाम और पते प्रकाशित करने में पार्टी को कठिनाई है.

लेवी बाबत आय चालीस प्रतिशत

इसके अलावा पार्टी को अपनी गाड़ियां, पुराने अखबार और असबाब बेचने से भी आय होती रही है. पार्टी सद्स्यों से लेवी बाबत 41 करोड़ 63 लाख 37 हजार 149 रुपये मिले, जो पार्टी की कुल आय का चालीस प्रतिशत है. जाहिर है कि बाकी रकम पार्टी ने फुटकर चंदे से इकट्ठी की है.

माकपा की करमुक्त आय 85.61 करोड़

आयकर विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की 2008-09 की कर मुक्त आय शून्य रही जबकि शेष चार वर्ष की अवधि (2007-08, 2009-10, 2010-11 और 2011-12) में कुल कर मुक्त आय 85.61 करोड़ रुपए बताई गई.

भाकपा की आय

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की दो वर्ष की कर मुक्त आय की जानकारी मिली है. 2008-09 और 2009-10 में भाकपा की कर मुक्त आय 20.47 करोड़ रुपए दर्ज की गई.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की पांच वर्ष की कर मुक्त आय 141.34 करोड़ रुपए दर्ज की गई है. वहीं समाजवादी पार्टी की केवल 2008-09 की कर मुक्त आय के बारे में जानकारी मिली है जो 2.78 करोड़ रुपए थी.

मानहानि अभियान

इससे पहले माकपा ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर आरोप लगाया कि उन्होंने पार्टी की राज्य इकाई के बैंक खाते के आधार पर उसके खिलाफ ‘मानहानि अभियान’ चलाया है. माकपा पोलितब्यूरो ने एक बयान में कहा कि वरिष्ठ नेताओं बिमान बसु और निरूपम सेन के नाम पर खुला एसबीआई खाता ‘उनका निजी खाता नहीं हैं बल्कि माकपा की पश्चिम बंगाल राज्य समिति का खाता है.’ लेकिन उससे भी पहले नई दिल्ली स्थित गोपलन भवन के मुख्यालय से जो आधिकारिक खुलासा हुआ है, उसके मुताबिक माकपा को 2011-12 वित्तीय वर्ष के दौरान बीस हजार या उससे अधिक चंदा देने वालों की सूची में कम से कम दो दर्जन कारपोरेट नाम हैं. जिनमें रियल्टी,  दवा,  सीमेंट,  इंजीनियरंग संस्थाओं के साथ साथ मालाबार गोल्ड लिमिटेड कंपनी भी है, जिन्होंने भारत में क्रांति के लिए लाखों रुपये चंदे में दिये. ऐसा चंदा देने वालों में आभूषण कंपनी, बड़े आलीशान होटल, रियल स्टेटे कंपनी और निजी अस्पताल भी शामिल हैं. यह सूची आंध्रप्रदेश इकाई की ओर से लिये गये चंदे की है. बंगाल, केरल और त्रिपुरा की सूची अभी जारी नहीं हुई है. इन सूचियों की अब बेसब्री से प्रतीक्षा की जा रही है.

कारपोरेट चंदे का किस्सा

गौरतलब है कि माकपा नेता एवं तत्कालीन राज्यसभा सदस्य सीताराम येचुरी ने कभी मांग की थी कि केवल लोकपाल विधेयक लाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि कारपोरेट जगत से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर भी रोक लगाई जानी चाहिए. लेकिन बंगाल में पार्टी का बैंक खाता विमान बोस और निरुपम सेन के नाम होने और उसमें 16 करोड़ के खुलासे के बाद ममता बनर्जी के जबर्दस्त आक्रमण से बचाव के लिए पार्टी ने लेन देन का जो ब्यौरा सार्वजनिक किया है उससे यही साबित होता है कि कामरेडों की राजनीति भी कारपोरेट कृपा से चलती है. दूसरी बुर्जुआ पार्टियों की तरह भारत में क्रांति की झंडावरदार मेहनतकश जनता की संसदीय राजनीति कारपोरेट चंदे से ही चलती है. इस चंदे की आवक नियमित है, जिससे पार्टी अभी आर्थिक संकट में नहीं है.

माकपाई दावे के विपरीत

माकपा के दावे के विपरीत एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स और नेशनल इलेक्शन वाच ने 23 बड़ी पार्टियों के आय की रिपोर्ट जारी की! जिसके मुताबिक आश्चर्यजनक तौर पर, माकपा की कमाई 2004-2011 के बीच 417 करोड़ रुपये रही जिनमें ज्यादातर योगदान 20 हजार रुपये से कम का योगदान देने वाले व्यक्तियों का रहा. माकपा बसपा की 484 करोड़ रुपये की कमाई के थोड़ा ही पीछे रही जबकि अन्य बड़े वाम दल भाकपा ने केवल 6.7 करोड़ रुपये कमाए. इसके विपरीत देश के राजनीतिक दलों ने 2004 के बाद से चंदा और अन्य स्रेतों से 4,662 करोड़ रुपये की कमाई की है. दो एनजीओ ने दावा किया कि 2,008 करोड़ रुपये की कमाई के साथ सत्तारूढ़ कांग्रेस सूची में शीर्ष पर है जबकि मुख्य विपक्षी दल भाजपा 994 करोड़ रुपये की कमाई के साथ दूसरे पायदान पर है.

23 बड़ी पार्टियों की आय का हिसाब

आयकर रिटर्न और 2004-2011 के दौरान चुनाव आयोग को दानकर्ताओं की दी गई सूची के आधार पर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स और नेशनल इलेक्शन वाच ने 23 बड़ी पार्टियों के आय की रिपोर्ट जारी की. उन्होंने कहा कि 2004 के बाद राजनीतिक दलों की आय में लगातार बढ़ोतरी देखी गई. इन आंकड़ों में कहा गया कि कांग्रेस की आय 2,008 करोड़ रुपये है जो कि 2004 से 2011 के दौरान केंद्र की सत्ता संभालने के बीच मुख्यत: ‘कूपनों’ की बिक्री के माध्यम से आई. दानकर्ताओं से कमाई का अंश महज 14.42 फीसदी रहा. कांग्रेस के दानकर्ता अडानी इंटरप्राइजेज, जिंदल स्टील और वीडियोकोन एपलाएंसेंस भी रहे.

पांच साल में पार्टियों की आय 2,490 करोड़

गौरतलब है कि 2007-08 से 2011-12 के दौरान पांच वर्ष में देश के 10 प्रमुख राजनीतिक दलों की कर मुक्त आय करीब 2,490 करोड़ रुपए दर्ज की गई है. इस अवधि में कांग्रेस की कर मुक्त आय भाजपा से दोगुनी रही. 2007-08 से 2011-12 के दौरान कांग्रेस की कर मुक्त आय 1385.36 करोड़ रुपए रही जबकि भाजपा की कर मुक्त आय 682 करोड़ रुपए दर्ज की गई.

आयकर विभाग का हिसाब

सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत आय कर विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 2009-10 में अपूर्ण आयकर रिटर्न भरा और 2010-11 में बसपा की कर मुक्त आय शून्य रही. इस तरह तीन वर्ष (2007-08, 2008-09 और 2011-12) में पार्टी की कर मुक्त आय 147.18 करोड़ रुपए दर्ज की गई.

तीन सौ राजनीतिक दलों ने नही दिया हिसाब

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने 2011 के विश्लेषण के बाद चुनाव आयोग को बताया था कि 13 राज्यों में 300 राजनीतिक दलों ने आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया है. चुनाव आयोग ने हाल ही में कहा है कि 75 प्रतिशत पंजीकृत राजनीतिक दलों ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया. इन सभी विषयों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने राजनीतिक दलों के वित्तीय लेनदेन की जांच करने को कहा है.

आरटीआई के तहत मिली जानकारी

हिसार स्थित आरटीआई कार्यकर्ता रमेश वर्मा ने आयकर विभाग से प्रमुख राजनीतिक दलों के आयकर रिटर्न के आधार पर कर मुक्त आय के बारे में जानकारी मांगी थी. सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत आयकर विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, 2007-08, 2009-10, 2010-11 और 2011-12 में जनता दल (एकीकृत) की कुल कर मुक्त आय 15.51 करोड़ रुपए रही. जद यू की 2008-09 में कर मुक्त आय के बारे में जानकारी नहीं मिली.

वित्त वर्ष 2007-08 से 2010-11 के बीच चार वर्ष के दौरान लोक जन शक्ति पार्टी (लोजपा) की कर मुक्त आय 2.55 करोड़ रुपए दर्ज की गई जबकि, 2008-09 से 2010-11 के बीच तीन वर्ष के दौरान राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की कर मुक्त आय 2.85 करोड़ रुपए थी.

विभाग से जनता दल (एस) के 2009-10 और 2010-11 की कर मुक्त आय के बारे में जानकारी मिली. जद एस की इन दो वर्ष की कर मुक्त आय 7.16 करोड़ रुपए रही.

नेशनल इलेक्शन वाच की रिपोर्ट डाउनलोड करने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करे…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.