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पछतावे की आंच से कुंदन बन रहा है मुजफ्फरनगर…

By   /  September 23, 2013  /  No Comments

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जैसे जैसे वक्त गुजर रहा है और मुजफ्फरनगर दंगों की आग ठंडी हो रही है, वैसे वैसे स्थानीय निवासियों को भी अपनी अपनी गलती का एहसास हो रहा है कि वे बहकावे में आ गए थे. सबसे अधिक ख़ुशी की बात तो यह है कि इस तथ्य को वे लोग अब भरी पंचायतों में स्वीकार भी कर रहे हैं और पंचायतों के ज़रिये अल्पसंख्यकों से अपने किये की क्षमा भी मांग रहे हैं. चौधरियों की यही तो ख़ास बात है कि उनके मन में कोई पाप नहीं होता. दिल के सच्चे होते हैं. बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पासा ने मुजफ्फरनगर के कुछ गावों का दौरा कर अपनी ग्राउंड रिपोर्ट बीबीसी पर प्रसारित की और अपने अनुभव साझे किये जिन्हें हम जस का तस मीडिया दरबार के पाठकों के सम्मुख रख रहे हाँ ताकि वे भी जान सकें कि अब क्या सोचते हैं मुजफ्फरनगर के वासी…

मुज़फ़्फ़रनगर जिले के शाहपुर थाने का कुटबा गाँव ख़ौफ़ का पर्याय बन गया है. हमने जिससे भी कुटबा जाने की इच्छा ज़ाहिर की उसने मना कर दिया. आठ सितंबर को हुई हिंसा के दस दिन बीत जाने के बाद भी ‘कुटबा का डर’ बरक़रार था. बसीकलाँ, शाहपुर और जौला के राहत कैंपों में रह रहे शरणार्थियों की कहानियों ने कुटबा के ख़ौफ़ को और बढ़ा दिया.kutbi_village_panchayat
लेकिन हम कुटबा जाना चाहते थे. हम दुल्हेड़ा गाँव पहुँचे. कुटबा यहाँ से दो किलोमीटर दूर है. यहाँ के कुछ जाटों का साथ मिलने पर हमने कुटबा जाने का फ़ैसला किया. सुनसान सड़कें और खाली पड़े घरों ने सन्नाटे को और भी बढ़ा दिया था.
यहाँ आठ सितंबर को जो हुआ उसका असर अभी भी बरक़रार था. पूरे गाँव में कोई पुरुष दिखाई नहीं दिया. घरों के फाटक बंद थे. चंद खिड़कियों से झाँक रही महिलाएँ भी गुमसुम ही लग रहीं थी.
कुटबा के बारे में एक और बात कई बार दोहराई गई थी. कई लोगों ने कहा था कि यहाँ की महिलाएँ गाँव में घुसने नहीं देंगी. उन्होंने हमें रोका तो नहीं लेकिन पानी ज़रूर पिलाया. पानी के एक गिलास ने डर कम कर दिया.
थोड़ा और आगे बढ़ें तो सेना के जवान मार्च करते दिखे. जवानों को देखकर हमारा डर दूर हुआ और हम आगे कुटबा को पार कर कुटबी गाँव में पहुँचे. यहाँ पता चला कि बड़े-बड़े घरों के इस जाट बहुल गाँव में एक पंचायत भी हो रही है.
kutbi_village_panchayat1दरअसल मुज़फ़्फ़रनगर के कस्बे, शाहपुर से क़रीब छह किलोमीटर दूर कुटबा-कुटबी गाँव में बीते आठ सिंतबर को हुई हिंसा में आठ लोगों की मौत हुई थी. कई घरों और धार्मिक स्थलों को जला दिया गया था. मारे गए सभी लोग अल्पसंख्यक थे. जो बचे थे वो जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर पास के मुस्लिम बहुल गाँवों में पहुँचे थे. अब ये लोग राहत कैंपों में रह रहें हैं.
गुरुवार को कुटबी गाँव के कुछ अल्पसंख्यक अपना सामान लेने गाँव आए थे. घर छोड़कर गए इन लोगों को गाँव में देखकर जाट समुदाय के लोगों ने उन्हें रोकना चाहा. उन्हें मनाने के लिए चौपाल पर एक पंचायत रखी गई. जब हम पहुँचे तो यह पंचायत शुरु ही हुई थी.
दस दिन पहले जो लोग एक दूसरे के खून के प्यासे थे वे आज बैठकर पंचायत कर रहे थे. इनमें एक पक्ष वो था जो घर से बेघर हुआ था, जिसके आशियाने राख हुए थे, जिसकी आवाज़ में अपने को खोने का दर्द और चेहरे पर ख़ौफ था. और एक पक्ष वो था जिसे अपने किए का पछतावा था. जो चाहता था कि जो हुआ उसे भूलकर अब सब मिलकर रहे.kutbi_village_panchayat2
जाट समुदाय की ओर से चौधरी बलदार सिंह सबसे पहले बोलने के लिए खड़े हुए. उन्होंने घर छोड़कर गए मुसलमानों से गाँव में ही रुकने की अपील की.
बलदार सिंह ने कहा, “मैं पूरे कुटबी गाँव से सलाह करके आप भाइयों से ये प्रार्थना करता हूँ कि हम आपके साथ रहेंगे और आपकी पूरी हिफ़ाज़त करेंगे. पूरा गाँव आपकी हिफ़ाज़त करेगा और आगे कभी भी कुछ भी नहीं होगा. हम आपको गाँव से जाने नहीं देंगे. अगर आप जाएंगे तो हम भी तुम्हारे साथ ही जाएँगे.”
बलदार सिंह ने मुसलमानों से भावनात्मक अपील करते हुए कहा, “अगर तुम जिंदा उतरोगे इस गाँव में से तो हमारी लाशों पर से उतरोगे. हम लेट रहे हैं तुम हमारे ऊपर से ट्रक लेकर उतर जाओ. पूरा भाईचारा नू का नू ही रहेगा. हमे पता नहीं था कि ऐसा होगा. हम धोखे में थे. जो हो गया सो हो गया.”
चौधरी ने कह दिया कि ‘जो हो गया सो हो गया’. लेकिन जो हुआ क्या उसे भूलना आसान था? मुसलमानों की ओर से हाफ़िज़ यूनुस खड़े हुए और अपना पक्ष रखा.kutbi_village_panchayat4 उन्होंने कहा, “आप लोगों से गलती हुई या हमसे गलती हुई. मैं सभी मुसलमानों की ओर से माफ़ी चाहता हूँ. आपने कहा है कि हम एक दूसरे के हमदर्द रहकर जिंदगी गुजारेंगे. लेकिन अब हम गाँव छोड़ गए हैं और दूसरे लोगों की ज़िम्मेदारी में रहते हैं. गाँव में रहने का फ़ैसला करने में हमें उन लोगों की भी राय लेनी है.” उन्होंने आगे कहा, “अगर आप ये कहते हैं कि हम अपना सामान नहीं ले जा सकते, तो हम नहीं ले जाएंगे. क्योंकि यह गाँव की बात है और गाँव से बड़ा कुछ नहीं है. लेकिन हमारे बच्चे डरे हुए हैं. हम भी डरे हुए हैं. पहले हम रात में बेख़ौफ़ अपने गाँव में आते थे लेकिन अब आलम यह है कि हम दिन में भी गाँव आने के बारे में नहीं सोच सकते.”
कुटबी गाँव की पंचायत ने तय किया कि मुसलमानों के नुकसान की भरपाई गाँव ही करेगा. चौधरी बलदार सिंह ने घोषणा कर दी कि मुसलमानों का सामान उतारकर उनके घरों में वापस रख दिया जाए. लोगों ने सामान वापस उतारकर रख भी दिया.
डर और ‘अमन की चाह’
सामान तो उतारकर जले हुए घरों में वापस रख भी दिया गया. लेकिन जो भरोसा टूटा था क्या वो जुड़ पाया? शायद नहीं. यही वजह रही कि गाँव के आश्वासन के बाद भी न लोगों के दिल में पैदा हुआ डर कम हुआ और न ही वे गाँव में रुके. रुकते भी कैसे? चंद रोज़ पहले ही तो उन्होंने मौत को देखा था.kutbi_village_panchayat6
नफ़रत के बाद मोहब्बत और पछतावे के पैग़ाम की ये पंचायत नाकाम ज़रूर हुई थी लेकिन इसने लोगों को करीब आने का मौक़ा भी दिया है. बातचीत के रास्ते खोले हैं. जाटों की इस ज़मीन पर पंचायतें सबसे अहम किरदार निभाती हैं. हिंसा शुरू भी पंचायतों से हुई है. उम्मीद है ये पंचायतें ही अब दोबारा भरोसे को कायम कर हिंसा के दौर को ख़त्म करेंगी.
स्थानीय प्रशासन भी ऐसी पंचायतों को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहा है. मुज़फ़्फ़रनगर के जिलाधिकारी कौशल राज ने बताया कि प्रशासन पंचायतों के ज़रिए दोनों समुदायों को करीब लाने की कोशिशें कर रहा हैं.
लौटते वक़्त मेरे मन से कुटबा-कुटबी का ख़ौफ़ कम हो गया था. लेकिन इस गाँव को छोड़कर गए लोगों के दिलों में अभी भी ये ख़ौफ़ बरक़रार है. इसे दूर करने के लिए अभी समाज और सरकार को और कोशिशें करनी होंगी. उम्मीद है ये कोशिशें कामयाब होंगी और अपना घर-बार छोड़कर गए लोग वापस अपने गाँव आ सकेंगे.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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