/क्या विजय बहुगुणा उत्तराखंड के मधु कोड़ा बनेगें…

क्या विजय बहुगुणा उत्तराखंड के मधु कोड़ा बनेगें…

जिस तरह से उत्तराखंड आपदा राहत राशि के चेक लगातार बाउंस होते जा रहे हैं, उससे लगता है कि उत्तराखंड राहत कोष की राशि किसी बड़े ग़बन के ज़रिये हड़प ली गयी है और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा उत्तराखंडी मधु कोड़ा बन गए हैं.vijay bahuguna
एक आरटीआई के जवाब के अनुसार सोलह सितम्बर तक उत्तराखंड सरकार को मुख्य मंत्री राहत कोष में 356.16 करोड़ रूपया प्राप्त हो चुका है.
इसके अलावा केंद्रीय सरकार से उत्तराखंड सरकार को 395 करोड़ रूपये का अनुदान मिल चुका है. इसके बावजूद आपदा पीड़ितों को दी गयी राहत कोष की राशि के चेक बाउंस हो जाने से उत्तराखंड सरकार पर यह आरोप आयद होना लाजिमी है कि उत्तराखंड सरकार में बैठे सत्ताधीशों ने इस 751.16 करोड़ रुपये का ग़बन कर लिया है और यह राशि सरकारी खज़ाने से बहकर सत्तानशीनों के यहाँ पहुँच गयी है.

RTI
RTI का उत्तर

इसके चलते कुदरती कहर के बाद उत्तराखंड आपदा पीड़ितों पर सरकारी कहर टूट पड़ा है. उत्तराखंड में आपदा पीड़ितों को बांटे गए राहत के चेक बाउंस हो रहे हैं क्योंकि सरकारी खजाने में पैसे ही नहीं है. यहाँ सवाल यह उठता है कि आखिर 751.16 करोड़ रुपये कहाँ गए जो सरकारी खज़ाना खाली हो गया. जबकि 751.16 करोड़ रुपये की यह राशि आपदा पीड़ितों को राहत देने के लिए दी गई थी.
गौरतलब है कि उत्तराखंड बाढ़ त्रासदी में करीब 5 हजार लोगों ने जान गंवाई और हजारों लापता हुए. सबसे ज्यादा मार पड़ी स्थानीय पर्वत वासियों पर. इन्होंने जान भी गंवाई और घर भी. अब उनके नाम पर मिली राशि का गायब हो जाना और उत्तराखंड सरकार के मंत्रियों के यहाँ पार्टियों के दौर दौरे चलना संकेत देता है कि राहत राशि की बन्दर बाँट हो चुकी है और आपदा पीड़ित राहत के चेक लेकर बैंक के चक्कर काट रहे हैं तथा चेक बाउंस होने के बाद खाली हाथ लौट अपना माथा पीट रहे हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.