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जनलोकपाल की राह में अब भी रोड़े, मुगालते में न रहे टीम अन्ना -मणिशंकर अय्यर

By   /  August 29, 2011  /  3 Comments

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मणिशंकर अय्यर: मेरी बातों का मतलब समझो

अन्ना हजारे ने 13वें दिन अपना अनशन तोड़ दिया है लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की राह इतनी आसान नहीं है। लोकपाल को लेकर अन्ना हजारे के आंदोलन और संसद में हुई चर्चा के बाद गेंद एक बार फिर से संसदीय समिति के पाले में है। कानून, न्याय, कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय की यह संसदीय समिति ही इस बिल के मसौदे को अंतिम शक्ल देगी, जिसके बाद इसे संसद के पटल पर रखा जाएगा। इस मकसद की रोशनी में 25 सदस्यों की इस समिति का ढांचा भी बेहद अहम हो जाता है। संसद में अन्ना की मांगें मंजूर होने के कुछ घंटे बाद ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने इस पर गंभीर सवाल उठा दिए। उनका कहना है कि अन्ना टीम ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने, न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने और सांसदों का आचरण इसी परिधि में लाने का मसला शायद छोड़ ही दिया। अय्यर का कहना है कि संसद में जो भी प्रस्ताव पास हुआ उसमें अन्ना की जीत नहीं बल्कि संसद और कानून की रक्षा की गई है।

संसद की स्थाई समिति में कांग्रेस और बीजेपी समेत कुल 10 राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि हैं। साथ ही इसमें निर्दलीय भी शामिल हैं। कांग्रेस के सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की अगुवाई वाली यह कमेटी पहले ही साफ कर चुकी है कि इसमें लोकपाल के सभी ड्राफ्ट पर विचार किया जाएगा। इन ड्राफ्ट में सरकारी लोकपाल, जनलोकपाल, अरुणा राय का लोकपाल ड्राफ्ट, लोक सत्ता पार्टी के जयप्रकाश नारायण का ड्राफ्ट, बहुजन लोकपाल का ड्राफ्ट, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णामूर्ति का ड्राफ्ट जैसे मसौदे शामिल होंगे। यानी मायने एकदम साफ हैं कि कमेटी इन सभी ड्राफ्ट पर गौर करने के बाद ही अंतिम मसौदे पर मुहर लगाएगी। इस मसौदे में इन सभी ड्राफ्ट से जरूरी प्रावधान लिए जा सकते हैं।

इस संसदीय समिति के सदस्यों की राय जन लोकपाल के सवाल पर बिखरी हुई है। समिति के सदस्य लालू प्रसाद यादव ने शनिवार को संसद में कई बार कहा कि वे सभी एनजीओ को लोकपाल मे शामिल किए जाने के हक में हैं, जो जन लोकपाल बिल के खिलाफ हैं। समिति में शामिल बीएसपी सांसद विजय बहादुर सिंह ने  कहा कि वे जन लोकपाल को ज्यों का त्यों स्वीकार करने को मजबूर कतई नहीं हैं। समिति के ही सदस्य और बीजेपी सांसद हरिन पाठक और रामजेठमलानी जन लोकपाल विधेयक के साथ हैं।

समिति की सदस्य और कांग्रेस की सांसद मीनाक्षी नटराजन संसद में पहले ही कह चुकी हैं कि वे सभी प्रारूपों पर गौर करेंगी। राजस्थान से निर्दलीय सांसद किरोड़ी लाल मीणा भी जनलोकपाल के हक में नहीं हैं। समिति के सदस्य अमर सिंह का जन लोकपाल पर विरोध जग जाहिर है।

इस कमेटी का गणित भी खासा महत्वपूर्ण है। कुल 25 सदस्यों में से कांग्रेस के 8, बीजेपी के 6, एसपी, बीएसपी, आरजेडी, डीएमके, एआईएडीएमके, जेडीयू, लोकजनशक्ति पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के एक-एक सदस्य हैं। इसमें तीन निर्दलीय भी शामिल हैं। ऐसे में लोकपाल पर इस संसदीय समिति के रुख में खासतौर पर कांग्रेस और बीजेपी की भूमिका खासी महत्वपूर्ण होगी।

(पोस्ट बिस्मिल न्यूज में प्रकाशित खबर पर आधारित)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 Comments

  1. arunasaxena says:

    सुधर जाईये जनाब

  2. neha says:

    अब इस देश के वासियों को पता चल गया है की अपना हक कैसे लिया जाता है..
    अब न रुकेंगे और ना झुकेंगे. अगर धोका खाने की तो हिम्मत नहीं बची अब..

    अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं. सिर कटा सकते हैं लेकिन सिर झुका सकते नहीं .

    ये हमने अपने बड़ो से ही सीखा है जिन्होंने हमको एक स्वतन्त्र देश मैं जीने का हक दिया. तो अब दुबारा गुलाम तो हम होंगे नहीं किसी भी कीमत पे.

  3. हौसला अब आँधियों का बढ़ गया है
    भाव भ्रष्टाचार का देखो कितना चढ़ गया है
    कुर्सियों को आज शासन का नशा है
    लगता है हर शहर में जंगल बसा है
    व्यवस्था खुद कहती अपनी कहानी
    घी-खिचड़ी हो गए आग- पानी;(पक्ष-विपक्ष)
    फिर भी यकीं है,चाहे अंधकार कितना घनेरा हो
    हर अँधेरी रात की परिणति सवेरा है…..

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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