/पुलिस के पतित भ्रष्ट और जनविरोधी चेहरे को उजागर करता वर्दी वाला चांद…

पुलिस के पतित भ्रष्ट और जनविरोधी चेहरे को उजागर करता वर्दी वाला चांद…

-अयोध्या प्रसाद भारती||
रुद्रपुर (उत्तराखंड). हिंदी व्यंग्य विधा के आधार स्तंभ हरिशंकर परसाई के प्रसिद्ध व्यंग्य लेख ‘इंस्पैक्टर मातादीन चांद’ पर का नाट्य रूपांतरण ‘वर्दी वाला चांद ‘ शीर्षक से शैलनट संस्था ने किच्छा रोड स्थित होटल ले कैसल में 23 सितंबर को प्रस्तुत किया. नाटक में भारतीय पुलिस की कार्यप्रणाली दिखाई गई है.Chand Police

सातवें दशक में परसाई ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर तंज कसते हुए इंस्पैक्टर मातादीन चांद पर व्यंग्य लिखा था. जिसमें दिखाया गया कि अपनी पुलिस को कुशल बनाने के लिए चांद सरकार भारत सरकार से अनुरोध करती है कि वह कोई काबिल पुलिस अफसर चांद पर भेजे. भारत से चांद पुलिस को प्रशिक्षित करने के लिए इंस्पैक्टर मातादीन को भेजा जाता है. मातादीन चांद पुलिस से अभद्रता से पेश आते हैं और वही सब तौर-तरीके समझाते हैं जो भारतीय पुलिस के हैं. दो लोगों के झगड़े में एक दूसरे को लाठी मार कर भाग जाता है.

घटनास्थल के पास के घर का आदमी घायल को अस्पताल ले जाता है लेकिन घायल की मौत हो चुकी होती है. सकते में आई चांद पुलिस चक्कर में पड़ जाती है कि हत्यारे का पता कैसे लगे, कोई सुबूत नहीं कोई गवाह नहीं. ऐसे में मातादीन भारतीय पुलिस का कौशल का नमूना पेश करते हुए उस आदमी को पकड़वा लेते हैं जो मरने वाले को अस्पताल ले गया था. उसे हत्यारा साबित करने के लिए कुछ चोर-उचक्के पकड़कर धमका कर गवाह बना लिए जाते हैं जो अदालत में कहें कि उन्होंने उस आदमी को लाठी मारते हुए देखा था. इस घटनाक्रम के बाद जनता चांद सरकार के खिलाफ बगावत कर देती है और प्रदर्शन करते हुए सरकार से इस्तीफा देने की मांग करती है. मातादीन के प्रशिक्षण के बाद भ्रष्ट और अराजक हो चली अपनी पुलिस का रवैया सरकार को भी नागवार गुजरता है और वह भारत सरकार से अपने इंस्पैक्टर को वापस बुला लेने की अपील करती है.
भारतीय पुलिस के पतित भ्रष्ट और जनविरोधी चेहरे को उजागर करते इस नाटक के अंत में प्रसिद्ध जनकवि बल्लीसिंह चीमा का पुलिस सिपाहियों पर केंद्रित गीत पेट के लिए बना तू भाड़े का सिपाही है आम आदमी की लड़ाई तेरी ही लड़ाई है सामूहिक रूप से गाया गया. साहित्यिक सांस्कृतिक और कला आदि विषयों की गतिविधियों से लगभग अछूते लेकिन बाजारवाद के मॉडल बने रुद्रपुर में नाट्य संस्था शैलनट ने लगभग तीन साल पहले अपनी गतिविधियों शुरु कीं. वह अब तक यहां चार नाटक पेश कर चुकी है जिसमें कलाकार स्थानीय लोगों बच्चों को लंबे समय तक प्रशिक्षण देकर तैयार किया गया. इसके अलावा शैलनट अन्य सांस्कृतिक साहित्यिक कला जन मुद्दों इत्यादि पर भी काम कर रही है. वह अन्ना हजारे की सभा में भी सामयिक विषयों पर तमाशा पेश कर चुकी है.

वर्दी वाला चांद नाटक का निर्देशन हर्षवर्धन वर्मा ने कार्यक्रम का संचालन रूपेश कुमार सिंह ने किया. नाटक के दूसरे दिन अंत में उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा पर केंद्रित एक नज्म नबी अहमद मंसूरी ने पेश की. इस मौके पर हेम पंत, डॉ. डीएन भट्ट, बीसी सिंघल, दिवाकर पांडे, एपी भारती, अमर सिंह, संदीप, कस्तूरी लाल तागरा, जुगल पंत, कार्तिक दूबे, विनय बंसल, प्रदीप, डॉ एसएन गुप्ता, ज्योति गांधी, सरस्वती पाल, ललित मोहन जोशी, आरसी जोशी, सुबोध पांडेय, सुनील पंत, बीएल शाह, प्रेरणा गर्ग, अंकुर जायसवाल और खेमकरण सोमन आदि मौजूद थे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.