/राहुल के बयान से फेसबुक गरमाया…

राहुल के बयान से फेसबुक गरमाया…

 दागी सासंदों और विधायकों पर सरकार द्वारा लाये गए अध्यादेश को राहुल गाँधी द्वारा बकवास और फाड़ दिए जाने के काबिल बताये जाने के बाद सोशल मीडिया पर राहुल और कांग्रेस को लेकर चर्चायें शुरू हो गयी हैं फेसबुक पर पत्रकारों से लेकर पेशेवर लोगों ने राहुल के बयान को अपने अपने नज़रिए से देखा है. पेश हैइस सिलसिले में फेसबुक पर हुई कुछ पोस्ट्स..

वरिष्ठ साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता मोहन श्रोत्रिय कहते है कि

राहुल किसके तुरुप के पत्ते निकले?rahul-maken

अपनी पार्टी और सरकार की भट्टी बुझाने का काम बेशक कर दिया हो उन्होंने, इसका कोई खास लाभ तो मिलता दिखता नहीं, कांग्रेस को ! ऐसा हो सकता है क्या कि जब अध्यादेश राष्ट्रपति के पास भेजा गया, तब तक उन्हें पता ही न हो कि कहां-क्या चल रहा है !

मंत्रियों-संतरियों-प्रवक्ताओं सब के चेहरे पीले पड़ ही गए होंगे !?!

जैसा यह लग रहा है. कहीं उससे बड़ा तो नहीं है यह खेल? मनमोहना बोलेंगे कुछ, मक्का (अमरीका) से लौटकर?

पता नहीं !

वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द कुमार सिंह अरविन्द कुमार ने भी फेसबुक पर अपने विचार कुछ इस तरह रखे हैं..

राहुल का विरोध स्वागत योग्य

दागी नेताओं के मसले को लेकर राहुल गांधी ने निजी रूप में ही जो प्रतिक्रिया दी है, उससे भूचाल आना स्वाभाविक है…सार्वजनिक जीवन में नेता का बयान हो या कुछ और वह निजी नहीं होता…राहुल ने साहस के साथ इसका विरोध किया है..इसका स्वागत होना चाहिए…इसका उनको राजनीतिक लाभ मिलता है या हानि होती है, .यह समय बताएगा लेकिन मनमोहन सिंह सरकार इसे लेकर कठघरे में जरूर खड़ा हो गयी है…इसी बयान से यह संकेत भी मिल रहा है कि राहुल अब परिपक्व राजनेता बनने की ओर हैं..यह माना जा सकता है कि अगर वो अपनी चौकड़ी से बाहर आकर बोलेंगे तो ऐसा ही बोलेंगे और कुछ कड़े फैसले ले सकते हैं…लेकिन फिर कोटरी का क्या होगा….क्योंकि जब वो इसका विरोध कर रहे थे तो सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी और वी.नारायण सामी इसका समर्थन कर रहे थे…मैं उस मौके पर मौजूद था…नारायण सामी मिठाई खा रहे थे जब उनको किसी ने राहुल गांधी के बयान की जानकारी दी तो लगा जैसे करेला खा लिया है..

बहरहाल लिखते लिखते खबर मिली है कि दिग्गज राजनेता और लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी राहुल गांधी के इस बयान का स्वागत किया है…मैं जानता हूं कि दागी राजनेता के रूप में चिन्हित किए जा रहे तमाम लोग अपराधी नहीं हैं औऱ राजनीतिक दुश्मनी के तहत उन पर मामले दर्ज होते हैं…लेकिन जो अपराधी हैं वे अज्ञात नहीं है…दोनों के बीच फर्क को सुनिश्चित करने का रास्ता भी निकालना चाहिए…

वहीँ, वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा लिखते हैं कि अध्यादेश की कापी फाड़ने का ये ड्रामा बंद करो . सब कुछ तुम्हारे हाथ में है . रद्द करवाओ उसे , अगर इतना ही बुरा लग रहा है तो . पब्लिक को अपनी तरह भोंदू न समझो . वह सब जानती है.

तो आईआईटीयन वीएस रावत ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि राहुल गाँधी ने कैबिनेट द्वारा स्वीकृत किए गए “अपराधियों के चुनाव लड़ने के क़ानून के संशोधन” को “पूरी तरह बकवास” बताया, और कहा इस ऑर्डनेन्स को फाड़ कर फेंक देना चाहिए।”

यह कथन कांग्रेस की समग्र नीतियों से इतना अधिक अलग है कि यह किसी भाषण लिखने वाले का लिखा, राजमाता स्वीकृत कथन नहीं लग रहा है मुझे।

यह राहुल गाँधी का अपना कथन है।

बहुत अच्छी शुरुआत है, राहुल।

तुम साबित कर रहे हो कि तुम मंदबुद्धि चाहे हो, लेकिन तुम मंद-नैतिकता वाले नहीं हो।

सैल्यूट्स।

अब कांग्रेस जवाब दे।

इसी तरह वृन्दावन में गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करने में लगे पूर्णेंदु ने पोस्ट किया है कि मैं राहुल गाँधी के बयान का स्वागत करता हूँ. इसका मतलब ये कदापि नहीं है की मैं कांग्रेसी हो गया मैं ना किसी पार्टी में था ना हूँ हां अगर कोई पार्टी कोई अच्छी बात करती है तो उसकी बात का समर्थन जरूर करता हूँ अगर कोई पार्टी धार्मिक गुरुओ की दुकान बन्द करने की बात करेगा जिस तरह से निर्मल बाबा या कुमार स्वामी या आसाराम जैसे लोग इलेक्ट्रानिक मीडिया या प्रिंट मीडिया के माध्यम से लोगो को मूर्ख बनाते है तो में उसका पूरा समर्थन करूँगा.

दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक आशुतोष कुमार ने अपनी फेसुक वाल पर लिखा है कि

”भारत माता के (कागजी ) शेर ” का मुकाबला करने के लिए राहुल बाबा के सलाहकारों ने ‘एंग्री यंग मैन’ वाला पुराना चोला निकाला है , जो पिछले यूपी चुनाव में ही तार- तार हो गया था. दाढी फिर उग आई है . आस्तीनें चढाने की अदा लौट आई है . ‘फाड़ दो , फेंक दो ‘ वाला वही पुराना पिटा हुआ डायलॉग भी हाजिर हो गया है . जैसे अचानक सोये से जाग कर कोई पुकारे – ये किसने …..हमारी नींद में ख़लल डाली . इस नवजागरण के लिए भी पीएम् के विदेश जाने का इंतज़ार था? प्रेस कान्फरेन्स के अलावा गुस्सा जताने का और कोई तरीका नहीं था ?
एंग्री रौंग मैन जी , आपने अपने ही पीएम् और पार्टी की इज्ज़त फाड़ कर हवा में फेंक दी ? पता नहीं मनमोहन सिंह में कितना आत्मसम्मान बचा है . कायदे से तो आते ही हाईकमान के मुंह पर दे मारना चाहिए इस्तीफा .
जैसे पार्टी -आधारित लोकतंत्र को बिगबौस के घर में बदल देने का कम्पटीशन चल रहा हो मोदी और राहुल में .
इतना छोटा देश नहीं है कि कुँए और खाई के बीच चुनने की मजबूरी हो . देश अपना रास्ता निकाल लेगा , आप दोनों अपने रस्ते जाओ जी .

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.