/क्या एक बार फिर लोकतंत्र का बलात्कार किया जाएगा…

क्या एक बार फिर लोकतंत्र का बलात्कार किया जाएगा…

-असीम त्रिवेदी||

दागी नेताओं के खिलाफ ऐतिहासिक निर्णय और फिर राईट टू रिजेक्ट के बाद तो लगने लगा है की लोकतंत्र का असली मंदिर संसद भवन नहीं बल्कि हमारा सुप्रीम कोर्ट है. सुप्रीम कोर्ट ने वो सभी काम संभाल लिए हैं जिसकी जिम्मेदारी सही अर्थों मे हमारी संसद की थी.right to reject

देखकर आश्चर्य होता है कि सुप्रीम कोर्ट जनता की लड़ाई लड़ रहा है और जनता घर मे बैठकर टी वी पर खबरें देख रही है. दागियों के पक्ष मे सरकार के अध्यादेश के बाद कहीं भी कोई प्रोटेस्ट देखने मे नहीं आया. क्या प्रतिरोध की सारी धाराएं थम चुकी हैं. क्या पिछले कुछ सालों मे जागी जनचेतना फिर से सुषुप्त हो चुकी है. मेरा मन ये जानने के लिए बेचैन है कि क्या एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा जाएगा और लोकतंत्र का बलात्कार किया जाएगा या फिर हम वाकई मे एक नयी सुबह देखेंगे. एक ऐसी संसद देखेंगे जहां ईमानदार लोग बैठे दिखाई पड़ेंगे, जिनका मकसद अपनी तरक्की नहीं अपने देश की तरक्की होगा. जो हमें हमारे सपनों के भारत को हकीकत मे देखने का मौक़ा देने के लिए सच्ची कोशिशें करेंगे. लेकिन इतना तो स्पष्ट है की अगर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का ये ऐतिहासिक फैसला नहीं पलटा तो आश्चर्यजनक परिणाम होंगे.

आने वाले चुनाव एक आंदोलन की शक्ल ले सकते हैं. जब लोग वोट सिर्फ इसलिए न दें कि ये महज़ एक जिम्मेदारी है बल्कि इस लिए दें कि वो ये महसूस करें कि देश को बचाने का, उम्मीदों को बचाने का सिर्फ एक ही तरीका बचा है और वो है मतदान. हर पार्टी पर दबाव होगा कि अगर वो दागियों को उम्मीदवार बनाकर सामने लाये तो जनता उन्हें रिजेक्ट कर सकती है. ये दबाव टिकट वितरण के ढंग मे आमूल चूल परिवर्तन कर सकता है. और अगर ऐसा न भी हो और देश के बस कुछ हिस्सों मे भी लोग अपने उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने मे सफल हो जाएँ, तो ये भ्रस्टाचार और अपराध मे घुटने तक धंसे राजनीतिक दलों और उनके भ्रष्ट नेताओं को जनता का करारा जवाब होगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.