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अब दाउद इब्राहीम ला रहा है न्यूज़ चैनल…

By   /  September 29, 2013  /  2 Comments

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मीडिया चाहे भारत का हो या पाकिस्तान का, अधिकांश मीडिया संस्थानों के मालिकान या तो उद्योगपति हैं या राजनेता या फिर कुछ चिटफंड कम्पनियाँ और कुछ माफिया सरगना. मगर अब भारत का भगौड़ा अपराधी और एशिया का सबसे बड़ा माफिया सरगना दाउद इब्राहीम भी न्यूज़ चैनल की शुरुआत करने जा रहा है. दाउद इब्राहीम द्वारा पाकिस्तान में शुरू किये जा रहे बोल (BOL) नामक न्यूज़ चैनल के पीछे पाकिस्तान सेना की विवादास्पद एजेंसी आईएसआई के बोल होने की खबर सामने आ रही है.dawood_ibrahim

अंग्रेजी के प्रसिद्ध अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार दाउद के इस चैनल में आईएसआई ने भी अच्छी खासी राशि का निवेश किया है. यही नहीं, बोल चैनल की मुख्य प्रायोजक है पाकिस्तान की एक बदनाम कंपनी एक्जैक्ट, जिसे अवैध शैक्षिक डिग्रियां बेचने में महारथ हासिल है, इसके अलावा इसे पोर्न साइट्स होस्ट करने वाली कंपनी बतौर भी पहचान मिली हुई है.

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दाउद इब्राहीम और आईएसआई के इस साझा उपक्रम के लिए पाकिस्तान के मीडिया दिग्गजों को अकल्पनीय वेतन, आलीशान मकान, लग्ज़री कार और आकर्षक सुविधाओं का लालच देकर लाया जा रहा है. यहाँ तक की हाई प्रोफाइल एंकरों और टीवी शो होस्ट करने वालों को अंगरक्षक भी दिए जाने कि बात सामने आई है.

जियो चैनल के मुखिया को तो बोल चैनल एक करोड़ पाकिस्तानी रूपये (साठ लाख भारतीय रुपये) मासिक पर तोड़ कर ले भी आया है. जानकारी के अनुसार भारत या पाकिस्तान में इसे अब तक का सबसे बड़ा पैकेज माना जा रहा है. इसे देख पाकिस्तान के मीडिया संस्थान सांसत में फंस गए हैं. उनके समक्ष सबसे बड़ी समस्या है, अपने हाई प्रोफाइल एंकरों और टीवी शो होस्ट करने वालों को रोक कर रखने की. पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर मीडिया संस्थानों को अपने स्टाफ़ के वेतन और सुविधाओं में भारी बढ़ोतरी करनी पड़ी है.

दाउद इब्राहीम ने आर्थिक मसलों को सँभालने का भार छोटा शकील के कन्धों पर डाला है. पत्रकारों और अन्य स्टाफ़ की नियुक्ति का काम भी छोटा शकील ही देख रहा है. इसके लिए छोटा शकील कई पत्रकारों से निजी तौर पर मिल भी चुका है और मिलने मिलाने का यह सिलसिला तूफानी रफ़्तार से अंजाम दिया जा रहा है, क्योंकि दाउद इब्राहीम चाहता है कि बोल चैनल इसी साल के अंत तक ऑन एयर हो जाये.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    अब सब जगह इनका बोलबाला है तो यह शेत्र भी पीछे क्यों रहा,देखने का समय तो तब आएगा जब इसका प्रसारण शुरू होकर अन्य स्थापित व राजनेताओं से सौदेबाजी करेगा? जहाँ लोकतंत्र का चौथा पाया मजबूत है, वहां तो वे इसे उखाड़ फेंकेंगे , पाक जैसे देश में ही यह दुकान जम पाएगी या फिर मुस्लिम देशों में,पश्चिम देशों में कोई आधार नहीं जहाँ बड़े बड़े मीडिया हाउस टक्कर के लिए बैठे हैं, वैसे भी बुद्धिजीवी वर्ग व विखंड कारी दिमाग की संरचना अपने अपने रास्ते पर चने वाली धाराएँ है.

  2. अब सब जगह इनका बोलबाला है तो यह शेत्र भी पीछे क्यों रहा,देखने का समय तो तब आएगा जब इसका प्रसारण शुरू होकर अन्य स्थापित व राजनेताओं से सौदेबाजी करेगा? जहाँ लोकतंत्र का चौथा पाया मजबूत है, वहां तो वे इसे उखाड़ फेंकेंगे , पाक जैसे देश में ही यह दुकान जम पाएगी या फिर मुस्लिम देशों में,पश्चिम देशों में कोई आधार नहीं जहाँ बड़े बड़े मीडिया हाउस टक्कर के लिए बैठे हैं, वैसे भी बुद्धिजीवी वर्ग व विखंड कारी दिमाग की संरचना अपने अपने रास्ते पर चने वाली धाराएँ है.

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