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आरक्षण खत्म करने का सीधा फंडा…

By   /  October 10, 2013  /  1 Comment

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-नरेन्द्र तोमर||

नेशनल सेंपल सर्वे कार्यालय द्वारा हाल ही में जारी किए गए नवीनतम आंकडों के अनुसार पिछले नौ सालों में जो चीज सबसे मंहगी हुई है वो है स्कूली शिक्षा; इस दौरान बच्चों की फीस में 432 फीसदी तक की बढोतरी हुई है.school education

दूसरी और प्रति व्यक्ति में बढोतरी 184 प्रतिशत आंकी गई है जो निश्चित रूप से छलावा ही है क्योकि यह एक राष्टी्य औसत है जिसमें 10 करोड साल पाने वाले कंपनी सीईओ का वेतन भी है शामिल और 30 -35 रू रोज पर गुजर बसर करने वाला भी आता है.

इस रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्‍थ्‍य की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आने के चलते लोगों को निजी स्कूलों और प्राइवेट डाक्टरों की ओर रूख करना पड रहा है.

शिक्षा मंहगी होते जाने का सीधा अर्थ है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षित सीटों पर आने की योग्यता भी वे ही हासिल कर सकते हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है.

सोचना पडता है कि क्या इसीलिए यह मांग फिर उठ रही है कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए, जिसका सीधा मतलब है कि एक ओर तो अच्छी आथिक स्थिति वाले दलितों व आदिवासियों को आरक्षण दिया नहीं जाए और दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में शिक्षा के खराब स्‍तर के चलते आम गरीब दलित/आदिवासी आरक्षण के लिए भी आवश्यक योग्यता हासिल नहीं कर सकेगें.

ऐसे में पद के लिए योग्य उम्मीदवारों के मिलने के कारण कुछ समय तक खाली रहने के बाद वे सीटे सामांय श्रेणी के ‘योग्य उम्मींदवारों’ से भर दी जांएंगी.

जबकि निजी स्कूलों की मंहगी शिक्षा और प्राइवेट टयूशन वैसे भी आम दलित व आदिवासियों की हैसियत के बाहर की चीज होती जा रही हैं.

इसका सीधा अर्थ हैं कि पांच दस सालों के बाद आरक्षण की व्‍यवस्‍था अपने आप मर जाएगी .

यह है चालाकी भरा सीधा फंडा ‘उनको उनकी औकात पर’ रखने का, जैसा कि अक्सर कहा जाता है.

सरकारी नौकरियों और तरक्‍की में आरक्षण मात्र के लिए आंदोलन चलाने वाले दलित नौजवानों का ध्‍यान क्‍या इस ओर भी जा रहा है ?

(नरेन्द्र तोमर की फेसबुक वाल से)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. bhuat apsos kia bat hia kia griab aj bhia griab hia kalbhiatha srakar apna pat bharti hia griab koa koan dakhata hia

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