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माल-ए-मुफ्त और मुफ्तखोर पत्रकार…

By   /  October 15, 2013  /  No Comments

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-डॉ. महर उद्दीन खां||

नेता और अफसर कुछ पत्रकारों को मुफ्तखोरी की ऐसी आदत डाल देते हैं कि वह अपने मित्रों को भी आसामी समझने लगते हैं. कई बार तो ऐसे भी दृश्य देखने को मिले कि बड़ी शर्म महसूस होती थी.मुम्बई की हवाई यात्रा में नाश्ता दिया गया. नाश्ते के बाद मेरे साथ बैठे पत्रकार ने प्लास्टिक की छुरी कांटे और चम्मच रूमाल से साफ कर अपनी जेब में रख लिए. मैं देख रहा था तो खिसियाने से हो कर बोले इनसे बच्चे खेलेंगे.freeloader1
ऐसे ही बनारस की यात्रा में विमान परिचारिका ट्रे में टाफियां ले कर आई. सब एक या दो टाफी उठा रहे थे. पास बैठे पत्रकार ने मुट्ठी भर टाफियां उठा लीं.परिचारिका एक क्षण ठिठकी और मुस्करा कर आगे बढ गई. साथी पत्रकार ने बड़े गर्व से कहा- जब बच्चों को बताया जाएगा कि ये हवाई जहाज की टाफियां हैं तो कितने खुश होंगे और अपने मित्रों को बताएंगे तो उन पर कितना रौब पड़ेगा.मैं शांत भाव से सुनता रहा.ऐसे ही इंदौर के एक होटल में एक एक कमरे में दो दो पत्रकार ठहराए गए थे.कमरे में इमरजेंसी के लिए एक हीटर जग, दूध ,चीनी के पाउच और चाय की डिप का प्रबंध था.दो दिन के प्रवास में कई बार इस सुविधा का उपयोग भी किया.चलते समय साथी ने चाय , चीनी और दूध के बचे हुए पाउच अपने बैग के हवाले कर लिए.मैंने मजाक में कहा यार ये जग भी रख लो काम आएगा.वह थोड़े शर्मिंदा तो हुए मगर बोले कुछ नहीं.

कई पत्रकारों का इगो बहुत नाजुक होता है जो जरा जरा सी बात पर हर्ट हो जाता है.ऐसा एक दिलचस्प मामला देखने को मिला आप भी आनंद लें. जी. एम. बनातवाला के मुस्लिम लीग का अघ्यक्ष बनने पर केरल का उनका एक सप्ताह का दौरा था. इसे कवर करने के लिए पत्रकारों की एक टीम सांसद इ. अहमद के साथ केरल जा रही थी. मुम्बई से कोझिकोड़ की उड़ान पकड़नी थी. मुम्बई की उड़ान लेट हो गई. खाना अगली उड़ान में मिलना था जो जा चुकी थी. भूख के मारे सब का बुरा हाल था. सांसद इ. अहमद कहीं से एक प्लेट में बटर सैंडविच का प्रबंध कर के लाए और सबको देने लगे. यह देख कर एक पत्रकार बिदक गए और कहने लगे कि यह हमारी तौहीन है जो इस तरह खड़े हो कर खाएं. उन्होंने सबसे कहा कि यह हमारे इगो का सवाल है, कोई नहीं खाएगा. मगर किसी ने उनकी बात नहीं मानी तो वह भन्ना कर बोले- आप हमें अपमानित करने के लिए लाए हैं. इ. अहमद शांत भाव से यह तमाशा देखते रहे.

खैर अगली फ्लाइट के लिए उन्होंने भाग दौड़ कर प्रबंध किया और सब कोझिकोड़ पहुंच गए. यहां पत्रकारों की देखभाल के लिए चंद्रिका के अहमद कुट्टी थे. सब को होटल में ले जाया गया और बताया कि नाश्ते के बाद एक सभा में चलना है. सबने भर पेट नाश्ता किया मगर इगो महाशय भन्नाते रहे. कुट्टी उनकी खुशामद कर रहे थे. मगर वह हठ किए थे कि उन्हें वापस भेज दिया जाए. मैं कुट्टी को एक ओर ले गया और कहा कि आप अधिक खुशामद न करें, ये वापस नही जाएंगे और जब भूख लगेगी तो खाना इन्हें खुद मना लेगा. यही हुआ भी. दस बजे के बाद जब लौटे तो सबसे पहले इन इगो महाशय ने ही खाने का आर्डर दिया. इस यात्रा में सबने इनका नाम ही इगो रख दिया था. ये महाशय रोजाना सवेरे 555 सिगरेट के दो पैकेट बैरे से मंगा लेते और उनमें से एक ही पी पाते. चलते समय इन्होंने तीन पैकेट मंगाए और बैग में रख लिए.

dmkअब सुनिए मुफ्त खोरी की एक और कहानी. दादरी की थोक सब्जी मंडी गांव के सामने है सवेरे के समय कुछ रिटेलर भी वहां बैठते हैं तो आस पास के लोग सब्जी लेने आ जाते हैं. मेरे घर से सब्जी मंडी पांच मिनट से कम के वाक पर है. सवेरे घूमने के साथ कभी कभी सब्जी मंडी से ताजा सब्जी भी ले आता था. उस दिन सड़क पार ही की थी कि एक मारूति वैन पास आ कर रुकी. तीन परिचित पत्रकार थे. अलीगढ़ के किसी कार्यक्रम से लौट रहे थे. दुआ सलाम के बाद मैंने सामने ही घर चलने का आग्रह किया आरै कहा कि चलिए सब्जी बाद में ले ली जाएगी. अरे नहीं, चलिए हम भी सब्जी मंडी देख लेते हैं.

उनके साथ अंदर गया. सब्जी खरीदी तो वह भी कहने लगे यार ताजा सब्जी है दिल्ली में यह कहां मिलती है सो उनके लिए भी एक एक किलो भिंडी, करेला और टमाटर तुलवा दिए. सब्जी वाला जानकार था. बोला डाक्टर साहब पैसे की चिंता न करें, आ जाएंगे. लौटते में गांव का ही एक आढती मिल गया. बोला चाचा आपके लिए एक पेटी आम रखा है बहुत मीठा और खुशबूदार है. उसने पेटी अपने लड़के को उठवा दी. वह पेटी बाहर रख कर चला गया. इस बीच एक ने आम उठा कर पहले सूंघा और फिर चूस कर बोला यार आम तो वाकई कमाल का है. ऐसा करते हैं, आप तो यहां रहते ही हैं, हम यह पेटी रख लेते हैं.इतना कह कर उन्होंने पेटी वैन में रखी और बिना हाथ मिलाए ही एक दम से फुर्र हो गए और आगे जा कर हाथ हिला कर विदा होने का नाटक करते चले गए. मैं सोचता ही रह गया कि इन्हें घर ले जाता तो सस्ते में ही छूट जाता.

(लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है: सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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