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युनाइडेट नेशन्स में डेंगू…

By   /  October 17, 2013  /  No Comments

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-आलोक पुराणिक||

डेंगू विषय पर आयोजित सालाना निबंध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त निबंध इस प्रकार है-

डेंगू भारतीय संदर्भों में सिर्फ मर्ज नहीं है, जैसे मलेरिया सिर्फ मर्ज नहीं है, बहुतों के रोजगार के साधन है. मलेरिया इंस्पेक्टर, मलेरिया आफीसर समेत मलेरिया डिपार्टमेंट के कई लोगों को मलेरिया ने रोजगार दिया है.Dengue-Fever

कल मलेरिया का मच्छर डेंगू के मच्छर-एडिस को ताना देता हुआ पाया गया-अबे तूने क्या खाक काम किया है, डेंगू इंस्पेक्टरों और डेंगू अफसरों की नियुक्ति भी शुरु ना हुई है अभी, हमें देख कितने सालों से मलेरिया जमाये हुए हैं.

डेंगू अफसर-इंसपेक्टर होने लगें, तो यह कहा जा सकेगा डेंगू का रोजगार-सृजन में महती योगदान है. डेंगू का भारतीय सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में गहन योगदान है.

डेंगू-मलेरिया से हमारे हुक्मरान औकात में रहते हैं, जब-जब वह इंडिया को सुपर-पावर घोषित करते हैं, तब-तब डेंगू-मलेरिया मच्छर भुनभुनाकर बता देते हैं -अबे मच्छरों तक से निपट ना पाते, काहे के सुपर, काहे की पावर.

तरह-तरह की भारतीय मिसाइलों के दायरे में पाकिस्तान का कराची शहर है, चीन का शंघाई शहर है, यानी डेंगू-मच्छर एडिस अगर कराची और शंघाई में हैं, तो वो भारतीय संहारक क्षमताओं के दायरे में आते हैं, पर ऐन सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में डेंगू-मच्छर सेफ हैं.

नालियां साफ रख पाना मिसाइलों के बूते की बाहर की बात है, सो मच्छरों से युद्ध के मामले में हमारा सुपर-पावरत्व हवा हो लेता है.

गहरी चिंता की बात यह है कि डेंगू के खिलाफ युद्ध घोषित ना कर दिया जाये, सिंपल नालियों को साफ रखने की, वक्त पर कुछ इंतजाम करने की बात है, पर युद्ध घोषित होने पर अलग तरह की परिस्थितियां हो जायेंगी. युद्ध में यूज होनेवाले आइटमों की खरीद पर कट-कमीशन खाना हुक्मरानों का लगभग संवैधानिक कर्तव्य है. डेंगू-युद्ध में विकट घोटाले सामने आयेंगे. हुक्मरानों के निकम्मेपन पर करप्शन का मुकुट लग जायेगा.

विकट चिंता की बात तो यह है कि डेंगू युद्ध में कोई होशियार हुक्मरान युनाइटेड नेशन्स ना चला जाये, कश्मीर के मसले की तरह. फिर तो डेंगू के मसले पर अगले पांच हजार साल भी कोई ठोस एक्शन ना हो पायेगा.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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