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मोदी बनेगें अगले आडवाणी…

-विजय पाण्डेय||

बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी की ताजपोशी ने एक बात तो साफ कर दी है कि बीजेपी अपनी रगों में दौड़ रहे हिंदुत्व को अब और दबाने के मूड में नहीं है. इस भगवा पार्टी ने एनडीए के दौर वाली लचीली राजनीति से तौबा कर अपनी पैदाइश के मूल (हिंदुत्व) और हवाई विकास के घालमेल को लेकर 2014 के चुनावों में उतरने का मन बना लिया है.narendra-modi-and-lal-krishna-advani

मोदी की ताजपोशी और आडवाणी के रूठने के पूरे ड्रामे पर जोर-शोर से हो रही चर्चा ने न जाने क्यों 1988 से 1998 के उस दौर की याद दिला दी, जब बीजेपी की भगवा लोकप्रियता अपने चरम पर थी. राम मंदिर आंदोलन को एजेंडा बना कर रथ लेकर निकले हिंदुत्व के पहले झंडाबरदार आडवाणी उस वक्त हिंदुओं के सबसे बड़े मसीहा बन गए थे. ऐसा माहौल बनाया गया था मानो देश की जनता को रोटी, कपड़ा और मकान से कहीं ज्यादा जरूरत उस मंदिर की है. लेकिन हिंदुत्व के उस भयंकर दौर में भी बीजेपी 200 सीटों तक नहीं पहुंच सकी. मजबूर होकर उसे अपने ‘भगवान’ को तिलांजलि देकर उन दलों को साथ लेना पड़ा जो उसके विचारों के बिलकुल विपरीत थे.

सबसे बड़ा नुकसान तो उस दौर के ‘हिंदू पोस्टर बॉय’ आडवाणी को ही उठाना पड़ा था, क्योंकि सहयोगी दलों को उनकी इस इमेज से परहेज था और उनके बिना बीजेपी की सरकार कैसे बनती? इसलिए आडवाणी को कुर्सी का मोह छोड़ना पड़ा और काफी मन मसोस कर मंदिर आंदोलन में ज्यादा श्रद्धा नहीं दिखाने के कारण किनारे किए गए अटल बिहारी वाजपेयी की ताजपोशी हुई. उस वक्त आडवाणी ही बीजेपी के सबसे बड़े नेता थे और पूरे देश में उनके समर्थन में बनी लहर कम से कम आज के मोदी की लहर से कहीं ज़्यादा बड़ी थी. लेकिन हालात के आगे मजबूर होकर उन्हें वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनने देना पड़ा.

आज जब बीजेपी हिंदुत्व का वही पुराना कार्ड भुनाने के ख्वाब देख रही है तो शायद यह भूल गई है कि उस वक्त जरूरत पड़ने पर आगे करने के लिए वाजपेयी के कद का नेता उनके पास था, लेकिन आज तो उनकी लाइनअप में यह विकल्प भी नहीं है.

अपनी दबी हुई हसरतों को पूरा करने के लिए संघ ने बीजेपी से मोदी के नाम का ऐलान जो करवा दिया, मगर अपने शाश्वत एजेंडे पर लौटी इस पार्टी के लिए असली मुश्किलें तो अब शुरू होने वाली हैं. ऐसा मान लें (क्षेत्रीय दलों के दौर में जिसकी संभावना कम ही दिखती है) कि नरेंद्र मोदी बीजेपी के लिए करिश्मा कर पाए और अपने बूते 272 सीटों का जादुई आंकड़ा दिलवा दें, तब तो ठीक है.

लेकिन ‘राम’ न करे अगर ऐसा नहीं हुआ, तब? उन हालात में बीजेपी को एक बार फिर उन क्षेत्रीय दलों का मुंह ताकना होगा, जिनमें से कुछ तो मोदी के नाम की घोषणा से पहले ही उससे दूरी बना चुके हैं. बिहार में सेक्युलर होने का ढ़ोंग करने वाले नीतीश, बंगाल में ममता बनर्जी, ओड़िशा में नवीन पटनायक, यूपी में एसपी या बीएसपी, तमिलनाडु में जयललिता या करुणानिधि- इनमें से किसे रिझा पाएगी बीजेपी?

अब रहा सवाल मोदी के गुजरात विकास मॉडल का, तो उसकी कमजोरियां और दावों का खोखलापन भी पहले ही सामने आ चुका है. यह साफ हो चुका है कि मोदी उद्योगपतियों की ही मदद करते हैं, उन्हें इतनी सारी रियायतें और सुविधाएं देते हैं कि कोई भी उद्योग गुजरात में लगाने को तैयार हो जाए. और ये लोग अपने मुनाफे के आगे आम जनता के विकास की कितनी चिंता करते हैं, यह भी किसी से छुपा नहीं है. यही उद्योगपति मोदी का गुणगान करते हैं और बाकी का काम मोदी की प्रचार-प्रसार टीम संभाल लेती है. सामाजिक क्षेत्र में भी मोदी का विकास मॉडल थमा हुआ है.

कैग भी साफ कर चुका है कि मोदी किस तरह नियमों को ताक पर रख उद्योगपतियों की मदद करते हैं और इससे सरकारी खजाने को कितना नुकसान पहुंचता है. मोदी के साथ एक और बड़ी मुश्किल यह है कि हिंदुत्व पोस्टर बॉय को चोला फेंक सेक्युलर मुखौटा पहनने वाले आडवाणी को धीरे-धीरे कई दलों से स्वीकार भी कर लिया था, लेकिन क्या वह संघ की महत्वकांक्षाओं की बलि देने का साहस अभी से जुटा पाएंगे?

मोदी और बीजेपी के पक्ष में यह दलीलें भी दी जा रही हैं कि अभी देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल है, लेकिन ऐसे दावे करने वाले यह भूल जाते हैं कि सिर्फ सोशल मीडिया और परिक्रमा के बूते वोट हासिल नहीं हो सकते. यह सच है कि जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार और लूट से परेशान हो चुकी है, लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि गठबंधन की राजनीति के इस दौर में बीजेपी को सत्ता में आने के लिए ऐसे चेहरे की जरूरत होगी जो उसके सहयोगियों को भी कबूल हो.

फिलहाल तो बीजेपी के इरादे ऐसे नहीं दिखते, इसलिए अब उनके इस ‘मसीहा’ के लिए चुनौतियां और बड़ी हैं. हिंदुत्व के इस अगले पोस्टर बॉय की चुनौतियां आडवाणी के दौर सो कई गुना बड़ी हैं. उसे न सिर्फ कामयाब होना होगा, बल्कि निर्णायक कामयाबी हासिल करनी होगी. ऐसा नहीं हुआ तो मोदी को अगला आडवाणी बनने के लिए तैयार रहना होगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.