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मेरी दादी को मारा, मेरे पापा को मारा और शायद एक दिन मुझे भी मार देंगे…

By   /  October 23, 2013  /  4 Comments

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कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी आज राजस्थान के चुरू में चुनाव प्रचार में अपनी भावुकता भरे भाषण में बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि ये पार्टी आग फैलाती है. इसके लोग आग फैलाते हैं और हम उसे बुझाने जाते हैं. इसके साथ ही राहुल ने गुस्से और हिंसा पर काबू पान की नसीहत भी दी. राहुल ने कहा कि गुस्सा आने में मिनट लगता है, गुस्सा खत्म करने में सालों लग जाते हैं. इस पर काबू के लिए भाईचारा, प्यार का सहारा लेना पड़ता है.Rahul-Gandhi

राहुल ने भावुक होते हुए कहा कि इससे देश का फायदा नहीं होता है, नुकसान होता है, लोग मरते हैं, गुस्सा पैदा होता है. ये मैंने दो बार सहा है. मेरी दादी को मारा, मेरे पापा को मारा और शायद एक दिन मुझे भी मार देंगे. लेकिन मुझे मरने से डर नहीं लगता है.

राहुल ने अपने भाषण की शुरुआत अलीगढ़ की तर्ज पर एक और कहानी से की. राहुल ने बताया कि उनकी मां सोनिया ने कहा कि मैं उनकी नहीं अपनी कहानी बताऊं. तो मैं आज आपको अपनी कहानी बताता हूं. उन्होंने अपनी दादी से अपने रिश्ते का किस्सा सुनाया. राहुल ने कहानी सुनाते हुए कहा, मैं पालक नहीं खाता था. लेकिन पापा मेरे आगे पालक की प्लेट रख देते थे. तब दादी अखबार आगे कर देती थीं, मैं पालक उनकी प्लेट में कर देता था. ऐसा उनका प्यार था. दादी से लोग डरते थे, पर मैं नहीं डरता था.

घर के पास ही नत्थूलाल नाम का व्यक्ति रहता था. वह मुझसे पूछता था कि दादी का मूड कैसा है. मैं उसे बताता था. दूसरे तरफ मेरे दो-तीन और दोस्त थे जो दादी का देखभाल करते थे. इनके नाम थे सतवंत सिंह, केहर सिंह, बेअंत सिंह. एक ने मुझे बैडमिंटन खेलना सिखाया. दूसरे ने पुल अप सिखाया. एक दिन मैं गार्डन में घूमने गया तो बेअंत सिंह मुझे मिले और दो तीन सवाल पूछे. उसने पूछा तुम्हारी दादी कहां सोती है, मैं छोटा था मुझे क्या मालूम था. लेकिन मुझे कुछ गलत लगा तो मैंने उल्टा सीधा जवाब दिया. उसने कहा उनकी सुरक्षा में कोई कमी तो नहीं है. उसने ये भी कहा कि कभी भी तुम्हारे उपर कोई हथगोला फेंके तो तुम्हें ऐसे लेट जाना चाहिए.

मैं इस बात को भूल गया. मैं घर में गया, वहां दादी बैठी थी, मैंने उनसे बात की. सालों बाद मुझे पता चला कि दादी की हत्या से पहले सतवंत, केहर, और बेअंत दादी पर दीवाली से पहले हथगोला फेंकना चाहते थे. उसके बाद क्या हुआ आप जानते हैं, दादी की हत्या हुई. बाद की कहानी सभी को मालूम है. उस दिन सुबह मैं उठा, स्कूल गया. क्लास में बैठा था. तभी एक व्यक्ति आया टीचर से बात की. टीचर ने मुझसे कहा कि तुम्हें घर जाना है. फोन पर बात की तो सुना घर में काम करने वाली महिला चिल्ला रहा थी.

पापा बंगाल में थे, मैंने पूछा, पापा ठीक है, उसने कहा ठीक हैं. मैंने पूछा मम्मी ठीक है, उसने कहा ठीक है. तब मैंने सोचा तो दादी हो सकती है. मैंने पूछा तो उसने कहा दादी ठीक नहीं है और उसने फोन रख दिया. जो दर्द मुझे उस दिन हुआ मैं ही जानता हूं. उसके बाद एक और दर्द हुआ जब पापा की मौत हुई. जैसे मेरी छाती फट गई हो.

पीएसओ ने कहा दादी ठीक है, गोली चली है, उन्हें कुछ नहीं हुआ. पीएसओ ने कहा प्रियंका के स्कूल चलते हैं. बॉडीगार्ड के साथ कार में हम घर गए. सड़क पर दादी का खून था, एक कमरे में मेरे दोस्त का खून था. इस बात पर मुझमें काफी साल तक गुस्सा था, अपने दोस्तों बेअंत और सतवंत के लिए गुस्सा था. मुझे 10 साल 15 साल लगे उस बात को समझने के लिए, अंदर से गुस्सा निकालने के लिए. सिख भाइयों में गुस्सा खत्म हो गया है. गुस्सा आने में मिनट लगता है, गुस्सा खत्म करने में कई साल.

आपके बीच नेता लोग नफरत पैदा करते हैं. इसीलिए मैं बीजेपी की राजनीति के खिलाफ हूं ये लाभ के लिए चोट पहुंचाते हैं. मैं मुजफ्फनगर गया, दोनों समुदाय से मिला. उन लोगों में मुझे अपनी कहानी दिख रही थी. मैं चाहता हूं हिंदुस्तान एक साथ रहे, एक साथ लड़े और एक साथ मरे. ये लोग मुजफ्फरनगर जाकर आग लगा देंगे. यूपी में, गुजरात में, कश्मीर में आग लगा देंगे. तब हमें जाकर आग बुझानी पड़ती है.

इससे देश का फायदा नहीं होता है, नुकसान होता है, लोग मरते हैं, गुस्सा पैदा होता है. ये मैंने दो बार सहा है. मेरी दादी को मारा, मेरे पापा को मारा, और शायद एक दिन मुझे भी मार देंगे. लेकिन मुझे मरने से डर नहीं लगता है.

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  • Published: 4 years ago on October 23, 2013
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  • Last Modified: October 23, 2013 @ 3:06 pm
  • Filed Under: राजनीति

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. Hemen Parekh says:

    SOS to SOS to SOS !

    Meaning,

    Save Our Souls …….. to
    Son Of Sonia……………. to
    Subsidize Our Subji ( Subzi )

    Rahul Gandhi,

    To fill our empty POTs ( Stomachs , in Marathi ) , please give us this day , our daily POTs , viz:

    P.. for.. Potato ( at Rs 3 / Kg )

    O.. for.. Onions ( at Rs 2 / Kg )

    T .. for.. Tomatoes ( at Rs 1 / Kg )

    Announce in your next Election rally that you will get these included ( at the subsidized prices mentioned above ) , in the Food Security Bill

    A little while back , you saved the democracy by tearing off the Ordinance

    Now save 400 million poor people by fighting inflation ( which you cannot feel ) and fighting the evil opposition ( which haunts you everywhere ! )

    On the battlefield of Mahabharat , Lord Krishna told Arjun :

    “ If you die , you will go to heaven : if you win , you will rule the World
    Therefore , arise , O Son of Kunti , determined to fight this battle “

    For the 2014 National Elections , the battle-lines are already drawn !

    It will be a battle of empty POTs and very angry RYOTs !

    • hemen parekh ( 24 Oct 2013 )

  2. Ashok Gupta says:

    ye kya bole or kya n bole in ko kuch pata nahi desh ko loot liya ghar bhara huva hai ko chinta nahi hai bazzar kaha se kaha ja raha hai us or too najar hai hi nahi sirf or sir roj niyam se 1 bar bhokana apna korm pura karte hai

  3. mahendra gupta says:

    अब राहुल बाबा के पास सुनाने के लिए यह किस्से ही रह गए हैं,जिनका चुनावो से कोई लेनदेन नहीं.जनता महंगाई,घोटालों से मुक्ति,आतकवाद समाज में बढ़ते महिलाओं पर अत्याचार,भ्रस्ताचार और अन्य ज्वलंत समस्याओं पर आश्वाशन चाहती है,पर उन पर वे नहीं बोले,जिस खाद्य सुरक्षा बिल का वे बखान karte हैं उसकी क्या हालत है यह अख़बार बोलतें हैं या जनता जानती है.पर वे भावनाओं पर खेल कर वोट पाने की जुगत में हैं.आखिर देश नहीं i विश्व जानता है कि इंदिरा तथा राजीव कि हत्या किसने क्यों की , स्वयं इन्होने देश के लिए ऐसा कौन sa काम कर दिया कि कोई इन्हें मार कार जेल जाना चाहेगा या फंसी के फंदे पर चढ़ना चाहेगा.अभी के भाषणों से राहुल एक कमजोर उम्मीदवार सिद्ध हो रहें हैं.और मुख्या मुद्दों पर बोलते ही सवाल जवाब देने पड़ेंगे इसलिए उनसे भटक कर वे ये किस्से सुना रहें हैं. देखो अभी और कौन कौन सी कहानियां सुनने को मिलेंगी,तथा कांग्रेसी भोंपू उनका क्या अर्थ जनता को समझायेंगे.

  4. अब राहुल बाबा के पास सुनाने के लिए यह किस्से ही रह गए हैं,जिनका चुनावो से कोई लेनदेन नहीं.जनता महंगाई,घोटालों से मुक्ति,आतकवाद समाज में बढ़ते महिलाओं पर अत्याचार,भ्रस्ताचार और अन्य ज्वलंत समस्याओं पर आश्वाशन चाहती है,पर उन पर वे नहीं बोले,जिस खाद्य सुरक्षा बिल का वे बखान karte हैं उसकी क्या हालत है यह अख़बार बोलतें हैं या जनता जानती है.पर वे भावनाओं पर खेल कर वोट पाने की जुगत में हैं.आखिर देश नहीं i विश्व जानता है कि इंदिरा तथा राजीव कि हत्या किसने क्यों की , स्वयं इन्होने देश के लिए ऐसा कौन sa काम कर दिया कि कोई इन्हें मार कार जेल जाना चाहेगा या फंसी के फंदे पर चढ़ना चाहेगा.अभी के भाषणों से राहुल एक कमजोर उम्मीदवार सिद्ध हो रहें हैं.और मुख्या मुद्दों पर बोलते ही सवाल जवाब देने पड़ेंगे इसलिए उनसे भटक कर वे ये किस्से सुना रहें हैं. देखो अभी और कौन कौन सी कहानियां सुनने को मिलेंगी,तथा कांग्रेसी भोंपू उनका क्या अर्थ जनता को समझायेंगे.

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