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प्रजातंत्र के असली राजा को जगाइये…

By   /  October 24, 2013  /  No Comments

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-आशीष वशिष्ठ||
प्रजातंत्र का वास्तविक राजा प्रजा होती है लेकिन हमारे देश का दुर्भाग्य है कि राजा सो रहा है. और जिन्हें प्रजातंत्र के राजा ने वोट के अधिकार से निर्वाचित कर विकास, सुरक्षा और कल्याण जैसी कई दूसरी अहम् जिम्मेदारियां सौंपी हैं वो कर्त्तव्यविमुख होकर निज स्वार्थ साधने और कुर्सी पर जमे रहने के की तिकड़मों में मशगूल रहते हैं. आज देश और देशवासियों की जो हालत है उसके लिए व्यवस्था के साथ-साथ प्रजातंत्र का राजा माने हम लोग भी बराबर के भागीदार हैं. अगर हम जाग रहे होते और अपने कर्तव्य का पालन ठीक ढंग से कर रहे होते तो न आज आम आदमी की जो दुर्गति है वो शायद न होती. विकास की किरण और संविधान प्रदत्त अधिकार पंक्ति में खड़े अंतिम आदमी तक पहुंचती जरूर. मगर ऐसा हुआ नहीं. आजादी मिले 66 वर्षों का लंबा वक्त गुजर गया और देश की आबादी का बड़ा हिस्सा सड़क, नाली, खंडजें, बिजली, पानी जैसी मामूली सुविधाओं के ही फेर में ही लट्टू बना घूम रहा है. शायद ही किसी ने कभी ये सोचने की कोशिश की हो कि उसकी ये हालत आखिरकर क्यों हैं. असल में हम दूसरे के सहारे जीने के आदी हो चुके हैं. हमें लगता है कि जब तक सरकार और नेता हमें कोई रास्ता नहीं दिखाएंगे हम तब तक एक भी कदम चल नहीं पाएंगे. नेताओं और राजनैतिक दलों ने धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रवाद के फेर में आम आदमी को ऐसा उलझाया है कि वो ग्लोब की भांति उसी चक्र के इर्द-गिर्द पिछले छह दशकों से घूमे जा रहा है. आंखों पर जाति, धर्म और भाषा का चश्मा इतनी मजबूती से चढ़ा हुआ है कि गुण-दोष अर्थ व भावहीन हो चुके हैं.cartoon

चुनाव, लोकतंत्र की जुड़ें और जनमानस का प्रतिबिम्ब होती है. किसी देश के जनतांत्रिक चरित्र के सही अनुमान की सबसे बड़ी कसौटी है किसी देश की चुनावी प्रणाली. चुनाव में अनुशासन और जनता की भागीदारी, इसी पर लोकतंत्र टिका होता है. महात्मा बुद्ध ने कहा था जब तक गणतंत्र में अनुभवी वृद्धों, नारी अनुशासन, उच्च चरित्र एवं धर्म का सम्मान होगा यह राज्य अजेय रहेगा. चुनाव केवल सरकार का ही नहीं होता, बल्कि धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के भी चुनाव होते हैं. यह चुनावी युग है क्लबों के अध्यक्षों, गांवों के पंचों, सरपंचों, श्रमिक संघ के प्रधान पदों के लिए तथा राजनैतिक दलों में चुनाव समय-समय पर होते रहते हैं. लोकसभा व राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव ज्यादा महत्व रखते हैं, क्योंकि इसके साथ देश की जनता के हित सीधे जुड़े हुए होते हैं. ये चुनाव मतदान द्वारा राजनैतिक दिशा और व्यवस्था तय करने के साधन होते हैं. मतदाताओं के सामने राजनैतिक पार्टियां विकल्प के रूप में आती हैं उनमें से किसी एक के पक्ष में वोट डालकर फैसला करते हैं. लोकतंत्र में चुनाव का खास महत्व है. विकल्प ही चुनाव को सही मायने में चुनाव बनाते हैं. तानाशाही में भी चुनाव होते हैं परन्तु इसमें कोई विकल्प न होने के कारण इनका महत्व नहीं होता.

असल में हम अपनी गलतियां और दोष किसी ओर के माथे नहीं मढ़ सकते. जैसे प्रतिनिधि हम चुनकर भेजते हैं अर्थात जैसा बीज बोते हैं फल भी वैसा ही प्राप्त होता है. बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय. जब हमने अपनी वोट की ताकत का दुरूपयोग किया या ईवीएम मशीन का बटन दबाते समय धर्म, जाति और भाषा के फेर में पड़कर गलत व्यक्ति का चुनाव कर लिया तो दोष किसका है. माना कि देश में अशिक्षा, अनपढ़ता और गरीबी है. ये ऐसे मूलभूत कारण हैं जो प्रजातंत्र के वास्तविक राजा प्रजा को अपना निर्णय बदलने या चालाक और धूर्त नेताओं का असली चेहरा पहचानने में बड़ी बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं. लेकिन आजादी के लंबे समय बाद तो जनता को असली-नकली, अच्छे-बुरे की पहचान हो जानी चाहिए थी.

अगले महीने पांच राज्यों दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. अगले साल भी कई राज्यों में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव होने हैं. लेकिन निर्भया कांड और देश हित से जुड़े दूसरे कई मसलों पर एकत्र होने वाली, कैंडिल मार्च निकालने वाली भीड़ का कहीं अता-पता नहीं है. सरकारी मशीनरी अपने तरीके से काम करती है. उससे ज्यादा अपेक्षा की भी नहीं जा सकती. चुनाव वो वक्त होता है जब हम सरकार और राजनैतिक दलों के रिपोर्ट कार्ड को भली-भांति समझबूझकर अगले पांच सालों के लिए अपने और देशहित में योग्य, ईमानदार और विकास की सोच से ओत-प्रोत प्रतिनिधियों का चुनकर विधानसभा व लोकसभा में भेज सकते हैं. लेकिन पुराने अनुभव इस बात को साबित करते हैं कि जो भीड़ इण्डिया गेट या देश की सड़कों पर नारे, धरने, प्रदर्शन करती हैं वो चुनाव माने लोकतंत्र की परीक्षा के समय मैदान से नदारद दिखती है. शहरी क्षेत्रों में मत प्रतिशत कम ही रहता है. गांवों और कस्बों में जहां जनता अधिक जागरूक और शिक्षित नहीं है वहां मत प्रतिशत हमेशा अधिक रहता है. ऐसे में राजनैतिक दल और नेता ग्रामीण क्षेत्र की आबादी को बरगलाने में हर बार कामयाब हो जाते हैं.

संविधान निर्माताओं ने दुनिया की समस्त शासन प्रणालियों का अध्ययन के बाद प्रजातान्त्रिक प्रणाली को अपने देश के लिये चुना था. लेकिन जिस पाक और सार्थक उद्देश्य के लिए प्रजातांत्रिक प्रणाली का चुनाव किया गया था उसमें वो कामयाब होती दिखाई नहीं दे रही है. प्रजातांत्रिक प्रणाली को राजनैतिक दलों ने क्षेत्रवाद, भाषा और धर्म-जात की कोठरियों में कैद कर दिया है. कहने को तो नेता अपने दलों में प्रजातांत्रिक व्यवस्था की बात करते हैं लेकिन अधिसंख्य दलों में परिवारवाद का बोलबाला है, जब राजनैतिक दलों में ही प्रजातंत्र की बजाय अधिनायकवाद का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा हो तो प्रजातांत्रिक व्यवस्था के सफल होने की बात कैसे सोची जा सकती है. संसद और विधानसभाओं में अपराधी बैठे हुये हैं. और यही अपराधी और भ्रष्ट नेता हमारे आपके भविष्य को तय करते हैं. सारी जिम्मेदारियां, कानून और बंदिशें आम आदमी के लिये ही हैं.

इस साल पांच प्रदेशों के विधानसभा चुनाव और अगले साल लोकसभा के साथ कई राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होंगे. ऐसे में यही सही वक्त है ये सोचने का कि आखिरकर हमारी दुर्दशा का जिम्मेवार कौन हैं. व्यवस्था, राजनैतिक दल, नेता या स्वयं हम. जो होना था वो हो चुका. बीते वक्त को लौटाया नहीं जा सकता. लेकिन समझदारी इसी में है कि बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लें की तर्ज पर आने वाले कल के लिये हम सब मिलकर सोचे और धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के मसलों और झंझटों से ऊपर उठकर देश और समाज के बारे में खुले दिल और दिमाग से सोचे. क्योंकि अगर प्रजातंत्र का असली राजा इस बार भी सोता रह गया तो अगले पांच साल तक हमें निकम्मे, भ्रष्ट, स्वार्थी, सत्तालोलुप, धर्म-जाति-भाषा और क्षेत्रवाद के कीचड़ में सने नेताओं को झेलना पड़ेगा. ऐसे में सरकार और व्यवस्था को कोसने का अधिकार भी हमारे पास नहीं रहेगा क्योंकि जैसा बीज आप आज बोएंगे वैसे ही वृक्ष के फल अगले पांच साल तक सेवन करेंगे. अब फैसला आपके ऊपर है. अपने भीतर सुप्तावस्था में विराजित प्रजातंत्र के राजा को जगाइये और व्यवस्था को कोसने की बजाय व्यवस्था परिवर्तन के भागीदार बनिये.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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